विचार: असहनीय हो चुकी है न्याय में देरी
न्याय में देरी की विकट समस्या से निपटने के लिए केवल निचली अदालतों ही नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय सहित संपूर्ण न्याय तंत्र की जवाबदेही तय करना अनिवार्य हो गया है, ताकि लोगों को समय पर सही न्याय मिल सके।
संजय गुप्त, नई दिल्ली। इस कथन से शायद ही कोई अपरिचित हो कि "न्याय में देरी न्याय से वंचित करना है, लेकिन बार-बार की देरी तो अन्याय है।" महान संवैधानिक विशेषज्ञ एवं न्यायविद् नानी पालकीवाला का यह कथन भी खूब प्रचलित है कि भारत में न्याय प्रशासन की सबसे बड़ी खामी देरी है और मैं दुनिया के किसी भी ऐसे देश से अवगत नहीं जहां मुकदमे इतने लंबे समय तक चलते हों, जितने भारत में। उनका यह भी कहना था, भारत में कानून बहुत ज्यादा हैं और न्याय बहुत कम। ये सभी चर्चित कथन भारतीय न्यायपालिका के समक्ष खड़ी चुनौतियों की गंभीरता को ही बयान करते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल में नेशनल कंपनी ला ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी और नेशनल कंपनी ला अपीलेट ट्रिब्यूनल अर्थात एनसीएलएटी की प्रशासनिक स्वतंत्रता पर गंभीर चिंता जताते हुए यह टिप्पणी करना कि इन संस्थाओं को कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने 'पूरी तरह हाईजैक' कर लिया है, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि केवल विशेष ट्रिब्यूनल या न्याय मंच बना देने भर से त्वरित न्याय सुनिश्चित नहीं हो जाता। इन संस्थाओं में भारी रिक्तियों, बुनियादी ढांचे के अभाव और प्रशासनिक नियंत्रण में ढिलाई के कारण मुकदमों का निपटारा हफ्तों या महीनों में होने के बजाय सालों-साल खिंच जाता है, जिससे व्यावसायिक विवादों और आम नागरिकों को भारी आर्थिक और मानसिक क्षति होती है। यह विडंबना ही है कि जिन विशेष संस्थाओं का गठन मामलों को तेजी से निपटाने के लिए किया गया था, वे स्वयं प्रशासनिक और व्यवस्थागत जकड़न का शिकार हैं।
निचली अदालतों, अपीलीय ट्रिब्यूनलों और न्याय के अन्य मंचों पर मुकदमों के निस्तारण में लंबी देरी और कई बार आने वाले अस्पष्ट या त्रुटिपूर्ण फैसलों का एक सबसे बड़ा कारण जवाबदेही का पूर्ण अभाव है। अक्सर निचली अदालतों द्वारा पारित सतही या कानूनी रूप से कमजोर निर्णयों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया जाता है और उन पर कड़ी टिप्पणियां भी की जाती हैं, परंतु यह बात कभी सार्वजनिक नहीं होती कि ऐसे न्यायाधीशों के खिलाफ अंततः क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई? इसके विपरीत इन न्यायाधीशों की पदोन्नति का आधार और आंतरिक मूल्यांकन प्रणाली पूरी तरह से अपारदर्शी है, जिससे आम जनता और विशेष रूप से वादियों के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है।
इस दोहरी चुनौती से पार पाने के लिए यह समझना आवश्यक है कि व्यवस्था की कमजोरी केवल प्रशासनिक या बुनियादी ढांचे के अभाव तक सीमित नहीं है, बल्कि आंतरिक अनुशासन की कमी भी है। एक तरफ जहां कार्यपालिका के लिए यह आवश्यक है कि वह न्यायिक संस्थाओं को पर्याप्त संसाधन और स्टाफ देकर उनकी गति को बाधित करने वाले कारणों का निवारण करे, वहीं दूसरी तरफ न्यायपालिका के भीतर भी न्यायाधीशों की जिम्मेदारी बनती है कि वे उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए बिना अनावश्यक विलंब के त्वरित निर्णय दें। केवल बुनियादी ढांचे की कमी को ही देरी का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि न्यायाधीशों के पास अपनी कार्यशैली और समय-प्रबंधन में सुधार करके स्थिति को काफी हद तक बेहतर बनाने की शक्ति होती है। इसका उन्हें उपयोग करना ही चाहिए।
न्याय में देरी की विकट समस्या से निपटने के लिए केवल निचली अदालतों ही नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय सहित संपूर्ण न्याय तंत्र की जवाबदेही तय करना अनिवार्य हो गया है, ताकि लोगों को समय पर सही न्याय मिल सके। प्रख्यात न्यायविदों और न्यायिक सुधारों पर बल देने वालों का यह स्पष्ट मत रहा है कि जब तक न्यायपालिका अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली में आधुनिक प्रबंधन और कड़े अनुशासन को नहीं अपनाती, तब तक केवल नए-नए कानून बना देने से स्थिति नहीं सुधरेगी। इस दिशा में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के साथ विधि आयोगों ने बार-बार इस पर बल दिया है कि मुकदमों की सुनवाई के दौरान तारीख पर तारीख की संस्कृति पर कड़ाई से रोक लगनी चाहिए और अनावश्यक रूप से मामले को लटकाने वाले वकीलों या पक्षों पर भारी वित्तीय दंड लगाया जाना चाहिए। इसके साथ ही उच्चतर न्यायपालिका से लेकर अधीनस्थ अदालतों तक हर स्तर पर यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि बहस पूरी होने के बाद एक निश्चित समयसीमा के भीतर पारदर्शी निर्णय दिए जाएं। इस तय सीमा का पालन न होने पर संबंधित पीठासीन अधिकारी की कड़ाई से वार्षिक समीक्षा हो।
मुकदमों के त्वरित निस्तारण के लिए पूर्व न्यायविदों द्वारा 'केस मैनेजमेंट कांफ्रेंस' की जो वकालत की गई है, उसे जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। इस व्यवस्था के तहत न्यायाधीश दोनों पक्षों के वकीलों के साथ बैठकर शुरुआत में ही विवाद के मुख्य बिंदुओं को तय करते हैं, जिससे सुनवाई के दौरान अनावश्यक और लंबी बहसों से बचा जा सके। इसके अतिरिक्त चूंकि खुद सरकार देश के कुल मुकदमों के एक बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार है, अतः उन पर भी लगाम लगनी चाहिए। इसके लिए विभिन्न कानूनी समितियों ने लगातार यह सिफारिश की है कि सरकारी विभागों को हर मामले में विपरीत निर्णय के बाद आंख मूंदकर अपील करने से रोका जाना चाहिए। इसके लिए आंतरिक जांच समितियां बनाकर अक्षम अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करना आवश्यक है, ताकि वे लोगों, सरकारी संसाधनों और साथ ही अदालतों का समय बर्बाद करने से बचें।
भारतीय न्याय प्रणाली का कायापलट केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि देश के सामाजिक-आर्थिक विकास की एक अनिवार्य शर्त है। जब तक अदालतों की पारदर्शी तरीके से कार्यकुशलता और न्यायाधीशों की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती, तब तक करोड़ों लंबित मामलों के बोझ तले दबी न्याय व्यवस्था आम आदमी के लिए सुलभ और भरोसेमंद नहीं बन पाएगी। न्याय मिलने में देरी का सिलसिला देश के विकास के लिए अब असहनीय हो चुका है। यह सिलसिला देश के विकास को बाधित करने के साथ मुकदमों में फंसे करोड़ों लोगों के समय और संसाधन की बर्बादी का कारण बनने के साथ ही उन्हें निराश भी कर रहा है।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)




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