हर्ष वी. पंत। राजनीति बहुत ही संवेदनशील विषय है तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा उससे भी कहीं ज्यादा नाजुक है। बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों की दशा-दिशा इसका जीवंत उदाहरण है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों का परिदृश्य एकाएक कैसे पूरी तरह बदल जाता है। बदली हुई परिस्थितियों में द्विपक्षीय संबंधों पर मंडराते संशय के बादलों के बीच बीते दिनों विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बांग्लादेश का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने ‘सकारात्मक, रचनात्मक एवं परस्पर लाभ वाले संबंधों’ की वकालत की। बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने भी मिसरी के विचारों से सहमति जताई। हालांकि ऐसी औपचारिक बातों का तब तक कोई मतलब नहीं निकलता, जब तक कि वे धरातल पर आकार न ले सकें।

इसमें कोई संदेह नहीं कि शेख हसीना के तख्तापलट के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में गतिरोध की आशंका जताई जा रही थी और वैसा ही कुछ देखने को मिल रहा है। शेख हसीना के कार्यकाल में दोनों देशों ने सुरक्षा से लेकर आर्थिक मोर्चे पर सहयोग के नए प्रतिमान स्थापित किए और लोगों का आपसी संपर्क-समन्वय भी बेहतर हुआ। याद रहे कि 2009 में शेख हसीना के सत्तारूढ़ होने से पहले द्विपक्षीय संबंध बहुत खराब हो चले थे। हसीना के प्रधानमंत्री बनने के बाद संबंधों ने जो गति पकड़ी, उसे देखते हुए इस दौर को ‘स्वर्णिम काल’ कहा जाने लगा। चूंकि हसीना की विदाई के बाद बांग्लादेशी राजनीति की रंगत बदल गई है, इसलिए भारत को भी नई वास्तविकताओं के अनुरूप नए सिरे से कदम बढ़ाने होंगे।

असल में यह बदला हुआ रुझान ही दक्षिण एशिया की इस महत्वपूर्ण साझेदारी को भारी दबाव में डाल रहा है। बांग्लादेश में अंतरिम प्रशासन के भीतर भारत-विरोधी प्रलाप जोर पकड़ रहा है, जिससे सरकारों के स्तर पर रचनात्मक सक्रियता के लिए अनुकूल परिवेश नहीं बन पा रहा है। हिंदुओं और उनके उपासना स्थलों पर बढ़ते हमलों ने भी दोनों देशों में इंटरनेट मीडिया को लड़ाई का एक नया अखाड़ा बना दिया है। इस्कान से जुड़े धर्मगुरु चिन्मय कृष्ण दास और उनके सहयोगियों की गिरफ्तारी ने द्विपक्षीय संबंधों की हवा और विषैली कर दी है। त्रिपुरा में बांग्लादेश काउंसलेट प्रकरण में इसकी प्रतिक्रिया भी दिखी। दोनों देशों के इंटरनेट मीडिया महारथियों ने भी राजनयिकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। जहां बांग्लादेश का घरेलू माहौल भारत के लिए चिंतित करने वाला पहलू है, वहीं भारत में शेख हसीना की मौजूदगी बांग्लादेश को नागवार गुजर रही है, जिन्हें देश में वापस लाकर उन पर तरह-तरह के मुकदमे चलाने की मांग तेजी से जोर पकड़ती जा रही है।

पिछले कुछ महीनों में घरेलू राजनीतिक माहौल जिस तरह से रिश्तों की धुरी को प्रभावित करने में लगा है, उसे देखते हुए विदेश सचिव का बांग्लादेश दौरा बहुत ही महत्वपूर्ण समय पर हुआ। इस दौरान आर्थिक एवं व्यापारिक सहयोग, ऊर्जा के स्तर समन्वय एवं सक्रियता, सीमा प्रबंधन और विकास से जुड़ी गतिविधियों पर सहयोग जैसे अहम मुद्दे फिर से चर्चा के केंद्र में आए। इन मुद्दों के न केवल द्विपक्षीय संबंधों, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों की दृष्टि से भी गहरे निहितार्थ हैं। ऐसे में, नई दिल्ली ने ढाका से संपर्क साधकर उचित ही किया और अब यह बांग्लादेश की नई सरकार के ऊपर है कि वह इस पहल पर सार्थक रूप से प्रतिक्रिया जताए और अनुकूल कदम उठाए।

इस समय बांग्लादेश कई चुनौतियों से जूझ रहा है और अंतरिम सरकार महीनों के बाद भी अपेक्षित स्थिरता नहीं दे पाई है। एक समय बांग्लादेश की आर्थिकी को लेकर तमाम उम्मीदें लगाई जा रही थीं। अब उन उम्मीदों पर ग्रहण लगता दिख रहा है। शासन-प्रशासन का पूरा ढांचा लड़खड़ा गया है और उसके लिए केवल भारत को दोष देने से कोई समाधान नहीं निकलने वाला। बांग्लादेश के समक्ष इस समय सबसे बड़ा संकट यही है कि यदि राजनीतिक नेतृत्व ने कारगर कदम नहीं उठाए तो न केवल हाल की सभी उपलब्धियां धूल-धूसरित हो जाएंगी, बल्कि भविष्य को लेकर भी नए सवाल उठ खड़े होंगे। यह अफसोस की बात है कि सत्ता प्रतिष्ठान की कमान संभालने वाले कुछ शीर्ष लोग उस पाकिस्तान को अपने साथी के रूप में देख रहे हैं, जिसके दिए घावों से शायद बांग्लादेश का अंतस अभी तक कराह रहा होगा। यह भी शुभ संकेत नहीं है कि बांग्लादेश के पितामह कहे जाने वाले शेख मुजीब की विरासत को किनारे करने और उसे दबाने की कोशिश की जा रही है।

हसीना के शासन में भारत-बांग्लादेश संबंध सही दिशा में आगे बढ़ने लगे थे। आर्थिक संबंधों पर उनके फोकस ने ऊर्जा, कनेक्टिविटी और सीमा प्रबंधन के स्तर पर व्यापक साझेदारी का मार्ग प्रशस्त किया। हालांकि उस दौर को भी निर्बाध एवं मुश्किलों से मुक्त कहना सही नहीं होगा। सीमा सुरक्षा, नदी जल समझौतों और पलायन जैसे मुद्दे अनसुलझे एवं विवादित बने रहे। साथ ही, हसीना भारत और चीन को लेकर भी संतुलन का रुख अपनाती रहीं। चीन उनके दौर में ही बांग्लादेश का सबसे बड़ा सामरिक साझेदार बना। इसके बावजूद भारत के साथ भी उनके संबंध सही दिशा में इसीलिए बढ़ते गए, क्योंकि उन्होंने राजनीतिक विश्वास की बुनियाद पर काम करने को तरजीह दी और एक दूसरे की चिंताओं को समझकर कदम उठाए। यह दृष्टिकोण उपयोगी सिद्ध हुआ।

यूनुस सरकार के स्तर पर तमाम चुनौतियां उत्पन्न होने के बावजूद नई दिल्ली ने यही संकेत दिए हैं कि वह बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ आगे बढ़ने के लिए तत्पर है। हालांकि, ऐसी तत्परता तभी फलीभूत हो सकती है कि जब दूसरा पक्ष भी संकीर्ण राजनीतिक हितों एवं तात्कालिक लाभ से परे व्यापक हितों को प्राथमिकता देने के लिए तैयार हो। भौगोलिक नियति यही निर्धारित करती है कि साझा सीमा, संस्कृति एवं मौलिक परस्पर निर्भरता के आधार पर भारत एवं बांग्लादेश ऐसे स्वाभाविक साझेदार हैं, जो घरेलू राजनीतिक बंदिशों से परे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि द्विपक्षीय संबंधों में आगे की राह पथरीली लग रही है, लेकिन इन दोनों पड़ोसियों को इससे पार पाने की कोई युक्ति खोजनी ही होगी, क्योंकि दक्षिण एशिया के भविष्य की बुनियाद नई दिल्ली-ढाका धुरी पर टिकी हुई है।

(लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं)