विचार: लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं संस्थाओं पर हमले
कुल मिलाकर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य इस समय एक नाजुक स्थिति में है। यह और नाजुक न बने, उससे बचने के लिए आवश्यक होगा कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की आड़ में राजनीति न की जाए।
HighLights
विपक्ष चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण पर आक्रामक।
कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अभियान छेड़ा।
संस्थाओं पर राजनीतिक हमले लोकतंत्र के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
राहुल वर्मा। हाल में विपक्ष की राजनीति के नए तेवर देखने को मिले हैं। उसके तेवरों की तपिश मुख्य रूप से चुनाव आयोग और उसके द्वारा कराई जा रही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण यानी एसआइआर की प्रक्रिया को झेलनी पड़ रही है। बीते दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों अन्य आयुक्तों के बीच एक अंग्रेजी दैनिक में छपी खबर के बाद से चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष और मुख्यतः कांग्रेस नए सिरे से आक्रामक हुई है। इसी सिलसिले में कांग्रेस ने 30 सितंबर को आइएनडीआइए की बैठक बुलाई और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध अभियान चलाने का एलान भी किया।
काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दो अक्टूबर को मुंबई में विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया। इस घटनाक्रम को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि चुनाव आयोग और एसआइआर का मुद्दा क्या विपक्षी दलों के लिए संजीवनी साबित हो सकता है और उनमें एकता का भाव बढ़ाएगा?
जहां तक एसआइआर की बात है तो भले ही इसे लेकर कुछ विवाद उठ खडे हुए हों, लेकिन यह एक नितांत आवश्यक प्रक्रिया है। अगर चुनाव आयोग को यह मूलभूत दायित्व मिला हुआ है कि वह देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संपादित कराए तो इस संवैधानिक संस्था की यह भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि चुनाव प्रक्रिया में वैध मतदाता ही शामिल हों। वैध मतदाताओं के बिना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एसआइआर जैसी प्रक्रिया और महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत जैसे विशाल एवं विविधता से परिपूर्ण लोकतंत्र में मतदाता सूचियों में विसंगतियां सामान्य बात है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कुछ मतदाताओं के निधन या स्थान परिवर्तन अथवा एक से अधिक स्थानों पर मतदाता के रूप में मौजूदगी से विसंगतियां बढ़ती हैं, जिन्हें समय-समय पर दूर किया जाना आवश्यक है। यह शुद्धीकरण भी कोई आसान कवायद नहीं। चूंकि यह प्रक्रिया इतने बड़े पैमाने पर हो रही है, इसलिए उसमें कुछ त्रुटियों का रह जाना भी बहुत स्वाभाविक है। चुनाव आयोग को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इस प्रक्रिया में सामने आने वाली गड़बड़ियों को तत्परता के साथ सुधारा जाए, ताकि उस पर अंगुलियां न उठ सकें।
एसआइआर की प्रक्रिया में कतिपय कमियों का मुद्दा उठाकर ही विपक्ष इसे लेकर अपना नैरेटिव बनाने में जुटा है। एसआइआर की प्रक्रिया बिहार विधानसभा चुनाव के साथ शुरू हुई, लेकिन विपक्षी दल विशेषकर कांग्रेस महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही वोट-चोरी को मुद्दा बनाने में जुटी है। उसके बाद से कई चुनाव भी हो चुके हैं, लेकिन लगता नहीं कि इस मुद्दे का कोई विशेष असर हुआ। अब तो राहुल गांधी 2024 के लोकसभा चुनाव को भी वोट चोरी के साथ जोड़ रहे हैं, लेकिन यह भी एक बड़ा सवाल है कि क्या उनका नैरेटिव जनता के बीच कोई असर छोड़ पाएगा। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इससे एक संस्था के रूप में चुनाव आयोग कमजोर दिखेगा और मुख्य चुनाव आयुक्त के कद पर भी असर पड़ेगा।
इसमें संदेह नहीं कि पिछले लोकसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को अपेक्षाकृत कहीं अधिक सफलता मिली। पार्टी तीन अंकों से ठीक पहले ठिठक गई, लेकिन लगातार दो लोकसभा चुनावों में हुए मानमर्दन के बाद यह जीत कुछ सम्मानजनक जरूर रही। सत्ता में आई भाजपा पहले की तरह उतनी ताकतवर नहीं रही। वैसे भी जब कोई सरकार लगातार तीसरे कार्यकाल में आ जाए तो उसके साथ कुछ मुश्किलें शुरू हो ही जाती हैं। मौजूदा घरेलू एवं वैश्विक चुनौतियों ने भी सरकार की राह कुछ कठिन कर दी है। खास तौर से आर्थिक मोर्चे पर आ रही मुश्किलें सरकार की कठिनाइयां और बढ़ा सकती हैं, क्योंकि जब लोगों को रोजगार की कमी से लेकर महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी तो उसका असर सरकार की लोकप्रियता पर भी पड़ेगा। पेपर लीक जैसे मुद्दों ने भी उसकी मुश्किलें बढ़ाईं और इसके चलते सीजेपी के प्रदर्शन का परिणाम शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के रूप में सामने आया। इससे पहले मोदी सरकार में मंत्रियों के इस तरह इस्तीफे नहीं हुए। यह इसका संकेत है कि सरकार कहीं न कहीं कुछ रक्षात्मक अवश्य हुई है।
विपक्ष की ताकत कुछ बढ़ी है तो कुछ मोर्चों पर वह कमजोर भी हुआ है। एक समय विपक्षी दलों में बेहद मुखर मानी जाने वाली और विपक्षी नेतृत्व के लिए रह-रहकर दावा करने वाली तृणमूल कांग्रेस न केवल बंगाल की सत्ता से बाहर हो गई, बल्कि उसके कई सांसद भी उससे छिटक गए। पार्टी वजूद बचाने की चुनौती से दो-चार है। इसी तरह दक्षिण में कांग्रेस की लंबे समय से ढाल बनी रही द्रमुक भी पस्त पड़ गई है। परिसीमन के मुद्दे पर बेहद आक्रामक रहने वाली द्रमुक न केवल स्वयं को राजनीतिक रूप से हाशिए पर महसूस कर रही है, बल्कि कांग्रेस के साथ उसका तालमेल भी टूट चुका है।
केरलम की सत्ता से बाहर होने के बाद अब वाम दल पूरी तरह सत्ताविहीन हो चुके हैं। यह सही है कि वाम दल कभी एक बड़ी राजनीतिक शक्ति नहीं रहे, लेकिन समय-समय पर आंदोलनों को गति देने और विमर्श को आकार देने में उनकी हमेशा एक अहम भूमिका रही, जो अब कमजोर होती दिख रही है। आम आदमी पार्टी को लेकर निश्चित तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह आइएनडीआइए का हिस्सा है भी या नहीं। वैसे भी पंजाब चुनाव के साथ कांग्रेस के साथ उसकी तल्खियां बढ़नी तय हैं। राज्य स्तर के नेताओं के बीच टकराव से इसके संकेत मिलने भी शुरू हो गए हैं।
कुल मिलाकर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य इस समय एक नाजुक स्थिति में है। यह और नाजुक न बने, उससे बचने के लिए आवश्यक होगा कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की आड़ में राजनीति न की जाए। आयोग का भी यह दायित्व है कि वह राजनीतिक दलों को इसके लिए कोई अवसर न दे। यदि उसके नाम पर राजनीतिक तल्खी इसी तरह जारी रही तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो हैं)










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