केसी त्यागी। गत दिनों केंद्र सरकार ने बताया कि वह उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने और भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों पर पुनर्विचार कर रही है, जिन्हें शीर्ष अदालत ने इस साल जनवरी में 'अस्पष्ट और दुरुपयोग' की आशंका वाला बताते हुए स्थगित कर दिया था। लिहाजा इस प्रक्रिया के पूरा होने तक न्यायालय इन याचिकाओं पर सुनवाई स्थगित कर सकता है। तब आंदोलित छात्रों ने दावा किया था कि यूजीसी के नियम उनके लिए भेदभावपूर्ण एवं अनुचित हैं।

इसी बीच बिहार सरकार द्वारा गठित सवर्ण आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हर जिले में एक नोडल अधिकारी की तैनाती का फैसला किया। इसका उद्देश्य सवर्ण समाज यानी सामान्य वर्ग की शिकायतों का त्वरित समाधान करना और उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने से बचाना है। आयोग का मानना है कि इस वर्ग में 50 प्रतिशत से अधिक लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे लोगों को सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक सहायता का लाभ समय-समय पर मिले, इसके लिए आयोग नई व्यवस्था लागू कर रहा है। सरकार के इस निर्णय को बांकीपुर विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों के संदर्भ में देखा जा रहा है, पर ध्यान रहे कि अन्य राज्यों में भी सामान्य वर्ग विभिन्न कारणों से चिंतित है।

देश में प्रथम सवर्ण आयोग का गठन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में 2011 में किया गया था, ताकि सामान्य यानी जनरल वर्ग के शैक्षणिक और आर्थिक आधार की जांच-पड़ताल की जा सके। 2013 में आयोग ने 11 जिलों के सर्वेक्षण के आधार पर सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कहा गया कि सालाना डेढ़ लाख रुपये कमाने वाले सवर्ण परिवार गरीब माने जाएं। गरीब सवर्णों को सभी कल्याणकारी योजनाओं के दायरे में रखा जाए। कक्षा एक से 10 तक के ऐसे छात्र, जिनकी पारिवारिक आय डेढ़ लाख रुपये या उससे कम होगी, ऐसी सामान्य जाति के छात्रों को भी छात्रवृत्ति मिले।

सवर्ण आयोग की सिफारिशों पर नीतीश सरकार ने अमल शुरू किया और सालाना डेढ़ लाख रुपये से कम आमदनी वाले सवर्ण जाति के परिवारों के जो बच्चे प्रथम श्रेणी में दसवीं की परीक्षा पास करेंगे, उन्हें 10,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि बंटनी शुरू हो गई। पिछले 21 वर्षों के शासनकाल में सवर्णों का अधिकांश मत प्रतिशत एनडीए को मिलता रहा। बांकीपुर से एनडीए के उम्मीदवार के पराजित होने पर राजनीतिक दलों को सामान्य वर्ग की बेचैनी का अहसास हुआ है। इस पराजय का असर अन्य राज्यों तक पहुंच चुका है, जहां हाल में सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने गठबंधन का नया नामकरण कर सबको चौंका दिया। उत्तर प्रदेश में ‘पीडीए’ का काफी प्रचार-प्रसार हुआ है, जिसमें पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों को परिभाषित किया गया। पिछले दिनों समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र की जयंती पर अखिलेश यादव ने पी(पिछड़े) को ‘पंडित’ से संबोधित कर सारी परिभाषा बदल डाली। अब सपा, बसपा अपने प्रतिद्वंद्वी दलों से आगे बढ़कर सवर्णों को रिझाने में लगे हैं।

देश में बिहार को सामाजिक परिवर्तनों की उर्वर भूमि के रूप में जाना जाता है। भारत रत्न से सम्मानित कर्पूरी ठाकुर देश के पहले राजनेता थे, जिन्होंने सवर्णों के कमजोर वर्गों को आरक्षण की हिमायत की थी। 1971 में इन्हीं वर्गों के आरक्षण को लेकर मुंगेरीलाल आयोग का गठन किया गया। इसकी अनुशंसाएं कागजों तक ही सीमित रहीं। 1977 में जनता पार्टी के गठन के बाद कर्पूरी जी बिहार के मुख्यमंत्री बने और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू करते समय एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आरक्षण का लाभ केवल अपेक्षाकृत सशक्त पिछड़ी जातियों तक सीमित न रह जाए, बल्कि अत्यंत पिछड़े और सवर्णों में आर्थिक रूप से वंचित जातीय समूहों को भी इसका लाभ मिले।

कर्पूरी ठाकुर फार्मूला सामाजिक न्याय की राजनीति में एक मील का पत्थर माना जाता है, जिसके तहत गरीब सवर्णों और महिलाओं के लिए तीन प्रतिशत के अलग आरक्षण की व्यवस्था की गई। इससे आर्थिक तौर पर गरीब सवर्णों के आरक्षण का एक रास्ता खुल गया। 1991 में कांग्रेस की सरकार ने पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्री काल में सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था। इससे पूर्व 1990 में उग्र मंडल-विरोध के चलते वीपी सिंह भी इन वर्गों के लिए 10 प्रतिशत के आरक्षण की हिमायत कर चुके थे।

राव सरकार के फैसले को 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। फिर 2003 में वाजपेयी सरकार ने इस संबंध में एक मंत्री समूह का गठन किया। आखिरकार 2019 में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने दो कदम आगे बढ़कर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए कानून बनाया। हालांकि बिहार में 2011 में गठित सवर्ण आयोग की सभी सिफारिशें तो लागू नहीं हो पाईं, लेकिन इसके गठन ने सामान्य वर्ग में एक महत्वाकांक्षी समूह पैदा कर दिया है-न केवल बिहार में, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी। यह वर्ग आज अपने हितों के लिए सक्रिय है। यह समाज और राष्ट्र के हित में है कि अन्य वर्गों की तरह सामान्य वर्ग की भी जायज मांगें सुनी जानी चाहिए।

(लेखक पूर्व सांसद हैं)