आर के विज। समाज में गिरफ्तारी को एक कलंक की तरह देखा जाता है। गिरफ्तारी का असर व्यक्ति की सेहत और दिमाग पर भी पड़ सकता है। संविधान हमें गरिमा से जीने का अधिकार देता है और उसमें कोई भी दखल कानून द्वारा तय की गई प्रक्रिया का पालन किए बिना नहीं दिया जा सकता।

संविधान के अनुच्छेद 22(1) में यह प्रविधान है कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने पर उसे जितनी जल्दी हो सके, गिरफ्तारी के आधारों के बारे में बताया जाए। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रविधान का उल्लंघन करने पर कड़ा रुख अपनाया है। अनुच्छेद 22(2) में यह भी प्रविधान है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और अभिरक्षा में लेने के 24 घंटे के अंदर उसे नजदीकी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाए और बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के उसे 24 घंटे से अधिक की अवधि तक अभिरक्षा में न रखा जाए।

गिरफ्तारी के आधार के बारे में बताने का यही प्रविधान दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 50 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47) में और 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रविधान सीआरपीसी की धारा 57 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58) में किया गया है, परंतु यह सूचना किस प्रकार अर्थात मौखिक या लिखित स्वरूप में दी जाए, इसका स्पष्ट प्रविधान नहीं किया गया है।

आरोपित को सूचना देने का तरीका मौखिक हो या लिखित, इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान और कानून के प्रविधानों की व्याख्या की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरोपित को गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देने का उद्देश्य उसे अपने बचाव की तैयारी करने का पर्याप्त मौका देना है, ताकि वह पुलिस रिमांड या न्यायिक अभिरक्षा का विरोध कर सके और जमानत की मांग कर सके। यह प्रविधान केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि संविधान में प्रदत्त अधिकारों की समुचित रक्षा करने के लिए है।

कोर्ट ने कहा है कि दो कारणों से लिखित में सूचना देना आवश्यक है। प्रथम, मौखिक सूचना देने से तथ्यात्मक जानकारी के आदान-प्रदान में विवाद उत्पन्न हो सकता है। द्वितीय, लिखित में जानकारी देने से आरोपित अपना बचाव पक्ष ठीक से कर सकता है। इसीलिए संवैधानिक प्रविधानों का सही मकसद तभी पूरा होगा, जब गिरफ्तारी के आधार लिखित में उपलब्ध कराए जाएं।

ऐसे ही निर्देश हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रबीर पुरकायस्थ’ (2024) प्रकरण में गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की व्याख्या करते हुए दिए और यह स्पष्ट किया कि यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो गिरफ्तारी को गैर-कानूनी करार दिया जाएगा और आरोपित को बिना शर्त रिहा कर दिया जाएगा।

‘विहान कुमार’ (2025) प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान, विशेष अधिनियम हो या भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत घटित अपराध, इनमें भेद नहीं करता। अर्थात सभी प्रकार के अपराधों में आरोपित को जितनी जल्दी हो सके, गिरफ्तारी के आधारों के बारे में लिखित में सूचित किया जाना जरूरी है।

‘मिहिर राजेश शाह’ (2025) प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त व्याख्या को और मजबूत करते हुए चार बिंदुओं पर स्पष्ट निर्देश दिए। प्रथम, कानून कोई भी हो, गिरफ्तारी के आधार की सूचना समस्त अपराधों में आरोपित को देना अनिवार्य है। दूसरा, गिरफ्तारी के आधार लिखित में देना जरूरी है और वे गिरफ्तार व्यक्ति की भाषा में दिए जाएं।

तीसरा, गिरफ्तारी के आधार की सूचना यथासंभव गिरफ्तारी के बाद जल्द-से-जल्द दिए जाएं और जहां शीघ्र लिखित में देना संभव न हो, वहां मौखिक रूप से दिए जाएं, परंतु आरोपित को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के दो घंटे पहले आवश्यक रूप से लिखित में दिए जाएं।

चौथा, यदि उपरोक्त निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है अर्थात आरोपित को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने से दो घंटे पहले तक गिरफ्तारी के आधारों से सूचित नहीं किया जाता तो गिरफ्तारी अवैध घोषित की जाएगी और आरोपित को रिहा कर दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब प्रकरण दस्तावेजी साक्ष्य पर आधारित हो या गिरफ्तारी से पहले उसे थाने में उपस्थित होने का नोटिस दिया गया हो, तो उसे गिरफ्तार करने से पहले या गिरफ्तार करते समय लिखित में गिरफ्तारी के आधारों से आवश्यक रूप से सूचित किया जाए।

यदि आरोपित को रिहा करने के बाद गिरफ्तार करने की पुन: आवश्यकता हो, तो पुलिस मजिस्ट्रेट को उसकी गिरफ्तारी के कारणों और आवश्यकता से अवगत कराएगी, पूर्व में गिरफ्तारी के आधार क्यों नहीं दिए गए, उसका भी कारण बताएगी और गिरफ्तारी तथा अभिरक्षा की मांग करेगी, जिस पर संबंधित मजिस्ट्रेट यथासंभव सात दिन के अंदर इसका निपटारा करेंगे।

उपरोक्त निर्देशों के बावजूद जब सुप्रीम कोर्ट ने हाल में ‘जसकरण जीत सिंह देओल’ (2026) प्रकरण में पाया कि आरोपित को गिरफ्तारी के आधार के बारे में लिखित में सूचित नहीं किया गया था, तो उसने सख्ती करते हुए कहा कि इस मामले में लापरवाह पुलिस अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच की जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक प्रकरण में अग्रिम कार्यवाही किसी दूसरे विवेचक को हस्तांतरित करनी होगी। चूंकि गिरफ्तारी के आधारों की सूचना न देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, इसलिए हाई कोर्ट आरोपित को उचित मुआवजा भी देगा।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि पुलिस अधिकारियों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन और कानून का पालन ईमानदारी से करना होगा। बिना किसी चूक के गिरफ्तारी के आधारों की लिखित में सूचना तय समय-सीमा में आरोपित को देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को विशेष नजर रखनी होगी।

पुलिस अधिकारियों को इस विषय पर पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित करना होगा। अब चूंकि गिरफ्तारी के आधारों का लिखित में देने का सिद्धांत स्थापित हो चुका है, ऐसे में केंद्र सरकार चाहे तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और विशेष अधिनियमों में तदनुसार संशोधन भी कर सकती है।

(लेखक छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक रहे हैं)