विचार: असीमित संभावनाओं वाली मैत्री
हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत में फ्रांस की प्रत्यक्ष उपस्थिति से भी भारत को कई रणनीतिक लाभ मिले हैं। भारत और फ्रांस की मित्रता ने सदैव ठोस परिणाम दिए है और हम इसे लेकर आशान्वित हो सकते हैं कि ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ के नामांतरण के बाद यह जोड़ी दुनिया के कई हिस्सों में अपना रंग दिखाएगी।
HighLights
भारत-फ्रांस की विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी निरंतर प्रगाढ़ हो रही है।
रक्षा, प्रौद्योगिकी, एआई में सहयोग; बहुध्रुवीय विश्व का समर्थन।
फ्रांस ने 1998 परमाणु परीक्षणों के बाद भी भारत का समर्थन किया।
श्रीराम चौलिया। मुंबई में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की जागिंग केवल एक प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष की कसरती कवायद न होकर भारत-फ्रांस संबंधों की गतिशीलता का भी प्रतीक रही। इन दो सदाबहार मित्र देशों के रिश्ते निरंतर प्रगाढ़ होते जा रहे हैं। द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी को ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ का नया दर्जा दिया जाना ही दर्शाता है कि पेरिस और नई दिल्ली के बीच तालमेल कितना व्यापक और बहुआयामी होता जा रहा है। दोनों देशों के रिश्ते समय की हर कसौटी पर खरे उतरे हैं। इसके पीछे मुख्य कारण है विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देना।
यहां तक कि शीत युद्ध के दौरान जब पश्चिमी देशों ने गुटनिरपेक्ष भारत के प्रति शंकालु रवैया रखते हुए उपेक्षा की नीति अपनाई थी, तब भी फ्रांस नाटो के अन्य सदस्यों के मुकाबले भारत के प्रति सहिष्णुता रखता था, क्योंकि फ्रांस अमेरिका के दबाव में रहकर निर्णय नहीं लेना चाहता था। भारत द्वारा 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद फ्रांस इकलौती पश्चिमी शक्ति थी, जिसने नई दिल्ली पर आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाए थे। इतना ही नहीं, उसने परमाणु ऊर्जा सहयोग में भी कोई कमी भी नहीं आने दी थी।
भारत को एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र, विश्वसनीय लोकतंत्र और बड़े आर्थिक अवसर के रूप में अगर किसी ने सबसे पहले मान्यता देना आरंभ किया तो यह फ्रांस ही था। फ्रांस में सतत रूप से यह सहमति रही है कि अगर यूरोपीय संघ को अमेरिका और चीन से अलग अपनी पहचान एवं साख बनानी है तो भारत का साथ अनिवार्य है। इन्हीं भावनाओं की ताजा अभिव्यक्ति मैक्रों के भारत दौरे पर दिखी। मैक्रों ने कहा कि दोनों पक्ष हिंद-प्रशांत से लेकर प्रौद्योगिकी के स्तर तक ‘किसी भी प्रकार के वर्चस्व के विरुद्ध हैं।’ उन्होंने अपने संबंधों की तुलना ‘संप्रभु गठबंधन’ से भी की।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी संदर्भ में कहा कि दोनों देश ‘बहुध्रुवीय विश्व’ में विश्वास रखते हैं और उस ध्येय की प्राप्ति के लिए प्रयासरत भी हैं। इसका यही मर्म है कि फ्रांस और भारत महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मिलकर काम करेंगे, ताकि वे अमेरिका या चीन की राह पर ही चलने को विवश न हों। संभव है कि ये किसी तीसरे विकल्प का ही मार्ग प्रशस्त करें। तीसरे विकल्प की संभावनाएं अकारण भी नहीं हैं। हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का यूरोप के प्रति अपमानजनक रवैया और चीन की आक्रामक व्यापार नीतियों ने यूरोप को आहत किया है। इससे भी फ्रांस के तीसरे विकल्प की आकांक्षा को बल मिला है।
सामरिक मोर्चे पर भी भारत-फ्रांस रिश्ते उड़ान भर रहे हैं। इसे इससे आंका जा सकता है कि आज फ्रांस रूस के बाद भारत को हथियार आपूर्ति करने वाला दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। लड़ाकू विमानों, पनडुब्बियों और इंजनों की बिक्री और संयुक्त उत्पादन के लिए जिस गति से समझौते हो रहे हैं, उसे देखते हुए आने वाले वर्षों में अगर फ्रांस रूस को पीछे छोड़कर पहले पायदान पर पहुंच जाए तो कोई हैरत की बात नहीं होगी। चीन की काट और एशिया में शक्ति संतुलन के लिए भारत के साथ फ्रांस द्वारा सह-निर्मित और सह-उत्पादित राफेल विमान, एच 125 हेलीकाप्टर, हैमर प्रक्षेपास्त्र, स्कार्पीन पनडुब्बियां और पांचवीं पीढ़ी के जेट इंजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
यह भी ध्यान रहे कि फ्रांस चीन या पाकिस्तान को कोई भी मारक हथियार नहीं बेचता है, जबकि रूस चीन को अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र देता आ रहा है। फ्रांस-भारत द्विपक्षीय सैन्य सहयोग अस्त्रों तक भी सीमित नहीं है। उभरती और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए दोनों देशों ने ‘संयुक्त उन्नत प्रौद्योगिकी विकास समूह’ स्थापित किया है, ताकि विरोधियों पर सैन्य प्रतिस्पर्धी बढ़त बनाए रखी जा सके। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का यह दावा कि हमारी आपसी साझेदारी ‘गहरे महासागरों से लेकर सबसे ऊंचे पहाड़ों तक’ असीमित रूप से आगे बढ़ सकती है, अतिशयोक्ति नहीं है।
नवाचार एक और क्षेत्र है, जिसमें फ्रांस और भारत कई महत्वाकांक्षी पहल कर रहे हैं। इस क्रम में ‘भारत-फ्रांस नवाचार संघ’ दोनों देशों के विज्ञानियों, शोधकर्ताओं, व्यापारियों और उद्यमियों के लिए अपार संभावनाओं के द्वार खोलेगा। एआइ, अंतरिक्ष और विमानन जैसे क्षेत्रों में फ्रांस और भारत की सक्रियता बढ़ रही है। एआइ के महाकुंभ कहे जाने वाले शिखर सम्मेलनों की शुरुआत भी फ्रांस और भारत ने ही की थी। दोनों पक्ष ‘एआइ के लोकतंत्रीकरण’ और ‘वैश्विक एआइ की खाई को पाटने’ जैसे सिद्धांतों को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश को अगर वैश्विक स्तर पर 2047 तक शीर्ष तीन एआइ महाशक्तियों में शामिल होने के मोदी के संकल्प को साकार करना है तो इसमें फ्रांस और अन्य विकसित एवं वैज्ञानिक रूप से उन्नत देशों की सहभागिता बहुमूल्य होगी।
चूंकि फ्रांस की आवाज को यूरोपीय संघ की आवाज भी माना जाता है तो उसके साथ प्रगाढ़ होती मित्रता के भारत के लिए गहरे गुणात्मक प्रभाव भी होंगे। बीते दिनों यूरोपीय संघ के साथ हुआ बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता इसकी एक बानगी रहा। अफ्रीका में भी फ्रांस नए सिरे से अपने छवि को ढालने की कोशिश कर रहा है और भारत के साथ त्रिकोणीय सहयोग से तमाम पहलों को अमल में लाने का इच्छुक है। हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत में फ्रांस की प्रत्यक्ष उपस्थिति से भी भारत को कई रणनीतिक लाभ मिले हैं। भारत और फ्रांस की मित्रता ने सदैव ठोस परिणाम दिए है और हम इसे लेकर आशान्वित हो सकते हैं कि ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ के नामांतरण के बाद यह जोड़ी दुनिया के कई हिस्सों में अपना रंग दिखाएगी।
(स्तंभकार ‘फ्रेंड्स: इंडियाज क्लोजेस्ट स्ट्रैटेजिक पार्टनर्स’ नामक पुस्तक के लेखक है)












