नूंह के साथ हरियाणा के अन्य क्षेत्रों में हुई हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार समेत हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली की सरकारों को नफरती भाषणों पर रोक लगाने और आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त सुरक्षा बल मंगाने के जो निर्देश दिए, वे समय की मांग के अनुरूप हैं। वास्तव में नफरती भाषण रोकने के निर्देश सभी राज्य सरकारों को देने चाहिए, क्योंकि ऐसे भाषण किसी राज्य विशेष तक सीमित नहीं हैं।

भड़काऊ भाषण को परिभाषित करने की भी आवश्यकता है, क्योंकि किसी बात को कोई नफरती घोषित कर देता है तो कोई उसे कटु आलोचना के रूप में व्याख्यायित करता है। एक समस्या यह भी है कि किसी के नफरती भाषण पर तो खूब शोरगुल मचता है, लेकिन किसी अन्य के ऐसे ही भाषण की अनदेखी कर दी जाती है। यह अनदेखी राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों, मीडिया के एक हिस्से और यहां तक कि कभी-कभी अदालतों की ओर से भी कर दी जाती है। कई बार तो घोर आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषण को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आवरण पहना दिया जाता है।

न जाने कितने नफरती भाषण ऐसे रहे, जिनमें किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। नूंह की हिंसा के मामले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि भड़काऊ भाषण दोनों पक्षों की ओर से दिए गए। स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यह कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए कि नफरती तत्वों को जरूरी सबक मिले। वे चाहे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी अथवा अन्य किसी वैचारिक या मजहबी समूह के।

भड़काऊ भाषणों पर कार्रवाई के मामले में दोहरे मानदंड समस्या को बढ़ाने वाले ही सिद्ध हो रहे हैं। यह जो साबित करने की कोशिश हो रही है कि ऐसे भाषण केवल किसी एक विशेष समूह या विचारधारा से जुड़े लोग ही दे रहे हैं, वह एक शरारती एजेंडा है और उसे बेनकाब करने की आवश्यकता है।

नूंह की हिंसा के मामले में आवश्यकता इसकी भी है कि उसके पीछे के कारणों की तह तक जाया जाए, क्योंकि इतनी भीषण हिंसा बिना किसी सुनियोजित साजिश के नहीं हो सकती। यदि नूंह में इतनी भयावह हिंसा नहीं होती और जलाभिषेक यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के साथ पुलिस को निशाना बनाने के अलावा बड़े पैमाने पर आगजनी, गोलीबारी और लूटपाट नहीं की जाती तो संभवतः उसकी प्रतिक्रिया में अन्य इलाकों में जो हिंसा हुई, उससे बचा जा सकता था।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से समाज को भी ऐसा कोई संदेश जाना चाहिए कि नफरत का जवाब नफरत और हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकती। सभी को यह समझना ही होगा कि शांति और सद्भाव का वातावरण ही उनके और देश के हित में है। यदि समाज अपने नैतिक और नागरिक दायित्वों को लेकर नहीं चेतता तो फिर चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगाने से भी बात बनने वाली नहीं। इतने बड़े देश में यह काम आसानी से संभव भी नहीं।