निकोलस क्रिस्टोफ। चीनी राष्ट्रपति अपने अमेरिकी समकक्ष डोनाल्ड ट्रंप के साथ शिखर वार्ता के लिए अमेरिका पहुंच चुके हैं। उनकी अगवानी के लिए ट्रंप स्वयं पहुंचे। वाशिंगटन पहुंचने की तैयारियों के बीच ही चीनी राष्ट्रपति ने अपने कूटनीतिक रसूख और तेवरों का भरपूर प्रदर्शन किया। अतीत में जब भी चीनी और अमेरिकी शीर्ष नेताओं के बीच शिखर वार्ताएं होती रहीं तो उसमें कूटनीतिक बढ़त हमेशा अमेरिकी राष्ट्रपति के पास हुआ करती थी, मगर इस बार स्थिति अलग है। यह संभवत: पहला ऐसा चीन-अमेरिका शिखर सम्मेलन होगा, जहां वार्ता की कमान चीनी राष्ट्रपति के पास नजर आए। द्विपक्षीय रिश्तों में यह चौंकाने वाला पहलू ट्रंप के दौर में अमेरिकी कद के कुंद होने का भी परिचायक होगा।

कुछ जानकार मानते हैं कि चिनफिंग के प्रति ट्रंप काफी हद तक नरम रुख अपनाते हैं। जबकि चिनफिंग एक तरह से अमेरिका को ठेंगा दिखाते हुए अपनी ताकत को ही जाहिर करते हैं। ट्रंप के अनुसार मई में चिनफिंग के साथ पिछली बैठक में उन्होंने आग्रह किया था कि प्रख्यात मीडिया टायकून और लोकतंत्र के प्रखर समर्थक जिमी लाई को रिहा कर दिया जाए। चिनफिंग ने इसे ठुकरा दिया। इसके उलट, हांगकांग की एक अदालत ने इसी माह तीन अन्य असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को सख्त कारावास की सजा सुनाई। हांगकांग के बेहद चर्चित लोकतंत्र समर्थक आंदोलनकारियों में से एक 29 वर्षीय जोशुआ वोंग भी आजीवन कारावास की आशंका का सामना कर रहे हैं।

उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों की भी चीन सरेआम धज्जियां उड़ाता दिख रहा है। वह धड़ल्ले से ईरानी तेल खरीद रहा है। ईरान को सामरिक मदद पहुंचाकर युद्ध में उसकी मदद करने की भी खबरें हैं। दुर्लभ खनिजों पर कड़े नियंत्रणों को औपचारिक रूप से स्थगित करने के बावजूद चीन उन पर ऐसी पकड़ बनाए हुए है, जिससे पश्चिमी कंपनियों के सामने लगातार मुश्किलें बनी हुई हैं। जुलाई में ईरानी हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की हत्या में चीनी खुफिया जानकारी से मिली मदद की बात सामने आने के मुद्दे से जुड़े सवालों के मामले में भी ट्रंप का रवैया उदासीन रहा और अपने व्यक्तित्व के उलट उन्होंने खामोशी को ही तरजीह दी। उलटे उन्होंने इसमें चीन की किसी भी संदिग्ध भूमिका को खारिज ही किया।

देखा जाए तो अमेरिका के साथ रिश्तों में चिनफिंग का पलड़ा इसलिए भी भारी है, क्योंकि दुर्लभ खनिजों के निर्यात नियंत्रण से जुड़े प्रविधानों की मियाद नवंबर में खत्म हो रही है। ऐसे में अगर ट्रंप के साथ कोई सहमति नहीं बन पाती, तो बीजिंग इन दुर्लभ खनिजों पर अपना शिकंजा और कस सकता है, जिनकी आवश्यकता आज कारों से लेकर पनडुब्बियों के निर्माण में महत्वपूर्ण होती जा रही है। चीन की बढ़ी ताकत के उलट ट्रंप के दौर में अमेरिकी ताकत घटी है, जिसके पीछे कई कारण रहे हैं।

एक बड़ी वजह तो पिछले साल चीन के साथ छेड़ा गया व्यापार युद्ध था, जिसमें चीन ने दुर्लभ खनिजों को एक हथियार बना लिया और अमेरिका को व्यावहारिक रूप से मात खानी पड़ी। वहीं, ईरान के साथ युद्ध ने अमेरिकी हथियारों के जखीरे को इस कदर खाली कर दिया कि ताइवान की रक्षा करने या प्रशांत क्षेत्र अथवा पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य ताकत का लोहा मनवाने की अमेरिकी क्षमता ही कुंद पड़ गई। इस दौरान सहयोगियों को नाराज एवं अलग-थलग तक किया गया। इन सबने मिलकर वैश्विक पटल पर अमेरिकी साख पर बट्टा लगाया है और दुनिया भर में उसके प्रभाव एवं साफ्ट पावर को गहरा आघात पहुंचाया।

वैश्विक पटल पर ट्रंप की छवि मुख्य रूप से एक लापरवाह और अप्रत्याशित नेता की बन चुकी है। इसके विपरीत चिनफिंग ने स्वयं को एक परिपक्व नेता के रूप में स्थापित करने के प्रयास किए हैं। उन्होंने वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बहाल करने के जतन किए, जो ईरान के विरुद्ध ट्रंप के सैन्य अभियान से अस्थिर हो गया था। राकफेलर फाउंडेशन के एक ताजा जनमत सर्वेक्षण के निष्कर्ष रेखांकित करते हैं कि कनाडाई, इंडोनेशियाई, ब्राजीलियाई, तुर्क और मैक्सिकन नागरिक अब रूस अथवा चीन की अपेक्षा अमेरिका को अपने लिए अधिक 'गंभीर खतरे' के रूप में देखते हैं।

अमेरिकी इतिहासकार फिलिप्स ओ'ब्रायन ने इसी माह लिखा, 'अमेरिका रणनीतिक रूप से पिछड़ रहा है। वह संवेदनशील एवं सामरिक महत्व के अपने सैन्य ठिकानों को ध्वस्त होते देख रहा है और उनकी रक्षा में लाचार दिखता है। वह उन सहयोगी राष्ट्रों को भी उनके हाल पर छोड़ रहा है, जो अब तक उसकी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर थे। यह रुझान दर्शाता है कि वैश्विक पटल पर बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी वह अपने सामरिक हितों की रक्षा में पूरी तरह असमर्थ दिख रहा है।' ओ'ब्रायन ने यह भी जोड़ा कि "यह निसंदेह अमेरिकी युग का अवसान है, लेकिन मैं इसे लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूं।

आज भी अमेरिका के पास अद्वितीय सामर्थ्य है, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उसका कोई सानी नहीं है। दूसरी तरफ चीन, यूरोप और जापान अपने स्तर पर गंभीर जनसांख्यिकीय असंतुलन तथा आर्थिक संकटों जैसी आंतरिक विसंगतियों से जूझ रहे हैं। अपने भारी प्रोपेगंडा के बावजूद चीन आज भी एक दमनकारी सत्ता केंद्र बना हुआ है, जहां चिनफिंग के बाद किसी उत्तराधिकारी का दूर-दूर तक कोई संकेत नहीं दिखता। इसके विपरीत, इसकी प्रबल संभावना है कि नवंबर के चुनावों में अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी दृढ़ता और लचीलेपन का प्रभावी प्रदर्शन करेगी।

चिनफिंग और ट्रंप, दोनों ही इस समय द्विपक्षीय तनाव की तपिश घटाने तथा संबंधों में स्थायित्व लाने के पक्षधर प्रतीत होते हैं। आशा है कि यह स्थिति आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई जैसी तकनीक के संदर्भ में सीमित ही सही, किंतु किसी सार्थक प्रगति के लिए मार्ग प्रशस्त करेगी। यदि अमेरिका और चीन एआई सुरक्षा के प्रश्न पर परस्पर सहयोग से कन्नी काटते हैं, तो वैश्विक स्तर पर एआई के किसी प्रभावी नियामकीय ढांचे में उल्लेखनीय प्रगति की उम्मीद बेमानी होगी।

(लेखक न्यूयार्क टाइम्स के स्तंभकार हैं)