प्रणय कुमार। इतिहास की घटनाएं वर्तमान को दिशा देती हैं और वर्तमान उनसे सबक लेकर भविष्य की सुदृढ़ नींव रखता है। दुर्भाग्य से हमारे विद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास और पाठ्यपुस्तकों में घटनाओं और तथ्यों को प्रायः यथार्थ से काटकर मिथ्या आदर्शों, भावुक नारों और दलगत पूर्वाग्रहों के आधार पर प्रस्तुत किया गया। जब भी इतिहास को प्रामाणिक और वस्तुपरक ढंग से लिखने या पढ़ाने का प्रयास हुआ, उसे अनावश्यक विवाद और शोर-शराबे का सामना करना पड़ा।

सुधारों की इसी पृष्ठभूमि में एनसीईआरटी ने विभाजन की विभीषिका और उससे उपजी त्रासदी को निष्पक्ष दृष्टि से समझाने के उद्देश्य से कक्षा 6 से 8 और 9 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए दो विशेष पूरक शैक्षिक माड्यूल जारी किए हैं। इन्हें अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया जाएगा, बल्कि चर्चा के माध्यम से तत्कालीन परिस्थितियों की सूक्ष्म और गहन समझ विकसित की जाएगी। इन माड्यूल में मोहम्मद अली जिन्ना, लार्ड माउंटबेटन और कांग्रेस को विभाजन का जिम्मेदार बताया गया है। कौन नहीं जानता कि जिन्ना की अंधी महत्वाकांक्षा, पद-लोलुपता और पृथक पहचान की राजनीति ने भारतीय मुसलमानों में पनप रही सांप्रदायिक भावना को भड़काने में निर्णायक भूमिका निभाई।

विभाजनकारी राजनीति के बीज पहले से ही सर सैयद अहमद खान, मोहम्मद इकबाल, चौधरी रहमत अली, मोहम्मद इस्माइल जैसे नेताओं के विचारों में मौजूद थे। उनका सोच उस राजनीतिक इस्लाम से पोषित था, जो गैर-मुसलमानों के साथ स्थायी या समान संबंध की संभावना को सिद्धांततः नकारता था। इनका मानना था कि जिस इस्लाम की सदियों तक भारत में हुकूमत रही हो, उसे मानने वाले मुसलमान बहुसंख्यक आबादी वाले पंथनिरपेक्ष भारत में कैसे रह सकेंगे?

20वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में मुसलमान नेताओं के लिए पृथक देश की मांग के छिटपुट स्वर ही सुनाई पड़ते थे, किंतु मार्च 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद मुस्लिम लीग के नेतृत्व में विभाजन की मांग को व्यापक जनसमर्थन मिलने लगा। 16 अगस्त 1946 को जिन्ना द्वारा घोषित ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ ने विभाजन की दिशा लगभग तय कर दी। केवल कलकत्ता (कोलकाता) में ही कई हजार लोग मारे गए, जबकि नोआखाली (बंगाल) में 10 अक्टूबर 1946 को गुलाम सरवर हुसैनी के नेतृत्व में निर्दोष-निःशस्त्र हिंदुओं का पूर्व नियोजित नरसंहार हुआ। उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की अंतरिम सरकार थी और हुसैन सुहरावर्दी मुख्यमंत्री पद पर आसीन थे।

नोआखाली का नरसंहार किसी आकस्मिक उन्माद का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र था। जिन्ना और मुस्लिम लीग की धमकी-बंटा भारत या बर्बाद भारत’ के समक्ष तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने घुटने से टेक दिए। जिन्ना मुसलमानों के बड़े तबके को यह विश्वास दिलाने में सफल रहे कि मत-मजहब, संस्कृति, रीति-रिवाज, इतिहास और जीवन-दृष्टि जैसे सभी आधारों पर वे हिंदुओं से स्थायी रूप से भिन्न हैं। यही कारण था कि 1946 के संविधान-सभा के चुनाव में मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए आरक्षित 78 में से 73 सीटों पर विजय प्राप्त की।

मुस्लिम लीग को मद्रास, बांबे प्रेसीडेंसी और उड़ीसा में करीब सौ प्रतिशत, बंगाल में 95 प्रतिशत, मध्य भारत में 93 प्रतिशत, असम में 91 प्रतिशत, अविभाजित पंजाब में 86 प्रतिशत, बिहार में 85 प्रतिशत और संयुक्त प्रांत में 82 प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं। जिन तमाम मुसलमानों ने मजहब के आधार पर पृथक देश की मांग का समर्थन किया, उनमें से बड़ी संख्या में विभाजन के बाद भी भारत में ही रह गए, जबकि पाकिस्तान से भारत आए लगभग डेढ़ करोड़ हिंदू, सिख और सिंधी अपने ही देश में शरणार्थी बनकर दर-दर भटकते रहे।

विभाजन से उपजी हिंसा में लगभग दस लाख से अधिक निर्दोष लोग मारे गए, लाखों परिवार अपने पुरखों की जमीन-जायदाद से उजाड़ दिए गए और माताओं-बहनों के विरुद्ध हुए अत्याचारों ने पाशविकता और अमानुषिकता की सारी सीमाएं पार कर दीं। मानव इतिहास का यह सबसे बड़ा विस्थापन किसी प्राकृतिक आपदा या बाहरी आक्रमण से नहीं हुआ। इसके लिए अपने ही लोग मुख्य रूप से जिम्मेदार थे।

1942 के क्रिप्स मिशन और 1946 के कैबिनेट मिशन में विभाजन का कोई प्रस्ताव नहीं था, फिर भी 3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना तुरंत क्यों स्वीकार की गई, यह प्रश्न आज भी भारतीय जनमानस को क्षुब्ध करता है। मार्च से अगस्त 1947 के बीच माउंटबेटन द्वारा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं के साथ हुई 133 बैठकों से स्पष्ट है कि विभाजन उनकी सहमति से हुआ।

सत्ता-हस्तांतरण की तिथि जून 1948 से घटाकर अगस्त 1947 करना और सीमाओं के निर्धारण के लिए केवल पांच सप्ताह का समय देना घोर लापरवाही थी। सीमा-रेखांकन का दायित्व जिस सीरिल रेडक्लिफ को सौंपा गया, वह न भारत की भौगोलिक वास्तविकताओं से परिचित था, न सांस्कृतिक जटिलताओं से। यदि एनसीईआरटी विभाजन की परिस्थितियों को रेखांकित करने की दिशा में पहल कर रहा है, तो किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? ध्यान रहे जो राष्ट्र अपने अतीत से सीख नहीं ग्रहण करता, वह उसे दोहराने को अभिशप्त होता है। इसलिए इतिहास का सही अध्ययन आवश्यक है।

(लेखक शिक्षाविद हैं)