अवधेश कुमार। भारतीय पायलट कैप्टन स्मित की बहादुरी और सूझबूझ की प्रशंसा इस समय पूरी दुनिया में हो रही है। उन्होंने जिस साहस और कौशल का परिचय देते हुए फ्लाई दुबई की फ्लाइट को एक सह-पायलट के विमान को क्रैश करने के इरादे को नाकाम किया, वह अकल्पनीय है। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाई दुबई की फ्लाइट में ओमान मूल के सह पायलट ने अचानक कैप्टन स्मित पर हमला कर दिया।

माना जा रहा है कि हमलावर विमान का नियंत्रण अपने हाथ में लेकर उसे गिराना चाहता था। सोचिए उस समय विमान में बैठे लोगों की क्या स्थिति हुई होगी, जब काकपिट में हिंसक संघर्ष के दौरान विमान लगभग 17,400 फीट नीचे आ गया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कैप्टन स्मित ने अदम्य साहस से सह पायलट से संघर्ष किया और काकपिट का दरवाजा खोलने में सफल हुए। बाहर से काकपिट का दरवाजा नहीं खोला जा सकता।

अगर स्मित दरवाजा नहीं खोलते तो कुछ भी हो सकता था। दरवाजा खुल जाने के कारण ही यात्री मदद के लिए अंदर आ सके और यात्री के रूप में बैठे दो पायलटों ने विमान को नियंत्रण में लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने बिल्कुल सही कहा कि कैप्टन स्मित ने बहादुरी से मुकाबला कर 9/11 जैसी एक और घटना को होने से रोक दिया। इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी उन्हें 9/11 की पुनरावृत्ति रोकने वाला बताया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी भारतीय पायलट की प्रशंसा की।

जिन्हें भी हवाई जहाज उड़ाने का अनुभव है, वे इस घटना को असाधारण बहादुरी मानते हैं। दुर्भाग्यवश भारत में कुछ ऐसे नैरेटिव निर्माता भी हैं, जो इसे इजरायल का फाल्स फ्लैग आपरेशन यानी स्वयं की ओर से की गई कार्रवाई बताकर शर्मनाक हरकत कर रहे हैं। इन कुंठित लोगों पर चर्चा की आवश्यकता नहीं, क्योंकि संपूर्ण विश्व के समाचार पत्रों ने इस पर टिप्पणियां छापी हैं। इसके अतिरिक्त जांच आरंभ हो गई है और सारी सच्चाई सामने आ जाएगी।

इस घटना से 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमले की स्वाभाविक ही चर्चा आरंभ हो गई है, जो इस सदी की पहली सबसे बड़ी और पूरी दुनिया को हिला देने वाली आतंकी घटना थी। उस दिन आतंकियों ने चार विमानों का अपहरण किया था। पहले विमान को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी टावर से टकराया गया। कुछ देर बाद दूसरा अपहृत विमान वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दक्षिणी टावर से टकराया गया।

इससे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दोनों टावर ताश के पत्तों की तरह ढह गए। तीसरे विमान को वाशिंगटन के रक्षा मुख्यालय पेंटागन से टकराया गया। चौथा विमान पेंसिल्वेनिया के पीट्सबर्ग में ध्वस्त हो गया था। उसका निशाना कैंप डेविड था। अमेरिका उन हमलों को नहीं रोक पाया था। 9/11 हमले में शामिल आतंकी अच्छी डिग्री वाले उच्च परिवारों के थे। इनका उद्देश्य अमेरिका के अहम को ध्वस्त करना था।

ओमानी सह पायलट विमान को कहां टकराना चाहता था, अभी इसकी जानकारी नहीं, किंतु इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 2001 से इन 25 वर्षों में जिहादी आतंक की मानसिकता इतने विस्तृत रूप में फैल चुकी है कि आतंकियों के तौर-तरीकों को समझना लगभग असंभव है। इस घटना ने फिर से इसकी पुष्टि की कि 1990 के बाद से विश्व में नए सिरे से आरंभ जिहादी आतंकवाद वैचारिक रूप से खतरनाक स्तर तक फैल चुका है।

ओमानी पायलट की हरकत संकेत कर रही है कि वह शायद आत्मघाती आतंकी में तब्दील हो चुका था। कुछ लोग इसे ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले या फिर गाजा में इजरायल की कार्रवाई की प्रतिक्रिया बता रहे हैं, लेकिन आतंकी हमले केवल यहूदियों और इजरायल तक सीमित नहीं हैं? क्या इसके पहले दुनिया के अन्य देशों में अलग-अलग रूपों में आतंकी घटनाएं हमारे सामने नहीं आईं?

इजरायल जिहादी आतंक के निशाने पर इसलिए रहता है, क्योंकि यहूदियों के विरुद्ध इस्लामी जगत में घृणाजनक दुश्मनी का भाव फैलाया गया है।

विश्व का दुर्भाग्य है कि सितंबर 2001 के हमले के बाद जिस अमेरिका ने अपने नेतृत्व में आतंकवाद के विरुद्ध सघन युद्ध आरंभ कर उसके समूल नाश का संकल्प व्यक्त किया, वही धीरे-धीरे भाग खड़ा हुआ और अब उसके सक्रिय सैन्य एजेंडे में आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक संघर्ष के प्रमाण नहीं दिखते। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा आतंकवाद के सबसे बड़े केंद्र पाकिस्तान को गले लगाना विश्व के लिए खतरनाक संकेत है।

जिस अबू मोहम्मद अल-जुलानी को अमेरिका ने आतंकी घोषित किया था, उसे सीरिया का राष्ट्रपति बनने दिया गया और ट्रंप उससे हाथ मिलाने पहुंच गए। बार-बार आतंकी हमले झेलने के बावजूद आतंकवाद से संघर्ष के लिए खड़ा होने वाला पश्चिम व्यवहार में घुटने टेक चुका है। आज संघर्षरत विश्व में आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट संघर्ष नामुमकिन है। कायदे से फ्लाई दुबई फ्लाइट में घटी घटना के बाद अमेरिका जैसे देशों को आतंकवाद को लेकर अपने रवैए पर पुनर्विचार करना चाहिए।

एक भारतीय मूल के पायलट ने 9/11 की पुनरावृत्ति को भले रोक दिया, किंतु अगर जिहादी विचारधारा को समझ कर शक्तिशाली देश एकजुट नहीं हुए, तो इसके घातक परिणाम संपूर्ण मानव सभ्यता को भुगतने पड़ेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)