प्रमथ राज सिन्हा। जहां एक तरफ कई देशों में वृद्ध आबादी बढ़ती जा रही है और जापान तथा इटली जैसे देश घटती जन्म दर से जूझ रहे हैं, वहीं दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में कामकाजी उम्र के लोगों की जनसंख्या बरकरार है। आज भारत में दो-तिहाई लोग 35 साल से कम उम्र के हैं। देश की सबसे बड़ी ताकत देश के युवा हैं। युवा संभावनाशील शक्ति बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और राजस्थान जैसे राज्यों में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

जरूरत है इस ऊर्जा को सही दिशा देकर एक मजबूत आर्थिक ताकत में रूपांतरित किया जाए। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए गत दिनों संसद में पेश केंद्रीय बजट में युवाओं को सिर्फ ‘भविष्य’ नहीं कहा गया, बल्कि उन्हें वर्तमान में ‘भविष्य का निर्माणकर्ता’ माना गया है। इन भविष्य के निर्माताओं को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि उनके लिए अवसरों की ऐसी सीढ़ी तैयार की जाए, जिससे वे अपनी रुचियों और कौशल का सही उपयोग कर नई ऊंचाइयां छू सकें। युवा जनसांख्यिकी के लिए पढ़ाई और रोजगार का ऐसा परिवेश तैयार करना होगा, जो उन्हीं की तरह विविध, बहुआयामी और गतिशील हो।

जमीनी वास्तविकताओं और अंतर क्षेत्रीय जटिलताओं को समझते हुए सरकार ने बजट में प्रतिभाओं में निवेश को प्राथमिकता दी है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी योजनाएं शुरू की गईं, जिन्होंने चुनिंदा क्षेत्रों में प्रशिक्षण को उद्योग के साथ जोड़ा और इस साझेदारी से कौशल अंतर को पाटने की कोशिश की। बजट इन योजनाओं को और विस्तार तो देता ही है, साथ ही नए अवसरों की घोषणा भी करता है। भारत की विशिष्टताओं को ध्यान में रख कर देखें तो बजट युवा-केंद्रित प्राथमिकताओं को उकेरता है। भारत की डिजिटल क्षमता उसकी पहली बड़ी ताकत है। भारत तेजी से मोबाइल-आधारित क्रिएटर इकोनमी बन रहा है।

आज युवा सिर्फ कंटेंट देखना नहीं चाहते, वे कंटेंट बनाना भी चाहते हैं। डिजिटल क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने के लिए हमें डिजिटल माडल्स को सीखने पर जोर देना होगा। रचनात्मक क्षेत्रों में विकास को ध्यान में रख कर बजट में 15,000 स्कूलों और 500 कालेजों में एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कामिक्स के लिए कंटेंट क्रिएटर लैब बनाने का प्रस्ताव है। इन लैब्स के जरिये युवा तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करना सीखेंगे जिससे उनकी रचनात्मक आकांक्षाओं को सही औपचारिक स्वरूप मिलेगा और वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने लायक कौशल विकसित कर पाएंगे।

दूसरा अहम स्तंभ है उद्यमिता। भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से छोटे शहरों और सुदूर क्षेत्रों तक विस्तार पा रहा है। कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के आवंटन में 62 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी इसका प्रमाण है कि सरकार भविष्य के लिए सही कौशल से लैस सक्रिय कार्यबल बनाने को लेकर गंभीर है। बजट में टियर-2 और टियर-3 शहरों में इकोनमिक रीजन विकसित करने की बात कही गई है। उद्यमिता और आर्थिक विकास को साथ जोड़ते हुए बात ऐसे शहरों की हो रही है, जहां रोजगार के विकल्पों के साथ-साथ बेहतर जीवन की आशा भी है। घर के पास अच्छे अवसर मिलने से बड़े शहरों की तरफ युवाओं का पलायन कम होगा और देश में संतुलित विकास हो सकेगा।

तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है हमारे उच्च शिक्षा संस्थान, जो देश के लिए एक सशक्त भविष्य की नींव रख सकते हैं और जिनकी भूमिका आने वाले दिनों में और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी। एजुकेशन टू एंप्लायमेंट एंड एंटरप्राइज नामक एक स्थायी समिति बनाने का जो प्रस्ताव रखा गया है, उसका उद्देश्य है उच्च शिक्षा को रोजगार से जोड़ना, जिससे केवल डिग्री प्राप्त नहीं होगी, बल्कि काम करने का कौशल भी विकसित होगा। साथ ही पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप बनाने की योजना भी रखी गई है। ये टाउनशिप्स संपूर्ण शिक्षा का केंद्र होंगी, जिनमें विश्वविद्यालय, कालेज, शोध संस्थान और कौशल केंद्र, सबके लिए जगह होगी।

इन टाउनशिप्स का निर्माण औद्योगिक इलाकों के पास होगा। इससे पढ़ाई के उपरांत युवाओं को रोजगार भी निकट के इलाके में मिल सकेगा। महानगरों में हम इस तरह के प्रयोगों की सफलता पहले देख चुके हैं। अब हमें उन नए क्षेत्रों पर भी ध्यान देना है, जहां भारत विशेष क्षमता रखता है। इनमें चिकित्सा पर्यटन, आतिथ्य, खेल विज्ञान, सेमीकंडक्टर, फार्मा और डिजाइन जैसे रचनात्मक उद्योग शामिल हैं। अगर शिक्षा, कौशल और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए तो इन क्षेत्रों में तेजी से प्रगति की जा सकती है।

इस वर्ष का बजट क्षमता निर्माण, नई पहलों और बड़े पैमाने पर प्रतिभा विकास पर जोर देता है। इन पहलुओं को केंद्र में रख कर भारत जहां एक ओर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकता है, वहीं देश में समावेशी भागीदारी को बढ़ावा भी दे सकता है। युवा केंद्रित प्रगति के लिए कौशल, रोजगार और उच्च शिक्षा, सभी अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं और इस बात को केंद्रीय बजट ने स्वीकारा है। सरकार ने अपना दायित्व स्पष्ट कर दिया है। इसे साकार करने के लिए निजी संस्थाओं को भी कंधे से कंधा मिला कर काम करना होगा। शिक्षा और कौशल में प्रगति को अगर हम यूं ही अपनी योजनाओं के केंद्र में रखेंगे तो संभव है वर्ष 2026 भारत के भविष्य का निर्णायक वर्ष हो।

(लेखक अशोका यूनिवर्सिटी के चेयरपर्सन एवं बोर्ड आफ ट्रस्टी हैं)