इंदौर के भागीरथपुरा के बाद इसी जिले के महू में भी दूषित पेयजल से करीब 30 लोगों के बीमार होने की खबर यही बता रही है कि शासन-प्रशासन जरूरी सबक सीखने को तैयार नहीं। होना तो यह चाहिए था कि भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से 25 से अधिक लोगों की मौत और उसके चलते सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा रखने वाले इंदौर के प्रशासन की बदनामी के बाद राज्य भर में इसके लिए चौकसी बरती जाती कि कहीं पर भी दूषित पेयजल की आपूर्ति न होने पाए, लेकिन महू का मामला यही बता रहा है कि ऐसा नहीं किया गया। यह जन स्वास्थ्य की गंभीर उपेक्षा है।

दूषित पेयजल के मामले में केवल इंदौर की ही बात नहीं की जानी चाहिए। देश के तमाम शहरों में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते ही रहते हैं। इन सवालों की तब तक अनदेखी होती रहती है, जब तक लोग दूषित जल के कारण गंभीर रूप से बीमार न हो जाएं या फिर भागीरथपुरा की तरह काल के गाल में न समा जाएं। इसकी अनदेखी न की जाए कि पिछले कुछ समय में नोएडा, गांधीनगर समेत देश के कई शहरों में दूषित पेयजल की आपूर्ति के मामले सामने आ चुके हैं। इन मामलों की व्यापक चर्चा इसलिए हो सकी, क्योंकि भागीरथपुरा का मामला सतह पर आ चुका था।

यह किसी से छिपा नहीं कि अपने देश में पेयजल के साथ अन्य नागरिक सुविधाओं की गुणवत्ता अपने दोयम स्तर के लिए ही जानी जाती है। नगर निकाय और राज्य सरकारें पेयजल की गुणवत्ता को लेकर चाहे जो दावा करें, सच यह है कि देश के बड़े हिस्से में पेजयल की गुणवत्ता ठीक नहीं। नीति आयोग का एक अध्ययन यह कहता है कि दूषित पेयजल के कारण प्रति वर्ष करीब दो लाख लोग मरते हैं। नीति आयोग ने यह भी पाया था कि देश में 70 प्रतिशत जल स्रोत दूषित हैं।

लोग दूषित पेयजल पीने को इसलिए विवश हैं, क्योंकि नगर निकायों में जनता का प्रतिनिधित्व करने और पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाले अधिकारी अपने दायित्वों के प्रति लापरवाह हैं। आम तौर पर वे दूषित पेयजल आपूर्ति की शिकायतों को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वे अपनी दायित्वहीनता के लिए कभी दंड के पात्र नहीं बनते। अपने यहां एक बुरी प्रवृत्ति यह भी है कि दूषित पानी की आपूर्ति अथवा अन्य नागरिक सुविधाओं में कमी की खबर सामने आते ही शासन-प्रशासन की ओर से सबसे पहला काम इन खबरों को गलत साबित करने का होता है।

नतीजा यह है कि दूषित पेयजल के कारण लोग बीमार होते रहते हैं या फिर पेयजल खरीद कर पीते हैं अथवा पानी को पीने योग्य बनाने के लिए तरह-तरह के उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं। अच्छा हो कि हमारे नीति-नियंता खुद से यह सवाल करें कि क्या विकसित होते भारत में जनता शुद्ध पेयजल की भी अपेक्षा न करे?