जागरण संपादकीय: फिर वही हंगामा
यह विचित्र है कि विपक्षी दल एक ओर मतदाता सूचियों में गलतियों की शिकायत करते हैं और दूसरी ओर उन्हें दुरुस्त करने वाली एसआईआर प्रक्रिया का विरोध भी करते हैं। क्या इसलिए कि एसआईआर प्रक्रिया घुसपैठियों को चिह्नित करने में भी सहायक बन रही है?
HighLights
राहुल गांधी और विपक्ष का CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध।
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर विवाद।
सुप्रीम कोर्ट ने SIR और फॉर्म 6 को वैध ठहराया।
जैसा कि अपेक्षित था, नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी फिर से मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मैदान में आ गए और विपक्षी दलों ने उनके विरुद्ध सड़कों पर उतरकर धरना-प्रदर्शन करने की योजना भी बना ली। यह हंगामा पहली बार नहीं हो रहा है। यह पहले भी संसद से लेकर सड़क तक हो चुका है और चुनाव आयोग की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया के खिलाफ बार-बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जा चुका है। अब मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस आधार पर नए सिरे से मोर्चा खोला जा रहा है, क्योंकि बीते दिनों यह बात सामने आई कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने बीते 10 महीनों में कम से कम 14 बार विभिन्न मुद्दों पर उनसे अपनी असहमति जताई।
चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति होना कोई नई-अनोखी बात नहीं। हर संस्था में ऐसा होता है और शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के बीच मतभेद होते हैं। इन मतभेदों के बावजूद संस्थाएं किसी निर्णय पर पहुंचती हैं। यही चुनाव आयोग में हुआ। चुनाव आयोग के अनुसार उसकी ओर से एसआईआर को लेकर जो भी फैसले लिए गए, वे सब सहमति से लिए गए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दोनों चुनाव आयुक्तों को आगे आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। इस प्रश्न का भी उत्तर मिलना चाहिए कि यदि दोनों चुनाव आयुक्त जिन मुद्दों पर मुख्य चुनाव आयोग के फैसले से असहमत थे, उनके खिलाफ उन्होंने एकजुट होकर वोट क्यों नहीं किया? ध्यान रहे कि चुनाव आयोग में फैसले या तो सर्वसम्मति से होते हैं या फिर बहुमत से।
यदि दो चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर एकमत हों तो फिर फैसला वही होगा, जो वे चाहेंगे, न कि वह, जो मुख्य चुनाव आयुक्त चाहेंगे। स्पष्ट है कि इस तरह के आरोपों में कोई वजन नहीं दिखता कि मुख्य चुनाव आयुक्त मनमानी कर रहे हैं। वोट चोरी का जुमला उछालना जितना आसान है, उसे साबित करना उतना ही कठिन। शायद यही कारण है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता मुख्य चुनाव आयुक्त की कथित मनमानी के खिलाफ कोई प्रमाण लेकर अदालत नहीं जा पा रहे हैं।
इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि एसआईआर के खिलाफ विपक्षी दलों ने जो भी आपत्तियां सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखीं, वे सब खारिज हो गईं। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल एसआईआर को आवश्यक माना, बल्कि चुनाव आयोग के फार्म 6 में जोड़े गए एक अतिरिक्त घोषणापत्र को वैध भी करार दिया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि वास्तविक मतदाताओं की पहचान हो सके। यह विचित्र है कि विपक्षी दल एक ओर मतदाता सूचियों में गलतियों की शिकायत करते हैं और दूसरी ओर उन्हें दुरुस्त करने वाली एसआईआर प्रक्रिया का विरोध भी करते हैं। क्या इसलिए कि एसआईआर प्रक्रिया घुसपैठियों को चिह्नित करने में भी सहायक बन रही है?








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