शिवकांत शर्मा। पंचतंत्र की कथा है। एक तालाब में तीन मछलियां रहती थीं-अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य। अनागतविधाता आने से पहले उपाय कर लेती थी। प्रत्युत्पन्नमति समस्या आने पर कुछ करती और यद्भविष्य भाग्य के भरोसे रहती थी। चीन को आप अनागतविधाता मान सकते हैं और भारत को प्रत्युत्पन्नमति, जो संकट सिर पर आने पर ही अपने हाथ-पांव मारता है।

हम आजाद तो गांधी जी के स्वावलंबन के नारे के साथ हुए थे, मगर अन्न की आत्मनिर्भरता के लिए हरित क्रांति पर काम तब तक शुरू नहीं किया गया जब तक भयंकर अन्न संकट से दो-चार नहीं हुए। आर्थिक सुधार तब तक नहीं किए, जब तक 1991 में देश संरक्षणवाद और लाइसेंस राज की वजह से दिवालिया होने के कगार पर नहीं जा पहुंचा।

इसी तरह उद्योगों में आत्मनिर्भरता की बात हमें तब तक याद नहीं आई जब तक कोविड महामारी ने आर्थिकी को ठप नहीं कर दिया। अब ट्रंप की अप्रत्याशित नीति ने विदेश व्यापार और विदेश नीति के मोर्चे पर हमारे लिए संकट खड़ा कर दिया, जिसके समाधान के लिए आत्मनिर्भर भारत की बात दोहराई जा रही है।

टैरिफों को अपनी ही केंद्रीय अदालत द्वारा अवैध ठहराने के बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप ने 25 वर्षों के सामरिक और आर्थिक संबंधों को ताक पर रखते हुए भारत पर लगाए टैरिफ को 25 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। यही नहीं, भारत के सेवा क्षेत्र को निशाना बनाने वाले मोर्चे भी खोले जा रहे हैं। अमेरिकी कांग्रेस हर साल प्रशिक्षित पेशेवरों के लिए 65 हजार और उच्च शिक्षा के लिए 20 हजार वीजा देती है जिनमें से लगभग 70 प्रतिशत वीजा भारतीय पेशेवर और छात्र हासिल करते हैं।

चूंकि सेवाएं प्रदान करने के लिए भारतीय कंपनियां एच-1बी वीजा के जरिये ही अपने प्रशिक्षित कर्मचारी अमेरिका भेजती हैं, इसलिए ट्रंप सरकार इसी पर अंकुश लगाना चाहती है। हालांकि खुद ट्रंप के कारोबार में एच-1बी वीजा पर आए पेशेवर काम करते हैं, पर उनके वाणिज्य मंत्री हावर्ड लुटनिक और फ्लोरिडा के गवर्नर रान डेसेंटिस को एच-1बी वीजा की व्यवस्था घोटाला नजर आती है। गवर्नर डेसेंटिस ने तो यहां तक कहा है कि भारत ने इसे अमेरिकी व्यवस्था का दोहन करने का कुटीर उद्योग बना रखा है। ट्रंप सरकार अंतरराष्ट्रीय छात्रों के एफ वीजा और एक्सचेंज छात्रों के जे वीजाओं पर भी कड़ी समय सीमाएं लगाने जा रही है।

ग्रीन कार्ड की जगह भी 50 लाख डालर से मिलने वाले गोल्ड कार्ड शुरू किए जा रहे हैं जिनके सहारे ट्रंप अमेरिका के कर्ज को उतारना चाहते हैं। व्यापार और आप्रवासन को लेकर ट्रंप सरकार का यह रवैया भले नाटकीय लगे, लेकिन अप्रत्याशित नहीं है। उनके पहले कार्यकाल के कामों से और चुनाव प्रचार से इसके स्पष्ट संकेत मिल चुके थे। भारत की ऊंची आयात-शुल्क दरों और एच-1बी वीजा के मामले पर ट्रंप के पिछले कार्यकाल में भी तनातनी हुई थी।

भावी और अत्याधुनिक तकनीक को लेकर उनका संरक्षणवादी रवैया भी नया नहीं है, मगर भारत ने समय रहते इनसे निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं की। क्रयशक्ति, उपभोग और आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिरता की दृष्टि से अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण मंडी है। उसमें मिले प्रवेश का भारतीय व्यापारियों ने सामर्थ्य के हिसाब से पूरा लाभ उठाया, लेकिन क्या हम ऐसी वैकल्पिक मंडी तैयार कर पाए जहां भारतीय व्यापारी अमेरिका में राजनीतिक या आर्थिक अड़चनें खड़ी होने पर अपना माल बेच सकें। यूरोपीय संघ की मंडी अमेरिका का एक अच्छा विकल्प बन सकती थी।

चीन ने मौजूदा हालात का पूर्वानुमान करते हुए यूरोप के साथ अपना व्यापार अमेरिका से भी अधिक बढ़ा लिया, परंतु भारत पिछले तीन साल से यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर अटका हुआ है। चीन ने अपना व्यापार आसियान की मंडियों में भी फैलाया। इसीलिए जब ट्रंप ने टैरिफ की धमकी दी तो चीन ने वाक् युद्ध में न उलझते हुए पहले बराबर का टैरिफ लगाकर और फिर उच्च प्रौद्योगिकी के लिए आवश्यक दुर्लभ खनिजों और चुंबकों के निर्यात को रोककर ट्रंप को झुकने पर मजबूर कर दिया।

भारत भी अब यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में व्यापार बढ़ाने और रक्षा, ऊर्जा, चिकित्सा, सेमीकंडक्टर और एआइ जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की कोशिश कर रहा है। प्रधानमंत्री ने मई 2020 में इसी के लिए 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी, पर क्या उससे कुछ प्रगति हुई? प्रत्युत्पन्नमति मछली की तरह संकट मंडराने पर जरूर हम कुछ सुधार करते हैं। कुछ के नाम लेते हैं, पर संकट टलने के बाद भूल जाते हैं। जरूरत उन्हें जारी रखने की है।

प्रधानमंत्री ने जापान में उद्योगपतियों से कहा ‘कम, मेक इन इंडिया,’ लेकिन क्या उसके लिए हम जरूरी आर्थिक सुधार, भूमि सुधार, श्रम सुधार और कार्यसंस्कृति के सुधार करने के लिए तैयार हैं? जापान में हड़तालें न के बराबर होती हैं और तोड़फोड़ नहीं होती। क्या भारत में ऐसी कार्यसंस्कृति संभव है? सुधारों की जरूरत कृषि और सार्वजनिक क्षेत्रों में भी है।

चीन ने अपने इंजन बनाकर छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान तैयार कर लिए हैं। जबकि हमें विदेशी इंजन लगाकर भी तेजस को बनाते-बनाते 40 बरस बीत गए हैं। चीन अपना सामान बनाने में स्वचालन, एआइ या यंत्रबुद्धि और प्रशासन की निगरानी में इष्टतम प्रक्रिया का प्रयोग करता है। दुनिया की मंडियों में उसके माल से प्रतिस्पर्धा के लिए भारत को उससे भी कुशल उत्पादन प्रक्रिया अपनानी होगी।

आर्थिक सुधारों को 35 साल हो रहे हैं, पर क्या हम एक भी ऐसा ब्रांड बना पाए हैं जो अमेरिका, जापान, जर्मनी और कोरिया के ब्रांडों की तरह वैश्विक हो? सालों से गूगल, माइक्रोसाफ्ट, फेसबुक और एपल की कोडिंग करते, बनाते और उन्हें चलाते आ रहे हैं, लेकिन चीन की तरह अपने बाइडू, वीचैट, टिकटाक और हुआवे क्यों नहीं बना पाए?

चीन ने चैट जीपीटी के जवाब में आधा दर्जन एआइ माडल बना डाले, मगर भारत एक नहीं बना पाया। इसका कारण यह है कि भारत प्रायोगिक शिक्षा और अनुसंधान पर पूरा ध्यान नहीं देता। जब तक शिक्षा में सुधार नहीं होता तब तक भारत कोई शक्ति नहीं बन सकता।

(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)