विचार: यूपी लिखेगा राष्ट्रीय राजनीति की पटकथा
आगामी विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में से सबसे अधिक राजनीतिक सरगर्मी उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रही है।
डॉ. एके वर्मा। उत्तर प्रदेश सहित उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च 2027 में होने हैं। इन सभी राज्यों में चुनावी सरगर्मियां तेज हैं, लेकिन सबकी नजरें उत्तर प्रदेश पर हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के लिए यह तीसरे कार्यकाल का दरवाजा खोल सकता है और लोकसभा चुनाव 2029 की पटकथा लिख सकता है। 2024 में भाजपा उत्तर प्रदेश में 29 सीटों के नुकसान के साथ 33 लोकसभा सीटों पर सिमट गई थी। सपा और कांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटें (37+6) जीतीं और भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल करने से रोक दिया। इसके बावजूद प्रदेश में भाजपा/एनडीए का मत प्रतिशत (44.01) सपा-कांग्रेस गठबंधन (43.52) से ज्यादा था।
याद रहे कि 2012 में सपा ने मात्र 29 प्रतिशत और 2007 में बसपा ने 30 प्रतिशत वोट पर सरकार बनाई थी, इसलिए भाजपा/एनडीए का वर्तमान 40 प्रतिशत जनाधार त्रिकोणीय चुनावी संघर्ष में विजय की संभावनाएं संजोए है, लेकिन भाजपा के विजय की राह आसान नहीं। योगी ने भले ही 'कानून-व्यवस्था' और 'लोक कल्याण एवं विकास' पर जनता का विश्वास हासिल किया है, लेकिन चुनावों में मतदाता 'विपक्षी विमर्श' के भ्रमजाल में फंस कर कहीं और भी जा सकता है। विगत लोकसभा चुनावों में यही हुआ था। अखिलेश-राहुल ने भाजपा के '400 पार' पर यह 'नैरेटिव' गढ़ा कि इतनी सीटें पाकर भाजपा 'बाबा साहब का संविधान बदल देगी' और 'आरक्षण खत्म कर देगी।' इससे भ्रमित होकर दलित और ओबीसी मतदाता भाजपा से खिसक गए।
जो भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी जनवरी-मार्च 2024 में 60 प्रतिशत जनता की पसंद थे, वे अप्रैल-मई में नीचे गिर कर 40 प्रतिशत पर आ गए थे, अन्यथा उत्तर प्रदेश में भी मध्य प्रदेश, ओडिशा, दिल्ली, बिहार, गुजरात जैसे परिणाम आते। विजय हेतु सत्तारूढ़ दल द्वारा सुशासन के साथ 'एक प्रभावी केंद्रीय विमर्श' भी गढ़ा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री योगी को विपक्ष से ही नहीं, भाजपा की आंतरिक खींचतान से भी चुनौती है। मुख्यमंत्री पद के कई अभिलाषी हैं। केंद्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप और संघ की पृष्ठभूमि न होना भी एक मुद्दा है, पर योगी की कर्मठता, मोदी का वरदहस्त और जनता के आशीर्वाद की त्रिवेणी से वह निर्बाध गति से अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं। कुछ समस्याएं तो हमेशा रहेंगी।
इसलिए और भी, क्योंकि उत्तर प्रदेश जनसंख्या की दृष्टि से बड़ा राज्य है। आज 'जेन-जी' द्वारा परीक्षा और रोजगार पर आक्रोश है, लेकिन जिस देश में सूडान, बेल्जियम, यूएई आदि के बराबर जनसंख्या केवल एक वर्ष में ही बढ़ जाती हो, वहां किसी पार्टी के पास रोजगार देने का कोई बेहतर ब्लूप्रिंट है क्या? ‘जेन-जी’ के हाथ में मोबाइल है। क्या उसे पता नहीं कि प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को 1989 में क्यों रिजेक्ट किया और क्यों आज 36-37 वर्ष बाद भी वह अपनी जमीन नहीं तलाश सकी? क्या उसे पता नहीं कि सपा के शासन में भय, जातिवाद और मुस्लिम-तुष्टीकरण का क्या आलम था? क्या उसे सपा-कांग्रेस शासन में दंगों का इतिहास नहीं पता? क्या उसे ज्ञात नहीं कि पिछले 10 वर्षों में सपा-कांग्रेस ने भाजपा और मोदी को अपमानित करने के अलावा कोई रचनात्मक, सकारात्मक बात जनता के सामने नहीं रखी कि वे भाजपा से बेहतर और करेंगे क्या?
प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी सपा जातीय समीकरणों की संकीर्णता, जमीनी राजनीति की कमजोरी, अल्पसंख्यकवाद, परिवारवाद, शासन और विकास के बेहतर माडल का अभाव तथा पिछले कार्यकाल की छवि से जूझ रही है। इसका समाधान ढूंढ़ने के बजाय सपा ने नकारात्मक और प्रतिगामी राजनीति का चयन किया। पहले मुस्लिम-यादव और फिर 'पीडीए' (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) का दांव चला, लेकिन अभी समावेशी राजनीति के मोदी-मंत्र 'सबका-साथ, सबका-विकास' से वह पीछे है।
बसपा सुप्रीमो मायावती कभी प्रदेश राजनीति में सशक्त किरदार थीं। उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग द्वारा 2007 में पूर्ण बहुमत सरकार बनाई, पर वे उसे बरकरार न रख सकीं। वे ब्राह्मणों और दलितों की आकांक्षाओं में समन्वय न कर सकीं। शायद उन्हें पता नहीं कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने की कला नहीं, वरन उसे बनाए रखने की विधि भी है। 2022 के विधानसभा में बसपा को केवल एक सीट और 2024 लोकसभा में एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन उसका 10 प्रतिशत जनाधार बचा हुआ है। वहीं दलित राजनीति के उभरते नेता चंद्रशेखर ने उत्तर प्रदेश की नगीना लोकसभा सीट जीत बसपा को चौंका दिया। मायावती विचारधारा, संगठन और नेतृत्व को लेकर अपना जनाधार खोती जा रही हैं। 2014 से भाजपा ने प्रदेश में अधिकांश सुरक्षित सीटें जीत कर दलितों में अपनी पैठ बनाई, उन्हें संगठन और सत्ता में समानुपातिक प्रतिनिधित्व देकर उनका विश्वास हासिल किया। अतः दलितों के पास कोई ऐसा ठोस कारण नहीं कि वे भाजपा छोड़ सपा या कांग्रेस जैसे दलों के साथ जाएं।
मुस्लिम मतों पर सपा अपना हमेशा अपना एकाधिकार मानती रही है, लेकिन अबकी कांग्रेस और मायावती के अलावा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी मैदान में है, जिसकी मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों पर नजर है। कुछ मुस्लिम नेताओं द्वारा मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग तथा ओवैसी के प्रति झुकाव ने अखिलेश के 'पीडीए' पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। अब तो कुछ मुस्लिम भी योगी के कानून-व्यवस्था, विकास और लाभार्थी योजनाओं को लेकर समर्थन में हैं। छोटी-छोटी पार्टियां अपनी अस्मिता और 'एनडीए' में सत्ता-सहभागिता हेतु अपने ढंग से प्रयास कर रही हैं। 2024 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सीटें देने में सपा को दिक्कत नहीं थी, क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस नेतृत्व की स्वीकार्यता है, पर यदि प्रदेश में सपा को अपना वर्चस्व बनाए रखना है तो उसे कांग्रेस को सीटें देने में काफी सतर्क रहना होगा, क्योंकि प्रदेश में कांग्रेस जितना सशक्त होगी, सपा उतना ही कमजोर होगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फार द स्टडी आफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक हैं)
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