विचार: बच्चों को मिले गलती सुधारने का अवसर
संरक्षण गृह एक ऐसी जगह होनी चाहिए, जो बच्चे को उसके कठिन अतीत से निकालकर एक बेहतर भविष्य तक पहुंचाए।
HighLights
कानून की जद में आए बच्चों को सुधार का अवसर दें।
नशे से प्रभावित युवाओं को चिकित्सा और परामर्श सहायता मिले।
शिक्षा, कौशल विकास से बच्चों को आत्मनिर्भर नागरिक बनाएं।
डॉ. कुमार आशीष। पिछले दिनों मुझे एक संरक्षण गृह में रह रहे उन बच्चों से संवाद करने का अवसर मिला, जो किसी न किसी कारण से कानून की जद में आए थे और फिलहाल अपने सामान्य सामाजिक परिवेश से अलग रह रहे हैं। उन बच्चों को देखते हुए मेरे मन में एक सवाल उठा, जो केवल पुलिस व्यवस्था या किशोर न्याय तक सीमित नहीं है। जब ये बच्चे एक दिन इस संरक्षण गृह से बाहर निकलेंगे, तब हम उन्हें कैसा देखना चाहते हैं? क्या हम चाहते हैं कि वे जीवन भर अपने अतीत और अपनी गलतियों का बोझ ढोते रहें? या हम चाहते हैं कि वे एक दिन आत्मविश्वासी, कुशल, स्वावलंबी और जिम्मेदार नागरिक बनकर समाज में लौटें? मेरे लिए इसका उत्तर स्पष्ट है-किसी बच्चे की एक गलती को उसकी पहचान का हिस्सा नहीं बनने दिया जा सकता। उसे अपनी गलती समझने, उससे सीखने और जीवन को नई दिशा देने का अवसर मिलना चाहिए। कानून की जद में आए बच्चों के प्रति हमारा दृष्टिकोण केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि सुधारात्मक और पुनर्वासपरक होना चाहिए।
यही सोच तब महत्वपूर्ण हो जाता है, जब हम बच्चों में बढ़ते नशे के खतरे की बात करते हैं। नशे का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि वह अक्सर दुश्मन बनकर नहीं, दोस्त बनकर जीवन में प्रवेश करता है। जब तक उसके दुष्परिणाम दिखाई देते हैं, तब तक वह शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार, आर्थिक स्थिति और निर्णय लेने की क्षमता पर असर डाल चुका होता है। कई मामलों में नशे पर निर्भरता व्यक्ति को चोरी, हिंसा, तस्करी या दूसरे अपराधों की ओर भी धकेल सकती है। इसलिए नशे के विरुद्ध लड़ाई केवल पुलिस या कानून की लड़ाई नहीं हो सकती। इसकी शुरुआत परिवार, विद्यालय और समुदाय से होनी चाहिए। बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि 'नशा मत करो', बल्कि हमें उन्हें यह भी सिखाना होगा कि वे नशे के प्रस्ताव को कैसे ठुकराएं, साथियों के दबाव से कैसे निपटें और संकट में मदद कैसे मांगें। यदि कोई बच्चा पहले से नशे की गिरफ्त में है तो उसके लिए सबसे जरूरी संदेश यह है कि उसका जीवन समाप्त नहीं हुआ है। उसे दुनिया से छिपने की नहीं, सहायता लेने की जरूरत है। काउंसलिंग, चिकित्सकीय सहायता, मनोवैज्ञानिक सहयोग, परिवार का समर्थन और सकारात्मक वातावरण किसी युवा को नशे की निर्भरता से बाहर निकलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
संरक्षण गृह एक ऐसी जगह होनी चाहिए, जो बच्चे को उसके कठिन अतीत से निकालकर एक बेहतर भविष्य तक पहुंचाए। इसके लिए पुनर्वास की एक सुविचारित और बहुआयामी व्यवस्था आवश्यक है। इस व्यवस्था के केंद्र में शिक्षा होनी चाहिए। जिस बच्चे की पढ़ाई छूट गई है, उसे यथासंभव पुनः शिक्षा से जोड़ना होगा। जिन बच्चों के लिए औपचारिक शिक्षा कठिन है, उनके लिए व्यावसायिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण के रास्ते खोलने होंगे। कौशल केवल रोजगार का माध्यम नहीं है। यह आत्मसम्मान और गरिमा का माध्यम भी है। जब किसी युवा को यह विश्वास होता है कि वह अपने श्रम और कौशल से सम्मानपूर्वक जीवन जी सकता है तो गलत लोगों और गलत रास्तों पर उसकी निर्भरता कम होती है। कई बार अपराध किसी सुनियोजित योजना का परिणाम नहीं होता। वह कुछ क्षणों के अनियंत्रित आवेग का परिणाम होता है। क्रोध आना स्वाभाविक है, लेकिन क्रोध में लिया गया निर्णय जीवन बदल सकता है। इसलिए बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुकें, परिस्थिति से थोड़ी दूरी बनाएं, गहरी सांस लें, किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें और स्वयं से पूछें-'मैं अभी जो करने जा रहा हूं, क्या वह मेरे भविष्य को बेहतर बनाएगा?' कई बार जीवन बदलने के लिए केवल कुछ सेकेंड रुक जाना ही पर्याप्त होता है।
पुलिस की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है। आधुनिक पुलिसिंग केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करने का नाम नहीं है। उसका उद्देश्य अपराध की रोकथाम, समुदाय के साथ विश्वास का निर्माण और सुरक्षित परिवेश तैयार करना भी है। हमारी वास्तविक सफलता तब होगी, जब हम यह कह सकें कि कितने बच्चों को हमने नशे से बचाया, शिक्षा से जोड़ा, कौशल दिया, आत्मनिर्भर बनाया और कितनों को एक सामान्य, सम्मानजनक और उत्पादक जीवन में वापस पहुंचाया। एक बच्चा जब संरक्षण गृह से निकले तो उसके हाथ में शिक्षा, कौशल और रोजगार, स्वस्थ संबंधों, नशे और नकारात्मक संगति से दूर रहने की योजना होनी चाहिए और अपने जीवन को सार्थक बनाने का विश्वास होना चाहिए। जब एक युवा नशे की जगह सपनों, क्रोध की जगह अनुशासन, निर्भरता की जगह कौशल और अपराध की जगह जिम्मेदारी को चुनता है तो समाज केवल एक सुधरा हुआ व्यक्ति प्राप्त नहीं करता, उसे एक नया नागरिक मिलता है। यही वह दूसरा अवसर है, जो किसी एक बच्चे का जीवन बदलने से आगे बढ़कर पूरे समाज और राष्ट्र का भविष्य बदल सकता है।
(लेखक कोसी रेंज सहरसा में पुलिस उप महानिरीक्षक हैं)






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