कांग्रेस ने सहयोगी दलों के सहयोग से दिल्ली के रामलीला मैदान में तथाकथित वोट चोरी के बहाने भीड़ तो जुटा ली, लेकिन यह भीड़ दस लाख के दावे के मुकाबले कहीं अधिक कम रही। इस रैली में राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआइआर को लेकर वही सब कहा, जो पिछले लंबे समय तक कहते चले आ रहे हैं। इसमें संदेह है कि यह रैली विपक्ष के इस नैरेटिव को विश्वसनीयता प्रदान कर सकेगी कि एसआइआर के जरिये विपक्षी दलों के समर्थकों के नाम जानबूझकर वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं।

आश्चर्य नहीं कि वोट चोरी का शोर मचाकर जो माहौल बनाया जा रहा है, उसका वही हश्र हो, जो इस दुष्प्रचार का हुआ था कि ईवीएम के कारण विपक्ष को हार का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस को वोट चोरी का अपना अभियान तेज करने का जरिया कुछ दिन पहले की उस खबर से मिला, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि एसआइआर के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर स्पष्ट रूप से कहा कि एसआइआर पर सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से हुए।

इसके बाद भी विपक्षी दल अपने इस हठ पर कायम हैं कि वोट चोरी हो रही है। वे इस तथ्य पर भी ध्यान देने के लिए तैयार नहीं कि जिन 13 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट हटाए गए हैं, वे उनके हैं जो अन्यत्र जा बसे हैं या जिनकी मृत्यु हो गई है अथवा जिनके नाम दो-तीन जगह दर्ज थे। सच यह भी है कि 13 करोड़ लोगों का नाम हटाने का फैसला अंतिम नहीं है और वैध मतदाता अपना नाम वोटर लिस्ट में अभी भी शामिल करा सकते हैं।

विपक्ष इस सच से भी मुंह मोड़ रहा है कि एसआइआर की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में सुधार के कई सुझाव देने के साथ लोगों को अपना नाम वोटर लिस्ट में शामिल कराने के लिए अतिरिक्त सुविधा एवं समय प्रदान करने के भी निर्देश दिए हैं। इस सबके बावजूद विपक्षी दल वोट चोरी का राग अलापने में लगे हुए हैं।

विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट में एसआइआर के खिलाफ याचिका दायर करने वाले विपक्षी नेता कथित वोट चोरी के खिलाफ कोई प्रमाण कोर्ट के समक्ष पेश करने के बजाय दिखावटी संसद बुलाकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जन महाभियोग पारित करने जैसे स्वांग कर अपना ही उपहास ही उड़ा रहे हैं। एक विडंबना यह भी है कि वोट चोरी का आरोप लगा रहे कई विपक्षी दल और खासकर कांग्रेस बूथ लेवल अफसरों की ओर से होने वाली त्रुटियों को रोकने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को बूथ लेवल एजेंट के तौर पर नियुक्त करने को लेकर उदासीन है।