जागरण संपादकीय : सहमति या असहमति, जीएसटी काउंसिल की अगली बैठक में क्या होगा?
जीएसटी को जब सभी दलों की ओर से संसद में सहमति मिली थी तो उसे आर्थिक सुधार के मामले में एक मील के पत्थर की तरह देखा गया था और पक्ष-विपक्ष के दलों के रवैये को सराहा गया था लेकिन बाद में राहुल गांधी संकीर्ण राजनीतिक कारणों से जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताने लगे।
विपक्ष शासित आठ राज्यों ने वस्तु एवं सेवा कर अर्थात जीएसटी की दो श्रेणियां तय किए जाने की घोषणा पर जिस तरह सहमति जताई और साथ ही कुछ शर्तें भी आगे रख दीं, उससे फिलहाल यह अनुमान लगाना कठिन है कि आगामी जीएसटी काउंसिल की बैठक में क्या होगा?
इन राज्यों की ओर से कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने जीएसटी की दो श्रेणियां करने पर कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की ओर से अपनी तीन मांगें रखी हैं। अच्छा होता कि इस संदर्भ में संबंधित राज्य जीएसटी काउंसिल की बैठक में अपनी बात रखते। क्या जीएसटी के दो स्लैब को लेकर विपक्ष शासित राज्यों के राजनीतिक दल और विशेष रूप से कांग्रेस श्रेय लेने की राजनीति कर रही है अथवा यह दिखाना चाहती है कि वह हर मामले में विरोध जताना जारी रखेगी?
कहना कठिन है कि क्या पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड आदि राज्यों ने जीएसटी के मामले में कांग्रेस को अपना प्रतिनिधित्व सौंप दिया है? जो भी हो, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कांग्रेस जीएसटी की दो श्रेणियों की पैरवी करती रही है। क्या तब उसे इसके परिणामों और खासकर राजस्व में फौरी कमी आने का भान नहीं था? जीएसटी को जब सभी दलों की ओर से संसद में सहमति मिली थी तो उसे आर्थिक सुधार के मामले में एक मील के पत्थर की तरह देखा गया था और पक्ष-विपक्ष के दलों के रवैये को सराहा गया था, लेकिन बाद में राहुल गांधी संकीर्ण राजनीतिक कारणों से जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताने लगे।
इससे इनकार नहीं कि जीएसटी में समय-समय पर अनेक बदलाव करने पड़े हैं और संभवत: उसकी दो श्रेणियां बनाए जाने के बाद भी यह सिलसिला कायम रहे, लेकिन आखिर ऐसा कौन सा कानून है, जिसमें समय के साथ कुछ फेरबदल करने की आवश्यकता नहीं होती? जीएसटी की दो ही श्रेणियां किया जाना समय की मांग है। बेहतर होता कि यह मांग और पहले पूरी हो जाती। अब तो इसमें बाधा नहीं खड़ी की जानी चाहिए। आर्थिक मामलों में दलगत राजनीतिक हितों से ऊपर उठने की आवश्यकता होती है।
इस आवश्यकता को क्षेत्रीय दलों को न सही, कम से कम कांग्रेस को तो समझना चाहिए और उसकी पूर्ति में सहायक भी बनना चाहिए। निश्चित रूप से सभी राज्यों को जीएसटी में सुधारों के मामले में अपने सुझाव देने और अपनी आशंका व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर अड़ंगा लगाने का काम नहीं किया जाना चाहिए। तब तो बिल्कुल भी नहीं किया जाना चाहिए, जब जीएसटी सुधारों से राष्ट्रीय हितों का संधान हो रहा हो और आम आदमी के साथ-साथ उद्योग जगत को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त इसके जरिये ट्रंप टैरिफ की चुनौती का सामना करने में भी आसानी होगी।
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