विचार: अमेरिकी बाजार का विकल्प खोजे भारत
अमेरिका ने भारत सहित 60 देशों पर जबरन श्रम से जुड़े टैरिफ पहले ही लगा रखा है, जिससे भारत पर अमेरिका के मौजूदा टैरिफ 10 प्रतिशत और हो गए हैं।
HighLights
अमेरिकी 'सैंक्शनिंग रशिया एक्ट' भारत के लिए आर्थिक चुनौती।
रूस से तेल आयात पर भारत पर 110% अतिरिक्त टैरिफ।
भारत को वैकल्पिक निर्यात बाजार और घरेलू सुधारों पर ध्यान।
हिमांशु जायसवाल। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से अनुमोदित होने के बाद लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एक्ट-2026 ने कानून का रूप ले लिया है। इस कानून के लागू होने से भारत के आर्थिक हितों पर गंभीर असर पड़ सकता है। सबसे चिंता की बात इस एक्ट का वह प्रविधान है, जिसके तहत अमेरिका उन शीर्ष पांच देशों पर सौ प्रतिशत तक का टैरिफ बढ़ा सकता है, जो देश कानून लागू होने के बाद भी रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस आयात करते रहते हैं।
हाल के समय में कच्चे तेल के आयात का बिल कम करने और वैश्विक अनिश्चितता के बीच रणनीतिक फायदा उठाने के लिए भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाना शुरू किया है, जिससे रूस से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात बढ़ा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष से पहले भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी सिर्फ दो प्रतिशत थी, पर अब यह 50 प्रतिशत हो गई है। रूसी कच्चे तेल का आयात इस साल जनवरी में 4.54 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) से बढ़कर मई में 8.96 एमएमटी हो गया। हालांकि आपूर्ति सुरक्षित करने में विविधता लाने की यह रणनीति कारगर रही है, पर इसके अपने कूटनीतिक परिणाम भी हैं, खासकर अमेरिका के साथ संतुलन बनाने में, जो इस आयात का पक्षधर नहीं है।
अमेरिका ने भारत सहित 60 देशों पर जबरन श्रम से जुड़े टैरिफ पहले ही लगा रखा है, जिससे भारत पर अमेरिका के मौजूदा टैरिफ 10 प्रतिशत और हो गए हैं। अब अगर रूस सैंक्शन एक्ट लागू हो जाता है और भारत रूस के साथ कच्चे तेल और गैस के आयात को जारी रखता है तो इस पर अतिरिक्त 110 प्रतिशत टैरिफ लग जाएगा। इससे यह सबसे ज्यादा टैरिफ वाले देशों में से एक बन जाएगा। चीन पर भी अमेरिकी टैरिफ 112.5 प्रतिशत हो जाएगा, क्योंकि वह भी रूसी तेल का बड़ा आयातक है।
अमेरिका भारत के प्रमुख निर्यात गंतव्य में से एक है। अत्यधिक टैरिफ के कारण भारत अमेरिका में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता खो सकता है, जिससे आर्थिक नुकसान होगा। भारत के समक्ष एक आर्थिक दुविधा यह है कि वह या तो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से आयात जारी रखे और अमेरिकी टैरिफ का सामना करे या फिर अमेरिका जैसे बड़े निर्यात बाजार में पहुंच बनाए रखे, लेकिन ऊर्जा के मोर्चे पर अनिश्चितता का सामना करे।
2025 में भारत ने अपने कुल निर्यात का 20 प्रतिशत अकेले अमेरिका को किया था, जिसमें प्रमुख रूप से इलेक्ट्रानिक उपकरण, फार्मा, हीरे और आभूषण, समुद्री उत्पाद आदि शामिल थे, जो कुल अमेरिकी निर्यात का 45 प्रतिशत थे। टैरिफ लगने की दशा में इन वस्तुओं का निर्यात प्रमुख रूप से प्रभावित होगा। निर्यात कम होने से भारत में उत्पादन कम होगा, जिससे पूंजी एवं श्रम पर मिलने वाला मानदेय कम होगा तथा बहुत से छोटे व्यवसाय बंद होने की कगार पर भी आ सकते हैं।
दूसरी तरफ खाड़ी देशों में चल रही अशांति से कच्चे तेल की आपूर्ति कम होने से उसके आयात मूल्य बढ़ गए हैं। ऐसे में यदि रूस से तेल एवं गैस का आयात कम किया गया तो भारत को वैश्विक बाजार में अधिक मूल्य चुकाने पड़ेंगे, जिसका सीधा प्रभाव विदेशी मुद्रा भंडार तथा व्यापार घाटे पर पड़ेगा। यह महंगाई भी बढ़ने का एक कारण हो सकता है। लगता है अमेरिका रशिया सैंक्शन एक्ट को वर्तमान में चल रही व्यापार-समझौता वार्ता में भारत पर दबाव बनाने के रूप में उपयोग करना चाहता है, ताकि उसे भारत का घरेलू बाजार आसानी से उपलब्ध हो सके। भारत को किसी भी दबाव में आए बिना अपने व्यापार हित एवं नीति तय करनी चाहिए। फरवरी में हुए द्विपक्षीय समझौते में भारत पर अमेरिका द्वारा 18 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने पर सहमति बनी थी। इस एक्ट द्वारा अमेरिका अपने ही करार से मुकर रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत कई उपाय कर सकता है।
भारत को अमेरिका से आगे देखना चाहिए और वैकल्पिक बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ानी चाहिए। भारत को अपने निर्यात के लिए नए बाजार देखने चाहिए, जहां भारत के वस्तुओं की मांग हो। इस क्रम में मुक्त व्यापार समझौता एक अच्छी नीति है। भारत-यूरोपीय संघ के बीच हुआ व्यापार समझौता मददगार साबित हो सकता है। इसी तरह भारत-ब्रिटेन, भारत-आस्ट्रेलिया, भारत-न्यूजीलैंड समझौते भी भारतीय निर्यात के लिए पहुंच उपलब्ध कराएंगे। हालांकि निर्यात में विविधता लाना कोई रामबाण इलाज नहीं है।
यह इस पर निर्भर करता है कि दूसरे बाजार भारत के अतिरिक्त आयात को कितना अपना सकते हैं। पर्याप्त बाहरी मांग न होने पर विविधता सीमित रह सकती है। भारत को अपनी आयात कर दरों में सुधार करते हुए उन्हें कम करने पर भी ध्यान देना चाहिए। सस्ते आयातित माल से उपभोक्ता मांग एवं व्यापार प्रतिस्पर्धा दोनों में ही सुधार हो सकता है। इसके साथ-साथ लगातार घरेलू सुधार भी होने चाहिए, जैसे व्यापार को आसान बनाना, नान-टैरिफ बाधाओं को हटाना, लाजिस्टिक्स और मानकों में सुधार करना और सामान की क्वालिटी को बेहतर बनाना। ऐसी रणनीति न केवल भविष्य के भू-राजनीतिक झटकों का सामना करने की भारत की क्षमता को बढ़ाएगी, बल्कि लंबे समय में उसकी निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को भी मजबूत करेगी।
(लेखक नई दिल्ली स्थित सेंटर फार सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस में सलाहकार हैं)

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