भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई ने जानी-मानी कंपनी नेस्ले के दूध से बने उत्पाद-डेरी व्हाइटनर के एक सैंपल को दोयम दर्जे का पाने के बाद जिस तरह उसकी बिक्री, वितरण और भंडारण पर रोक लगाई, उससे यही पता चलता है कि किस तरह नामी कंपनियां भी खाद्य एवं पेय पदार्थों के गुणवत्ता संबंधी मानकों की अनदेखी कर लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रही हैं।

इस मामले में इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि डेरी व्हाइटनर के सैंपल को दिल्ली के एक पांच सितारा होटल से लिया गया था। इसका अर्थ है कि नामी जगहों पर भी घटिया किस्म की खाने-पीने की सामग्री पहुंच रही है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि एफएसएसएआइ खाने-पीने की सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सजग और सक्रिय नहीं है।

एक समस्या यह भी है कि राज्यों के खाद्य एवं औषधि विभाग भी घटिया एवं दोयम दर्जे के उत्पादों के निर्माण और बिक्री को लेकर अपेक्षित चौकसी का परिचय नहीं दे रहे। समझना कठिन है कि मिलावटी, घटिया और नकली उत्पादों के खिलाफ जैसी सख्ती महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि विभाग के आयुक्त तुकाराम मुंढे दिखा रहे हैं, वैसी अन्य राज्यों के उनके समकक्ष क्यों नहीं दिखा पा रहे हैं?

हर राज्य में तुकाराम मुंढे जैसे खाद्य एवं औषधि प्रशासन के प्रमुख भी चाहिए और इस विभाग के तहत काम करने वाले अन्य अधिकारी और कर्मचारी भी। निःसंदेह ऐसा तब होगा, जब भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण राज्यों को ऐसे निर्देश देगा कि उसके मानकों का कहीं पर भी उल्लंघन न होने पाए। ऐसे ही निर्देश केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ को भी देने होंगे, जिस पर दवाओं और मेडिकल उपकरणों की गुणवत्ता तय करने की जिम्मेदारी है।

इससे कोई अनभिज्ञ नहीं हो सकता कि जैसे आए दिन दोयम दर्जे की खाने-पीने की सामग्री बनती और बिकती हुई मिलती है, वैसे ही दवाएं भी। अपने देश में खाने-पीने की सामग्री के साथ औषधियों की गुणवत्ता के मानकों का पालन करने में इतनी अधिक लापरवाही बरती जा रही है कि ये उत्पाद घटिया किस्म के ही नहीं, बल्कि नकली भी बनते और बिकते हैं। चूंकि एफएसएसएआइ और सीडीएससीओ, दोनों ही स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत आते हैं, इसलिए इस मंत्रालय को अपनी सुस्ती का परित्याग करना होगा।

उसे यह देखना ही होगा कि देश में कहीं पर भी दोयम दर्जे की खाने-पीने की सामग्री और औषधियां न तो बनने पाएं और न ही बिकने। उसे संबंधित कंपनियों को भी चेताना होगा कि वे अपने उत्पादों की गुणवत्ता से समझौता करने से बाज आएं। यदि वे ऐसा नहीं करतीं, तो उन्हें कठोर दंड का भागीदार बनाने में संकोच नहीं किया जाए।