गिरीश्वर मिश्र। महात्मा गांधी का स्मरण कृतज्ञ राष्ट्र द्वारा राष्ट्रपिता को सम्मान देने मात्र की बात ही नहीं, बल्कि आज की खास मानवीय जरूरत भी है। आज के दौर में जब धैर्य, सत्य, अहिंसा, करुणा, भाई-चारा, सहयोग, पारस्परिकता और विश्वास जैसे शब्द दैनिक जीवन में प्रयोग के हिसाब से बाहर होते जा रहे हैं तो उनकी जरूरत भी शिद्दत से महसूस हो रही है। ऐसे क्षणों में गांधी प्रासंगिक हो उठते हैं। उनका जीवन मानवीय चेतना के रूपांतरण की एक असाधारण कोशिश के रूप में सभ्य जगत के आधुनिक इतिहास में मिसाल बन गया है। भारत के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में उनका कर्मठ जीवन और चिंतन आज भी प्रेरित करता है।

दक्षिण अफ्रीका में हुए सत्य के उन्मेष और आत्म-साक्षात्कार के साथ गांधी जी के जीवन में सात्विक किस्म के संघर्ष की नींव पड़ी। इस संघर्ष का आधार था अपने देश-काल की चेतना की ओर एक प्रश्नाकुल दृष्टि से देख पाना। गांधी जी खुद से, अपने समाज से, औपनिवेशिक अंग्रेज सरकार से और प्रभुरूपी बैठी अंग्रेजी सभ्यता से लगातार प्रश्न पूछते रहे। वे सब कुछ जांचते-बूझते रहे और अपने लोकधर्मी विवेक से उठ रहे सवालों के जवाब तलाशने में लगे रहे, पर वे यहीं नहीं रुक जाते थे। अपने वैचारिक मंथन से उपजे निष्कर्षों को व्यवहार और आचरण में उतारने की उनकी जिद थी।

यह उनकी फितरत या आदत हो गई थी जिसे वे ‘प्रयोग’ कहते थे। गांधी जी निजी जीवन में खान-पान, स्वास्थ्य और सैर-सपाटे आदि को लेकर भी प्रयोगशील बने रहे। उनके जीवन में प्रश्न उठाना और उनसे टकराने का सिलसिला लगातार चलता रहा। जीवन के अंतिम क्षणों में भी वे देश के भविष्य के प्रश्न से उलझते रहे। अपने देहावसान के पहले जो वसीयत उन्होंने लिखाई, उसमें कांग्रेस को भंग कर ‘लोक सेवक संघ’ बनाने को कहा। वह देश में सिर्फ राजनीतिक आजादी ही नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आत्मिक स्वायत्तता को भी मौजूद देखना चाहते थे। स्वतंत्रता को हथियार बना कर वह सामाजिक, नैतिक और आर्थिक मोर्चों पर लड़ाई को जारी रखना चाहते थे। गांधी जी ने भारत के लिए 'स्वराज' का स्वप्न देखा, जिसमें देश में स्वत्व की प्रतिष्ठा थी।

महात्मा गांधी को इस बात का सदा अहसास रहता था कि वे कहां खड़े हैं। उन्होंने ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ के यथार्थ और उनमें निहित शक्ति को भारत के मौलिक चिंतन के अध्ययन से स्वयं उपार्जित किया था। वे बाइबिल और कुरान से परिचित थे, पर गीता, उपनिषद, रामायण और लोक-जीवन उनके प्रमुख विचार स्रोत बने रहे। वस्तुतः विचारों की विविधता को वे स्वाभाविक मानवीय परिघटना के रूप में ग्रहण करते थे और उन्होंने अपने आश्रम में अनेक धर्मों की प्रार्थनाओं का अध्ययन, पाठ और स्मरण का अभ्यास चलाया था। गांधी जी ने देश-काल की प्रवृत्तियों और आगामी परिवर्तनों को पहचानते हुए आगाह भी किया था।

उन्होंने सात सामाजिक पापों का जिक्र किया था और उनसे बचने के लिए सावधान किया था। जैसे कि सिद्धांतविहीन राजनीति, श्रम किए बिना धन का अर्जन, नैतिकतारहित व्यापार करना, चरित्र के सरोकार से मुक्त शिक्षा, विवेक से रहित सुख, मानवतारहित विज्ञान और त्यागरहित पूजा। समकालीन जीवन में उठ रही त्रासदियों को देखते हुए इन पर विचार करना आवश्यक हो गया है। गांधी जी अपने आचरण में निरंतर आत्म-नियंत्रण, आत्म-सम्मान, नैतिक विकास, आत्म-निर्भरता और आत्म-बल के कई सफल प्रयोग प्रदर्शित करते रहे। विचारों को कर्म में उतारना उनका बड़ा सरोकार था और इसके लिए उन्हें निजी जीवन में कष्ट भी सहना पड़ा था। वे ऐसी शिक्षा चाहते थे, जो मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा सबका भलीभांति ख्याल रख सके।

स्वतंत्रता के नायक के रूप में गांधी जी को आदर देते हुए हमने सड़कों के नामों में, नोटों और सिक्कों में और संस्थाओं के नामों में कैद कर सुरक्षित रखने की कोशिश की। यह सब करते हुए कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली गई। इस क्रम में स्मारकों के बीच बसते-बसाते गांधी जी धीरे-धीरे जीवन और आचरण से ओझल बाहर की वस्तु बनते गए। गांधी का विचार और कर्म जीवंत और चेतन से जड़वत बनाए जाते रहे। आज की स्थिति हमें उनके बताए रास्ते से भटकने की कहानी सुनाती है।

आज लोभासक्त उपभोगमय जीवन की दुर्दांत स्थिति से सारी दुनिया छटपटाती हुई कराह रही है तो जरूरी हो रहा है कि हम अपने भ्रमों को तोड़ने की हिम्मत करें। गांधी इसके लिए आंख खोलने वाले गुरु सरीखे हैं। जरूरी है कि हम उनकी दीक्षा को न केवल दोहराते रहें, बल्कि जीवन और व्यवहार में भी उतारें। जैसे कि स्वदेशी बनेंगे, सत्य बोलेंगे, अहिंसा को अपनाएंगे, अपरिग्रह की राह पर चलेंगे और अंतिम जन को नहीं भूलेंगे। मरीचिका वाली विकास यात्रा से हमें ‘यू टर्न’ भी क्यों न लेना पड़े, आज जरूरी हो रहा है कि कम से कम एक गांधी-दृष्टि वाले जीवन का न्यूनतम कार्यक्रम व्यक्ति और संस्था के स्तर पर बना कर अपनाया जाए। विश्व में भारत के पर्याय बन चुके गांधी जी को भारतीय जीवन में प्रतिष्ठित करने की जरूरत है।

(लेखक शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति हैं)