बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवात अर्नब और उससे उपजे प्रभाव के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश समेत देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों में जो भारी बारिश हुई, उसने आम लोगों के समक्ष तो समस्याएं पैदा ही कीं, फसलों को भी भारी नुकसान पहुंचाया। कुछ राज्यों में लोगों की जान भी गई। अत्यधिक बारिश के कारण नदियां उफना गईं और इसके चलते बाढ़ का खतरा पैदा हो गया।

मौसम में यकायक यह अप्रत्याशित तब्दीली इसलिए भी आई, क्योंकि पश्चिमी विक्षोभ चक्रवातीय सिस्टम से मिल गया। यह पहली बार नहीं है जब देश के कुछ हिस्सों में कम समय में अत्यधिक बारिश हुई हो और उसके चलते जनजीवन में बाधा पड़ी हो। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा रह-रहकर होने लगा है। इसका प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है।

वैसे तो जलवायु परिवर्तन और उसके दुष्प्रभावों को लेकर एक लंबे समय से चिंता जताई जा रही है, लेकिन समस्या यह है कि विश्व समुदाय इस चुनौती का सामना करने के लिए अपेक्षित एकजुटता दिखाने के लिए तैयार नहीं। यह स्थिति तब है, जब यह माना जा रहा है कि वायुमंडल के बढ़ते तापमान को रोकने का लक्ष्य पीछे छूटता चला जा रहा है।

कहना कठिन है कि विश्व समुदाय जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए कब कमर कसेगा? जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक केंद्र और राज्य सरकारों को जलवायु परिवर्तन के रूप में अत्यधिक बारिश जैसी आपदाओं का जो सामना करना पड़ रहा है, उसके लिए पर्याप्त तैयारी रखने के प्रबंध करने होंगे। विशेष रूप से राज्य सरकारों को, क्योंकि अक्सर यह देखने में आता है कि वे आपदाओं से निपटने में अपनी तैयारी या पर्याप्त प्रबंध के बजाय केंद्र सरकार से मिलने वाली मदद की ओर ही अधिक ताकती रहती हैं।

यह देखने में आ रहा है कि अत्यधिक बारिश और उसके चलते बाढ़ के कारण जान-माल को जो नुकसान होता है, वह कई बार बुनियादी ढांचे की कमजोरी के चलते भी होता है। अब जब इसकी आशंका बढ़ती जा रही है कि मौसम में अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिलते रहेंगे, तब फिर अत्यधिक बारिश से निपटने के ठोस उपाय करने के अलावा और कोई चारा नहीं।

अतिवृष्टि के साथ ही अल्पवृष्टि से भी निपटने के उपाय करने होंगे, क्योंकि एक ओर जहां देश के अनेक राज्यों को भारी वर्षा का सामना करना पड़ रहा है, वहीं देश के कुछ हिस्सों और विशेष रूप से महाराष्ट्र में सूखे का संकट उभर रहा है। यह ध्यान रहे कि चाहे अतिवृष्टि हो या अल्पवृष्टि, दोनों ही खाद्य सुरक्षा को संकट में डालने का काम करती हैं और खाद्य सुरक्षा के समक्ष संकट पैदा होने से अर्थव्यवस्था की चुनौतियां बढ़ती हैं।