डॉ. एके वर्मा। इस समय मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर का मुद्दा चर्चा में है। निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (1950) की धारा 21 तथा निर्वाचक-पंजीकरण-नियम (1960) के नियम 25(1) के माध्यम से यह अधिकार प्राप्त है। आयोग तीन प्रकार से पुनरीक्षण कर सकता है। सामान्य पुनरीक्षण, विशेष पुनरीक्षण और विशेष गहन पुनरीक्षण जिसमें मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट, स्थानांतरित आदि मतदाताओं के नाम हटाए और नए मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं। चूंकि विशेष गहन पुनरीक्षण में मतदाता सूची एकदम नए सिरे से बनाई जाती है, इसीलिए इसमें ज्यादा समस्याएं आती हैं। जमीनी स्तर पर बीएलओ आदि कर्मचारियों से त्रुटियां होती हैं, पर उसे वोट चोरी का नाम देना गलत है। मगर कुछ दलों ने राजनीतिक लाभ हेतु वोट चोरी का नैरेटिव चला रखा है।

चुनाव आयोग वर्ष में चार बार-एक जनवरी, एक अप्रैल, एक जुलाई और एक अक्टूबर-को 18 वर्षीय नागरिकों का मतदाता के रूप में पंजीकरण करता है। यहां तक कि यदि कोई नागरिक 17 वर्ष का है, तो भी वह अपना पंजीकरण करा सकता है, ताकि 18 वर्ष की आयु होने पर उसका नाम मतदाता सूची में स्वतः जुड़ जाए। अतः युवाओं को किसी गलतफहमी का शिकार नहीं होना चाहिए। फिर भी, यदि किसी का नाम मतदाता सूची से कट गया है, तो वह फार्म-6 भर कर अपना नाम अपने क्षेत्र के बीएलओ के माध्यम से जुड़वा सकता है। यदि चुनाव शुरू हो भी जाएं तब भी प्रत्याशियों के नामांकन की अंतिम तिथि तक मतदाता सूची में नाम जुड़वाया जा सकता है।

जहां एक ओर चुनाव आयोग मतदाता सूचियों को अपडेट करने तथा महिलाओं, 85 वर्ष के मतदाताओं, दिव्यांगों और अन्य वैध-मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित करने का अथक प्रयास करता है, वहीं कुछ लोग मतदाता पहचान पत्र होने के बावजूद इसलिए मतदान नहीं कर पाते, क्योंकि उनका नाम मतदाता-सूची से कट जाता है। कभी-कभी तो पूरा परिवार ही मतदाता सूची से गायब हो जाता है, जबकि उन सभी के पास मतदाता पहचान पत्र होता है। चुनाव आयोग 12 अन्य पहचान पत्रों को मान्यता देता है, जिससे मतदाता अपना नाम सूची में होने पर उन्हें दिखा कर मतदान कर सकता है।

तब प्रश्न उठता है कि मतदाता पहचान पत्र का फिर क्या औचित्य? जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (1951) को 1958 में संशोधित कर मतदाता पहचान पत्र को कानूनी-वैधता प्रदान की गई। चुनाव आयोग का मतदाता पहचान पत्र विशेष होता है, उस पर एक अल्फा न्यूमेरिक नंबर होता है, जो मतदाता सूची में मतदाता के नाम पर भी अंकित होता है। अन्य किसी पहचान पत्र में वह नंबर नहीं होता। अतः आयोग के अधिकारी ‘चेक’ कर सकते हैं कि किसी मतदाता पहचान पत्र के अल्फा न्यूमेरिक नंबर का क्या हुआ? क्यों वह हटाया गया? क्या वह कहीं और चला गया या किसी दूसरी जगह उसका मतदाता पहचान पत्र बना है? जिन मतदाताओं के नाम गलती से सूची से कट गए, वे अपने मताधिकार का प्रयोग कैसे करें? क्या उनका तत्काल पंजीकरण कर मतदान सुनिश्चित नहीं किया जा सकता?

इसमें जनप्रतिनिधित्व कानून (1951) की धारा 62(1) एक अवरोध है, जो नागरिकों का मतदान अधिकार परिभाषित करता है। इसके अनुसार ‘केवल वही व्यक्ति मतदान कर सकता, जिसका नाम उस निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता-सूची में है’। यह कानून 75 वर्ष पुराना है जब मतदाता-सूची के अतिरिक्त मतदाता रिकार्ड का कोई और विकल्प न था। जबकि 1993 से मतदाता पहचान पत्र मतदाता होने का ठोस प्रमाण है। जब मतदाता सूची और मतदाता पहचान पत्र दोनों ही चुनाव आयोग जारी करता है, तो फिर उनका स्तर और मान्यता एकसमान क्यों नहीं? अब आयोग को तय करना है कि मतदाता पहचान पत्र होने के बावजूद मतदाता सूची में नाम न होने पर वोट न दे पाने की समस्या का हल कैसे निकाला जाए। जिस तत्परता से आयोग अधिक से अधिक मतदान की कोशिश करता है, लेकिन उसे इसके लिए अपनी कोशिशों का दायरा बढ़ाना ही होगा।

चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं का अनवरत पंजीकरण (फार्म-6), पंजीकरण स्थानांतरण (फार्म-8) और 17 वर्ष की अवस्था की स्थिति में पूर्व-पंजीकरण भारत में मतदाता पंजीकरण को सरल बनाती है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी होता है। देश-विरोधी तत्वों और भ्रष्ट प्रशासनिक कर्मचारियों की मिलीभगत से अपात्र लोग भी मतदाता पहचान पत्र बनवा लेते हैं। जबकि संविधान केवल भारतीय नागरिकों को ही मतदाता बनने का अधिकार देता है, लेकिन आज तक देश के नागरिकों की कोई सूची नहीं बन सकी। इस दिशा में राष्ट्रीय नागरिक पंजिका यानी एनआरसी जैसी पहल आवश्यक हो गई है।

ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग अपना काम करे कैसे? जब पासपोर्ट और आधार कार्ड नागरिकता के दस्तावेज नहीं माने जा रहे तो नागरिक और गैर-नागरिक कैसे चिह्नित हों? इस पर समाधान के लिए सरकार, संविधानविदों और विधि-विशेषज्ञों में परामर्श होना चाहिए। नागरिकता रजिस्टर बने, मतदाता पहचान पत्र को मतदाता सूची के समकक्ष मान्यता मिले, जिससे मतदाता पहचान पत्र होने और मतदाता सूची में नाम न होने की स्थिति में उनका बायोमीट्रिक या रेटिनल टेस्ट कर तत्काल मतदाता के रूप में पंजीकरण संभव हो और लोग अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें। इससे जहां मतदाता पहचान पत्र की सार्थकता बढ़ेगी, वहीं वैध-मतदाताओं की चुनाव-प्रक्रिया में आस्था मजबूत होगी।

समय की आवश्यकता है कि जनप्रतिनिधित्व कानून (1951) की धारा 62(1) में संशोधन किया जाए, ताकि कोई भी व्यक्ति जिसके पास अपने निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता पहचान पत्र हो (जो आधार-कार्ड, पासपोर्ट या अन्य दस्तावेजों से मेल खाता हो), उसका मतदाता के रूप में आन द स्पाट पंजीकरण किया जाए और उसे अपने मताधिकार का प्रयोग करने दिया जाए। चुनाव आयोग को अपने मतदाता पहचान पत्र की गरिमा बनाए रखने के लिए और वैध मतदाताओं को मतदान से वंचित न होने देने के लिए ऐसा करना जरूरी है।

(लेखक सेंटर फार द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)