अराधिता सिंह। लगभग छह दशक पहले एक उग्र किसान आंदोलन के रूप में शुरू हुआ नक्सलवाद, जो देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में से एक बन गया था, अब निर्णायक रूप से समाप्ति की ओर पहुंच चुका है। सशस्त्र नक्सली आंदोलन पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया गया है और देश ने इस चुनौती पर बड़ी जीत हासिल की है। हालांकि, इसकी वैचारिक जड़ें अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं, जो आगे की सबसे बड़ी परीक्षा हैं। नक्सल आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी विद्रोह से हुई, जहां किसानों के आंदोलन ने माओवादी विद्रोह को जन्म दिया। 1969 में चारु मजूमदार के नेतृत्व में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के गठन ने इसे संगठित रूप दिया।

1970 के दशक में सरकारी कार्यवाही , आंतरिक मतभेद और नेतृत्व की कमी के कारण यह आंदोलन कमजोर पड़ गया। बाद में 1980 और 1990 के दशक में पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) जैसे संगठनों के जरिए यह फिर उभरा। 2004 में इनका विलय होकर CPI (माओवादी) बना, जिसके बाद 2005 से 2010 के बीच हिंसा अपने चरम पर पहुंची और देश के कई हिस्सों को ‘रेड कॉरिडोर’ कहा जाने लगा। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। जो कभी देश की “सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती” था, वह अब सीमित क्षेत्रों तक सिमट चुका है। सरकार के ठोस प्रयासों, सुरक्षा बलों की रणनीतिक कार्रवाई और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार हुआ है।

आंकड़े इस सफलता की पुष्टि करते हैं। 2013 में जहां 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, वहीं 2026 में यह संख्या शून्य हो गई है। यानी हथियारबंद नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है। बड़े हमलों में भारी गिरावट आई है, जबकि गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण के मामलों में तेजी आई है। यह न केवल सुरक्षा सफलता है, बल्कि नक्सली ढांचे के विघटन का संकेत है। फिर भी यह समझना जरूरी है कि “विचारों को खत्म करना आसान नहीं होता।” सशस्त्र आंदोलन भले ही लगभग समाप्त हो चुका हो, लेकिन उससे जुड़ी विचारधारा विभिन्न रूपों में अभी भी मौजूद है। कई बार इसे राज्य के दमन के खिलाफ वैध प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे कुछ वर्गों में सहानुभूति बनी रहती है। यही आगे की चुनौती है।

माओवादी विचारधारा अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रही। यह शहरी क्षेत्रों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक मंचों, थिएटर और डिजिटल माध्यमों के जरिए भी प्रसारित हो रही है। कई बार इन मंचों पर नक्सल आंदोलन को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाता है और राज्य की वैधता पर सवाल उठाए जाते हैं। यह एक व्यापक और परतदार प्रभाव तंत्र है, जो बिना किसी केंद्रीकृत संरचना के भी सक्रिय बना रहता है। डिजिटल मीडिया ने इन विचारों को तेजी से फैलाने में अहम भूमिका निभाई है, खासकर युवाओं के बीच। युवा वर्ग भावनात्मक और वैचारिक प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होता है, जिससे ये कथानक तेजी से फैलते हैं और कई बार तथ्यों से ज्यादा प्रभावी साबित होते हैं। अब जब सुरक्षा बलों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित कर दी है, सरकार के सामने अगली बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि विकास और सुशासन का लाभ इन क्षेत्रों तक लगातार पहुंचे। सड़कों, स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं और डिजिटल कनेक्टिविटी का विस्तार केवल विकास नहीं, बल्कि विश्वास निर्माण का माध्यम है।

आर्थिक पुनरुद्धार भी उतना ही आवश्यक है। स्थानीय बाजार, रोजगार और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना इन क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ता है और स्थायी शांति को मजबूत करता है। 2026 के बाद की रणनीति में केवल सुरक्षा पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। शांति को स्थायी बनाने के लिए समावेशी शासन, स्थानीय संवेदनशीलता और प्रभावित समुदायों के साथ निरंतर संवाद आवश्यक होगा। सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर सेवा-आधारित शासन मॉडल अपनाना होगा, ताकि उन मूल कारणों को दूर किया जा सके जिनका कभी नक्सली विचारधारा ने फायदा उठाया था। इसके साथ ही, तथ्यों पर आधारित जन-चर्चा को बढ़ावा देना और नक्सल हिंसा के पीड़ितों को समान महत्व देना जरूरी है। युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम उन्हें रोजगार के अवसर देकर कट्टरपंथ से दूर रखने में सहायक हो सकते हैं। नक्सलवाद के खिलाफ भारत की प्रगति उल्लेखनीय रही है। जो कभी देश की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती थी, वह अब सीमित कानून-व्यवस्था की समस्या बनकर रह गई है।

लेकिन यह संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अंतिम लड़ाई जंगल और जमीन की नहीं, बल्कि विचारों की है। यदि इस वैचारिक तंत्र को प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दी गई, तो यह आंदोलन नए रूप में फिर उभर सकता है। स्थायी शांति के लिए अवसर, विश्वसनीयता और विश्वास आवश्यक हैं। विकास से अवसर पैदा होंगे, सुशासन से भरोसा बनेगा और निरंतर संवाद से राज्य और आदिवासी समुदायों के बीच विश्वास मजबूत होगा। हमने हथियारों की लड़ाई में निर्णायक जीत हासिल कर ली है, लेकिन विचारों की लड़ाई अभी भी जारी है। भारत की वास्तविक सफलता इसी में निहित है कि वह दोनों मोर्चों पर पूर्ण विजय प्राप्त करे।

(अराधिता सिंह आंतरिक सुरक्षा विषयों पर लिखती है एवं वर्तमान में इंडिया फाउंडेशन में कार्यरत हैं)