विचार: खतरे की घंटी है अप्रत्याशित मौसम
अल नीनो और बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण दुनिया भर में अप्रत्याशित मौसम पैटर्न भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं
HighLights
अल नीनो और बढ़ते तापमान से मौसम में अप्रत्याशित बदलाव।
भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
प्रदूषण नियंत्रण हेतु सरकारों व समाज की तत्काल जिम्मेदारी।
संजय गुप्त। इस वर्ष के प्रारंभ में ही मौसम विज्ञानियों ने चेता दिया था कि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अल नीनो प्रभाव की चपेट आएगा। अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इससे लगभग पूरी दुनिया का मौसम प्रभावित होता है। विज्ञानियों का मानना है कि अल नीनो का प्रभाव अगले वर्ष के प्रारंभ तक रह सकता है।
चूंकि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, इसलिए अल नीनो का असर भी कहीं अधिक होता जा रहा है। इसके असर से कहीं ज्यादा गर्मी पड़ती है, तो कहीं ज्यादा सर्दी। इसी तरह कहीं कम बारिश और सूखा पड़ता है, तो कहीं अधिक वर्षा होती है। जैसी आशंका थी, अल नीनो का असर भारत पर भी पड़ा। देश के कई क्षेत्र सूखा ग्रस्त हैं और कहीं ज्यादा बारिश हो गई।
भारत की कृषि मौसम के चक्र पर अत्यधिक निर्भर है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। वैसे तो भारत की जीडीपी में कृषि और इससे संबंधित क्षेत्रों की हिस्सेदारी 15-18 प्रतिशत के बीच है, लेकिन इस पर देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी निर्भर है। वर्षा कम या ज्यादा होने से जो समस्याएं आती हैं, वे फसलों के नुकसान का कारण बनती हैं। इसका बुरा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस बार 12 प्रतिशत कम बरसात हुई है।
पिछले 25 वर्षों में यह चौथी बार है, जब इतनी कम बारिश हुई है, लेकिन इसी के साथ देश के कुछ हिस्सों में आवश्यकता से अधिक बारिश हुई। बीते दिनों बंगाल की खाड़ी में बने दबाव के चलते उत्तर भारत के कई राज्यों में कम समय में आवश्यकता से अधिक बारिश हुई। इससे कई जगह बाढ़ आ गई और फसलों के नुकसान के साथ अनेक लोगों की जान भी गई। पर्वतीय राज्यों में भी बारिश की अधिकता ने समस्याएं पैदा कीं। इसके पहले तिब्बत में ग्लेशियर फटने से नेपाल में भारी बाढ़ आई थी, जिसमें हजारों लोग मारे गए।
तेजी से बदलते मौसम का चक्र समूचे विश्व के पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों के आम लोग मौसम में अप्रत्याशित बदलाव के पीछे के कारणों को समझने में असमर्थ हैं। समस्या यह है कि जो लोग इसके कारणों को समझते हैं, वे भी पर्यावरण को दूषित करने के साथ प्रकृति का अधाधुंध दोहन कर रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन लगभग 40-50 वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब उद्योगीकरण अपने पूरे जोर पर था और जब प्रदूषण रोधी तकनीक विकसित नहीं हो पाई थी।
पहले मौसम विज्ञानियों को प्राकृतिक संसाधनों के मनमाने दोहन को लेकर इसका अनुमान नहीं था कि इसका आगे चलकर पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसके चलते विकसित देशों ने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी रखा और आज जब वे इसके दुष्परिणामों से परिचित हो चुके हैं, तब भी ऐसा करने में लगे हुए हैं। यह तब है, जब उन्हीं के मौसम विज्ञानियों ने काफी पहले आगाह करना शुरू कर दिया था कि संभल जाएं, नहीं तो गंभीर संकट आने वाला है।
वे यह भी बता रहे थे कि प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन धरती का तापमान बढ़ा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से धरती के बढ़ते तापमान को रोकने के लिए जलवायु सम्मेलन हो रहे हैं और उनमें पर्यावरण को बचाने के उपायों पर सहमति भी बन रही है, लेकिन उन पर अमल नहीं हो पा रहा है। यदि हो भी रहा है, तो आधे-अधूरे ढंग से। अमेरिका खासतौर पर अपनी जिम्मेदारी निभाने को तैयार नहीं।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जलवायु परिवर्तन को नकारते हैं। उनके कारण अमेरिका ने फरवरी 2027 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन से पूरी तरह बाहर होने की घोषणा की है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने अपने को विकसित करने के क्रम में प्राकृतिक संसाधनों का मनमाने तरीके से दोहन किया है, अभी भी करने में लगा हुआ है। विकसित देश यह चाह रहे हैं कि विकासशील देश अपने विकास की अनदेखी कर जलवायु परिवर्तन रोकने के उपाय करें, पर वे इन देशों को वह तकनीक देने को तैयार नहीं, जिससे धरती के तापमान को बढ़ाने वाले कारणों का निवारण किया जा सके। इस सबके नतीजे में ही मौसम में अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
भारत विश्व की सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। भारत के विकासशील देश होने के नाते यहां मौसम के तेजी से बदलते चक्र का कहीं अधिक प्रभाव देखने को मिल रहा है। इसका असर किसानों और गरीब जनता पर सबसे अधिक होता है। लोग भले ही रोजमर्रा के जीवन में मौसम के तेजी से बदलते चक्र को महसूस न कर पाएं, लेकिन अब समय आ गया है कि सरकार लोगों को प्रकृति के संरक्षण को लेकर जागरूक करे।
उसे लोगों को यह भी समझाना होगा कि प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन और उपभोग प्रदूषण बढ़ाने का काम कर रहा है। जहां केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों को ऐसी ठोस योजनाएं बनानी होंगी, जिससे प्रदूषण की रोकथाम हो, वहीं लोगों को भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी। बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए भारत को अब ठोस उपाय करने ही होंगे, क्योंकि उनके अमल में देर हो चुकी है। ध्यान रहे कि कुछ अध्ययन यह कह रहे हैं कि यदि सर्दियों में होने वाला प्रदूषण कम नहीं होता, तो फसलों की पैदावार कम होने की आशंका है।
इसका कारण यह है कि अधिक प्रदूषण से उत्तर भारत में सूरज की रोशनी धरती पर कम पहुंच पाती है और यह पैदावार पर असर डालती है। जो प्रदूषण बरसात के बाद आता है, उसे नियंत्रित करने की अब तमाम तकनीक उपलब्ध हैं, फिर भी जाने-अनजाने उसका समुचित उपयोग नहीं हो रहा है। इसका कारण औसत देशवासियों का पर्यावरण रक्षा के प्रति सतर्क न होना भी है। इसी वजह से कहीं फसलों के अवशेष जलते हैं, तो कहीं कूड़ा-करकट।
इसी तरह पुरानी गाड़ियों को चलाया जाता रहता है, भले ही वे कितना भी प्रदूषण छोड़ रही हों। न जाने कितने औद्योगिक समूह ऐसे हैं, जो जानबूझकर हवा, पानी और मिट्टी प्रदूषित कर रहे हैं। वे प्रदूषण रोधी तकनीक अपनाना ही नहीं चाह रहे, जबकि वह पहले के मुकाबले सस्ती हो गई है। यदि सरकारों के साथ समाज पर्यावरण की रक्षा को लेकर चेतता नहीं, तो जलवायु परिवर्तन को रोकना और उसके दुष्प्रभावों से बचना कठिन ही होगा।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)











