विचार: और सशक्त हो परमाणु आवरण
पोखरण परीक्षणों के तीन दशक बाद भारत के लिए भी आवश्यक हो जाता है कि वह बदले हुए परिदृश्य को देखते हुए नए सिरे से परमाणु परीक्षण करे। इसके साथ ही मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणालियों को चकमा देने वाले स्मार्ट परमाणु हथियारों और उनकी वितरण प्रणालियों का विकास भी उतना ही आवश्यक है।
HighLights
कलपक्कम रिएक्टर ने क्रिटिकलिटी हासिल की, दूसरा चरण पूरा।
भारत के पास दुनिया का एक चौथाई थोरियम भंडार है।
चीन के सापेक्ष परमाणु प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना भारत के लिए आवश्यक।
दिव्य कुमार सोती। हाल में भारत के परमाणु कार्यक्रम ने एक मील का पत्थर तब पार किया, जब कलपक्कम स्थित फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने क्रिटिकलिटी प्राप्त की। 'क्रिटिकलिटी' वह स्थिति है जब परमाणु विखंडन की शृंखला प्रक्रिया आत्मनिर्भर हो जाती है। इस स्वदेशी तकनीक पर आधारित उपलब्धि के साथ ही भारत ने 1950 में होमी भाभा द्वारा तैयार किए गए त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम का दूसरा चरण पूरा कर लिया, जिसके अंतर्गत परमाणु ऊर्जा संयंत्र जितना परमाणु ईंधन खर्च करता है, उससे अधिक उत्पादन करने की क्षमता रखता है।
इस चरण में बनने वाले यूरेनियम-233 को तीसरे चरण में थोरियम-232 के साथ उपयोग करने पर यह और अधिक यूरेनियम-233 बनाता है और अंततः इस पूरी प्रक्रिया को चलाने के लिए मात्र थोरियम की ही आवश्यकता रह जाती है। इसका महत्व इससे और बढ़ जाता है कि दुनिया भर में थोरियम का एक चौथाई भंडार भारत के पास है। इस परमाणु कार्यक्रम का तीसरा चरण पूरा होने पर भारत अगले अनेक दशकों तक थोरियम से ऊर्जा का उत्पादन करता रह सकता है। अभी व्यावसायिक उपयोग हेतु उर्जा उत्पादन के लिए रूस और भारत ही दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स का संचालन कर रहे हैं।
नि:संदेह कलपक्कम में प्राप्त हुई सफलता नागरिक उपयोग हेतु परमाणु ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में अप्रतिम उपलब्धि है, लेकिन इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि भारत का परमाणु हथियार कार्यक्रम भी उतनी ही तेजी से आगे बढ़े। हमने आज तक दो ही बार परमाणु परीक्षण किए हैं। पहली बार वर्ष मई 1974 में और अंतिम बार परमाणु परीक्षण 11 और 13 मई 1998 में किए थे। 1974 के परीक्षणों में मात्र एक डिवाइस का परीक्षण किया गया था, वहीं 1998 में परीक्षणों में पहले दिन तीन और फिर दो न्यूक्लियर डिवाइस का परीक्षण किया गया। 1998 में पहले दिन परीक्षण की गई शक्ति-1 की क्षमता भारत के दावे के अनुसार 58 किलोटन रही थी। जबकि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का आकलन इसके लगभग 40 किलोटन रहने का था। अगर सरकार के दावे को भी सही मानें तो यह इसलिए चिंता का विषय हो जाता है, क्योंकि चीन के पास 650 किलोटन से लेकर 3-4 मेगाटन के परमाणु हथियार हैं। चीन के हल्के परमाणु हथियार भी 150 किलोटन क्षमता के हैं।
परीक्षण ही किसी वैज्ञानिक क्षमता को हासिल कर लेने का प्रमाण होता है। यही कारण है कि अमेरिका ने आज तक लगभग 1000 से अधिक, रूस ने 715 और चीन ने 45 बार परमाणु परीक्षण किए हैं। इसके विपरीत भारत ने बेहद कम क्षमता के बस छह परमाणु परीक्षण ही किए हैं। बीते दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने फिर से परमाणु परीक्षण करने की बात कही थी। यदि अमेरिका परमाणु परीक्षण करेगा तो फिर रूस भी पीछे नहीं रहने वाला। ट्रंप ने यह दावा भी किया है कि रूस, चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान गुप्त रूप से भूमिगत परमाणु परीक्षण कर रहे हैं। चीन पिछले कई वर्षों से गुपचुप तरीके से छोटे परमाणु परीक्षण करने में लगा हुआ है। 2024-25 में उसने परमाणु बम बनाए। मिसाइल प्रतिरोधक प्रणालियों की बढ़ती क्षमताओं और चीन के आबादी बहुल क्षेत्रों का भारतीय सीमा से बहुत दूर स्थित होने, हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक में हमसे कहीं आगे होने जैसे पहलुओं को देखते हुए भारत के लिए चीन के सापेक्ष भरोसेमंद परमाणु प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के लिए अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम का विस्तार आवश्यक है।
ट्रंप के दौर में भारत को लेकर अमेरिका की नीतियों में आक्रामकता का पुट भी देखा जा सकता है। इसे देखते हुए भी हमें अपनी सामरिक तैयारी और मजबूत करनी होगी। यह न भूला जाए कि 2021 में लक्षद्वीप में अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस जोन पोल जोंस अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए भारत के एक्सक्लूसिव इकोनोमिक जोन में घुस आया था। बीते दिनों भी भारत से युद्धाभ्यास कर लौट रहे ईरानी नौसेना के जहाज को श्रीलंका के पास अमेरिकी नौसेना ने डुबो दिया था। यह भी ध्यान रहे कि अमेरिका हमारे पड़ोसी देशों में भारत विरोधी शक्तियों को वैसे ही हवा दे रहा है, जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध छिड़ने से पहले उसने रूस के पड़ोसी देशों में रूस के विरुद्ध दी थी।
इसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अमेरिकी आक्रामकता से निपटने के लिए रूस ने भी स्मार्ट परमाणु हथियारों के विकास और परीक्षण का ही रास्ता चुना है। उसने परमाणु ऊर्जा से संचालित ब्यूरेवेस्टनिक नाइन एम 730 क्रूज मिसाइल का परीक्षण किया, जो बेहद कम ऊंचाई जैसे मात्र 50 से 100 मीटर पर हफ्तों तक उड़ान भरती रही सकती है, क्योंकि इसके अंदर लगा बेहद छोटा परमाणु संयंत्र इसे बहुत लंबे समय तक ऊर्जा मुहैया कराता रहता है। असीमित ईंधन होने के चलते वह सीधे रास्ते के बजाय चक्कर काटकर या समुद्र के ऊपर से घूमकर किसी भी दिशा से लक्ष्य पर हमला कर सकती है। मौजूदा मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणालियां उसे रोक नहीं सकतीं। अक्टूबर 2025 में किए गए परीक्षण में इस मिसाइल ने लगातार 15 घंटों तक उड़ान भरी और 14,000 किमी की दूरी तय की।
रूस द्वारा विकसित पोसीडान को भी दुनिया का सबसे अनोखा और खतरनाक परमाणु हथियार माना जाता है। यह एक विशाल परमाणु-संचालित अंतरमहाद्वीपीय टारपीडो है। इसमें लगा छोटा परमाणु रिएक्टर इसे असीमित दूरी तक ले जाने की क्षमता देता है और यह हफ्तों तक एक किमी से अधिक की गहराई पर समुद्र में विचरण करता रह सकता है। इसके प्रहार से ऐसी सुनामी लहरें पैदा हो सकती हैं जो न्यूयार्क या लंदन सरीखे तटीय शहरों को पूरी तरह तबाह कर सकती हैं और उस पूरे इलाके को दशकों के लिए रेडियोधर्मी प्रदूषण से अनुपयोगी बना सकती हैं।
पोखरण परीक्षणों के तीन दशक बाद भारत के लिए भी आवश्यक हो जाता है कि वह बदले हुए परिदृश्य को देखते हुए नए सिरे से परमाणु परीक्षण करे। इसके साथ ही मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणालियों को चकमा देने वाले स्मार्ट परमाणु हथियारों और उनकी वितरण प्रणालियों का विकास भी उतना ही आवश्यक है।
(लेखक काउंसिल आफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)


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