विचार: अस्थिरता से घिरा पाकिस्तान
पाकिस्तान इस समय राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक दबाव और बिगड़ती आंतरिक सुरक्षा जैसी कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, जिसमें टीटीपी और बीएलए का बढ़ता आतंकवाद प्रमुख है
HighLights
पाकिस्तान राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक दबाव और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से घिरा।
टीटीपी और बीएलए का आतंकवाद देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा।
भारत को पाकिस्तान की स्थिति पर सतर्क निगरानी और तैयारी रखनी चाहिए।
आनंद कुमार। पाकिस्तान इस समय राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक दबाव और बिगड़ती आंतरिक सुरक्षा जैसी कई चुनौतियों से एक साथ जूझ रहा है। एक ओर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) की गतिविधियों ने सुरक्षा बलों की चिंता बढ़ा रखी है तो दूसरी ओर अफगानिस्तान के साथ बढ़ता तनाव और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई को लेकर सरकार तथा पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआइ) के बीच टकराव ने राजनीतिक व्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है।
आर्थिक मोर्चे पर पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। इन परिस्थितियों का प्रभाव केवल पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया की सुरक्षा और भारत की रणनीतिक चुनौतियों से भी जुड़ा हुआ है।
पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू आतंकी हिंसा में वृद्धि है। ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स के अनुसार विश्व में आतंकवाद से प्रभावित देशों में पाकिस्तान पहले स्थान पर पहुंच गया है। रिपोर्ट में 2025 के दौरान आतंकवाद से संबंधित 1,139 मौतों और 1,045 घटनाओं का उल्लेख किया गया है।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वैश्विक स्तर पर आतंकी हिंसा में कमी दर्ज की गई, जबकि पाकिस्तान में इसके विपरीत रुझान दिखाई दिया। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 2025 के दौरान आतंकी हमलों और उनसे होने वाली मौतों में गिरावट आई, लेकिन पाकिस्तान में हिंसा लगातार बढ़ती रही। इससे स्पष्ट होता है कि देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती केवल आतंकी घटनाओं को रोकने की नहीं, बल्कि उनके पीछे मौजूद संगठनों, स्थानीय परिस्थितियों और राजनीतिक-सामाजिक कारणों से निपटने की भी है।
टीटीपी पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बनकर उभरा है। इस संगठन ने विशेष रूप से खैबर पख्तूनख्वा और उसके आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को निशाना बनाया है। पाकिस्तान के सीमावर्ती और अशांत क्षेत्रों में पुलिस तथा सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर दबाव लगातार बना हुआ है। पाकिस्तान के लिए चुनौती यह भी है कि सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाने वाली हिंसा स्थानीय प्रशासन की कार्यक्षमता, नागरिकों के विश्वास और सामान्य जनजीवन को प्रभावित करती है।
पाकिस्तान की दूसरी बड़ी सुरक्षा चुनौती बलूचिस्तान में सक्रिय बीएलए से जुड़ी है। टीटीपी की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र है, जबकि बीएलए बलूच राष्ट्रवाद के नाम पर लड़ाई लड़ रहा है। दोनों संगठनों की पृष्ठभूमि, उद्देश्य और गतिविधियों को एक ही श्रेणी में रखकर नहीं देखा जा सकता। बलूचिस्तान में हिंसा का एक आयाम चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और चीनी परियोजनाओं की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
चीन ने पाकिस्तान में बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और परिवहन से संबंधित कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में बड़ा निवेश किया है। यदि बलूचिस्तान में हिंसा जारी रहती है, तो इससे पाकिस्तान की आर्थिक योजनाओं, विदेशी निवेश और चीन के साथ उसके रणनीतिक सहयोग पर दबाव पड़ सकता है।
आतंकवाद के साथ ही पाकिस्तान की अफगानिस्तान संबंधी समस्या भी गंभीर होती जा रही है। इस्लामाबाद का आरोप है कि टीटीपी अफगान क्षेत्र का उपयोग करके पाकिस्तान में हमले करता है। अफगान तालिबान इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता। दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव और सैन्य कार्रवाई की खबरों ने इस विवाद को और बढ़ाया है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच अविश्वास का यह माहौल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी चिंता पैदा करता है। टीटीपी और अफगान तालिबान अलग संगठन हैं।
उनके बीच वैचारिक तथा ऐतिहासिक संबंधों के बावजूद उनकी गतिविधियों और जिम्मेदारियों का अलग-अलग आकलन किया जाना चाहिए। फिर भी, पाकिस्तान को अपने यहां मौजूद आतंकवादी नेटवर्क, भर्ती, वित्तपोषण और स्थानीय समर्थन के स्रोतों पर भी ध्यान देना होगा। अफगानिस्तान के साथ लगातार टकराव से दोनों देशों के संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है और सीमावर्ती आबादी को नुकसान पहुंच सकता है। भारत के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंधों में अस्थिरता का प्रभाव व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा परिवेश पर पड़ सकता है।
पाकिस्तान का राजनीतिक संकट इस सुरक्षा चुनौती को और जटिल बनाता है। इमरान खान की रिहाई की मांग को लेकर पीटीआइ ने 27 सितंबर को इस्लामाबाद में प्रस्तावित मार्च को आगे बढ़ाकर 4 अक्टूबर करने की घोषणा की। मार्च का स्थगन पीटीआइ की संगठनात्मक कठिनाइयों का संकेत हो सकता है, लेकिन इससे पाकिस्तान में राजनीतिक ध्रुवीकरण समाप्त होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। राजनीतिक अस्थिरता का असर शासन और सुरक्षा संस्थानों के कामकाज पर भी पड़ सकता है।
आर्थिक कठिनाइयां भी इस पूरे संकट का अहम हिस्सा हैं। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें, महंगाई और आम नागरिकों पर बढ़ता वित्तीय दबाव सरकार के लिए अतिरिक्त चुनौतियां पैदा करते हैं। आर्थिक संसाधनों की कमी के बीच आतंकवाद से निपटने, सुरक्षा बलों की तैनाती और सीमावर्ती तनाव का प्रबंधन करने की लागत बढ़ जाती है। यदि राजनीतिक अस्थिरता के कारण आर्थिक सुधारों एवं प्रशासनिक निर्णयों पर कोई सहमति नहीं बनती, तो आम जनता की कठिनाइयां और बढ़ सकती हैं।
भारत के लिए पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति का अर्थ न तो स्वतः किसी बड़े सुरक्षा संकट की शुरुआत है और न ही यह मान लेने का आधार कि उसकी चुनौतियां भारत के पक्ष में काम करेंगी। आतंकी संगठनों की गतिविधियां, सीमा पार से संभावित खतरे और क्षेत्रीय अस्थिरता पर सतत निगरानी आवश्यक है। भारत को अपनी खुफिया क्षमताओं, सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी व्यवस्था और सैन्य तैयारियों को मजबूत बनाए रखना चाहिए।
भारत वहां के घटनाक्रम पर सतर्क दृष्टि रखे, संभावित खतरों के प्रति तैयार रहे और अपनी नीतियां वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर तय करे। भारत की सुरक्षा के हित में तैयारी, संयम और तथ्य-आधारित आकलन का संतुलन बनाए रखना ही सबसे महत्वपूर्ण होगा।
(लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में फेलो हैं)




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