नई दिल्ली। आम तौर पर प्रतीकात्मक संसद का आयोजन छात्रों को संसदीय कार्यवाही के तौर-तरीकों से परिचित कराने के लिए किया जाता है, लेकिन गत दिवस कांग्रेस की पहल पर पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के घर पर विपक्षी दलों की ओर से जो दिखावटी संसद चलाई गई, उसे एक भोंडे राजनीतिक तमाशे के अतिरिक्त और कुछ कहना कठिन है। इस आयोजन ने केवल संसद की गरिमा गिराने का ही काम नहीं किया, बल्कि इसने विपक्ष की फजीहत भी कराई।

इसलिए कराई, क्योंकि इस दिखावटी संसद में एक तो सिविल सोसायटी के नाम पर आंदोलनजीवी किस्म के लोगों को भी स्थान दिया गया और दूसरे वोट चोरी के जुमले की आड़ में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जन महाभियोग भी लाया गया। इस दौरान न तो उनका और न ही चुनाव आयोग का पक्ष रखने की प्रतीकात्मक ही सही, सुविधा दी गई।

एक तरह से जन महाभियोग लाने वालों ने कंगारू कोर्ट जैसा काम किया और जैसा चाहते थे, वैसा फैसला सुना दिया यानी मुख्य चुनाव आयुक्त को दोषी करार दिया। यह सब नौटंकी तब हुई, जब मतदाता सूचियों के शुद्धीकरण यानी एसआईआर के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। इनमें से कई याचिकाएं विपक्षी नेताओं की हैं। इनमें एक याचिका राहुल गांधी की भी है।

यह याचिका दायर करने के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है। यदि उन्हें वास्तव में सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है तो फिर दिखावटी संसद बुलाने और दुराग्रह से प्रेरित होकर तथाकथित जन महाभियोग लाने का क्या औचित्य?

इस सबसे तो यही सिद्ध होता है कि राहुल गांधी और उनके सहयोगी सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं। जिस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही हो, उस पर बाहर जनसुनवाई करना लोकतांत्रिक मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों के ही खिलाफ है।

क्या यह विचित्र नहीं कि राहुल गांधी संविधान की प्रति लिए तो घूमते रहते हैं, लेकिन उसकी भावना के अनुरूप आचरण करने के लिए तैयार नहीं। उन्हें इतनी समझ होनी ही चाहिए कि निराधार आरोपों के सहारे लोगों को गुमराह करने की एक सीमा होती है। अब वह जमाना नहीं रहा कि किसी झूठ को सौ बार दोहराया जाए तो उसे सच साबित किया जा सके।

इससे इनकार नहीं कि एसआईआर की प्रक्रिया में कुछ त्रुटियां हैं और उनके कारण लोगों को परेशानी भी हो रही है, लेकिन इस सबको वोट चोरी कहना तिल को ताड़ बनाना ही है। यदि राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के पास मुख्य चुनाव आयुक्त की कथित धांधलियों के खिलाफ कोई प्रमाण हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। किसी भी मामले में विपक्ष वकील और जज, दोनों की भूमिका एक साथ नहीं निभा सकता।