विचार: ट्रंप प्रशासन को प्रभावित करने वाले चुनाव
मध्यावधि चुनावों में अगर अमेरिकी संसद में विपक्षी दलों का बहुमत हो गया तो ट्रंप के लिए शेष कार्यकाल में सरकार चलाना मुश्किल होगा।
HighLights
ट्रंप की पार्टी को प्रतिनिधि सभा में हार का डर।
विपक्ष के बहुमत से राष्ट्रपति के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी।
भारत को अमेरिकी नीतियों से संतुलन बनाना होगा।
शिवकांत शर्मा। अमेरिका के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा मध्यावधि चुनाव हुआ हो, जिस पर दुनिया ने इतना ध्यान दिया हो। इसकी वजह कोई और नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं। उनकी पलटू और अटपटी नीतियों ने उनके ही देश द्वारा स्थापित विश्व व्यवस्था में ऐसी उथल-पुथल मचाई है कि हर कोई उनसे निजात पाने की राह देख रहा है। हालांकि इस चुनाव में उनका भाग्य पूरी तरह दांव पर नहीं है। उनका आधा कार्यकाल अभी बाकी है, लेकिन अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस की समूची प्रतिनिधि सभा और सीनेट की एक तिहाई से अधिक सीटों का फैसला इन्हीं चुनावों में होना है। यह चुनाव प्रतिनिधि सभा के चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन के बाद हो रहा है, जिससे ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को लगभग नौ सीटों पर लाभ होने की आशा है। फिर भी जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार उनकी पार्टी का प्रतिनिधि सभा में तो हारना तय है ही, सीनेट भी हाथ से जा सकती है।
राष्ट्रपतियों की पार्टी ने पिछले 20 मध्यावधि चुनावों में से 18 में प्रतिनिधि सभा की सीटें गंवाई हैं। इस समय ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास प्रतिनिधि सभा में मात्र दो सीटों का बहुमत है और सीनेट में तीन सीटों का। इसलिए उन्होंने पार्टी उम्मीदवारों के लिए ऐसे प्रचार किया है मानो वे स्वयं चुनाव लड़ रहे हों। मतदाताओं से अपील की है कि वे उन्हें ही उम्मीदवार मानकर वोट दें। यही नहीं, उन्होंने भारत के चुनावों की तरह वोटरों को लुभाने के लिए पांच हजार डालर की रेवड़ी बांटने का वादा भी किया है। फिर भी एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार उनके काम से संतुष्टों का दायरा घटकर 31 प्रतिशत पर आ गया है और इतिहास बताता है कि यह आंकड़ा 50 से नीचे गिर जाने पर राष्ट्रपति की पार्टी को प्रतिनिधि सभा में औसतन 37 सीटों का नुकसान होता है। 2018 के मध्यावधि चुनाव में ट्रंप से संतुष्ट रहने वालों का प्रतिशत 41 पर आ जाने से रिपब्लिकन पार्टी को 40 सीटों का नुकसान हुआ था। विश्लेषकों का अनुमान है कि रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा की कम से कम 15 सीटों का नुकसान तो होना तय है और सीनेट की भी तीन-चार सीटें जा सकती हैं।
कांग्रेस के दोनों सदनों में विपक्ष का बहुमत होने पर राष्ट्रपति के लिए सरकार चलाना कठिन हो जाता है। प्रतिनिधि सभा की सभी संसदीय और स्थायी समितियां विपक्ष के हाथों में चली जाती हैं जो हर विभाग के बजट, खर्च और कर्ज की सीमा निर्धारित करती हैं और विदेशी मामलों की नीतियां बनाती हैं। ये समितियां ट्रंप और उनके मंत्रियों पर जांच बिठा सकती हैं, उन्हें तलब कर सकती हैं और महाभियोग भी चला सकती हैं। राष्ट्रपति को महाभियोग से हटाने के लिए तो सीनेट में दो तिहाई बहुमत चाहिए। इसीलिए एंड्रयू जांसन, बिल क्लिंटन और ट्रंप पर महाभियोग चलाने के बावजूद आज तक किसी राष्ट्रपति को हटाया नहीं जा सका है। इस बीच यह भी सुनने में आया है कि डेमोक्रेटिक पार्टी ने युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ पर महाभियोग की तैयारी कर रखी है। ट्रंप पर महाभियोग तो शायद ही चलाया जाए, लेकिन उनके तथा उनके परिवार के सदस्यों पर पद का अनुचित लाभ उठाने की और भ्रष्टाचार की जांच बिठाई जा सकती है। मिसाल के तौर पर ट्रंप परिवार की क्रिप्टो कंपनी ने पाकिस्तानी सरकार के साथ उस समय सौदा किया था, जब अमेरिका की क्रिप्टो नीति बन रही थी।
कांग्रेस में विपक्ष का बोलबाला होने पर अमेरिकी राष्ट्रपति अपना पूरा ध्यान विदेश नीति पर लगाते आए हैं। लगता है ट्रंप भी इसकी तैयारी कर चुके हैं। ईरान को समझौते पर मजबूर करने के लिए उन्होंने अपनी सेना पहले ही मैदान में उतार रखी है, ताकि डेमोक्रेट कांग्रेस में चलती लड़ाई को रुकवाने या उसके लिए पैसा रोकने का राजनीतिक जोखिम न उठा सके। इस महीने के उत्तरार्ध में वे एपैक की शिखर बैठक में भाग लेने चीनी शहर शेनजेन जा रहे हैं, जहां रूसी राष्ट्रपति पुतिन के आग्रह पर शी चिनफिंग और पुतिन के साथ बैठकर नई विश्व व्यवस्था पर विचार करेंगे। इसे नई दिल्ली में हुई मोदी-शी-पुतिन शिखर बैठक के जवाब के रूप में भी देखा जा सकता है, मगर लगता है असली उद्देश्य यूक्रेन को पुतिन की शर्तों पर युद्धविराम समझौते के लिए मजबूर करना है। यूरोप में इसे तानाशाही तिकड़ी के उदय के रूप में देखा जा रहा है, जो पूरी दुनिया को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांट कर मनमानी करना चाहती है।
चीन को जी-2 का सदस्य बताने और शी चिनफिंग के साथ मुलाकातों का सिलसिला बढ़ाने से लगता है कि ट्रंप की दिलचस्पी अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र को चीनी विस्तारवाद से मुक्त रखने से अधिक चीन के साथ लंबित व्यापार सौदा सिरे चढ़ाने में हो गई है। पाकिस्तान के साथ वे अपने और अपने परिवार के निजी आर्थिक हितों के कारण मधुर संबंध रखना चाहते हैं। भारत के लिए यह अच्छी बात नहीं है। उसे अपने सामरिक और आर्थिक रिश्तों के समीकरणों में निरंतर संतुलन बिठाते रहना होगा। भारत में अमेरिका पर भरोसे की कमी का पुराना इतिहास है। उसे दूर करने के लिए हुए गत 25 वर्षों के प्रयासों पर ट्रंप की विशुद्ध लेन-देन परक और पलटू नीतियों ने पानी फेर दिया है। यूरोप और एशिया में अमेरिका के पारंपरिक मित्र देश भारत से भी अधिक स्तब्ध हैं। प्यू शोध केंद्र के द्वारा 35 देशों में किए एक सर्वेक्षण के अनुसार यूरोप और हिंदचीन के अधिकांश देश और इंडोनेशिया अब अमेरिका से अधिक चीन पर भरोसा करने लगे हैं।
ट्रंप प्रशासन की कोशिश रहेगी कि जनवरी में नई कांग्रेस के शपथ लेने से पहले भारत के साथ व्यापार सौदा कर ले, लेकिन भारत को अपने ऊर्जा हितों और कमजोर आर्थिक क्षेत्रों के हितों की रक्षा के लिए अडिग रहना होगा। नई कांग्रेस ट्रंप की टैरिफ नीतियों को भी नहीं रोक पाएगी, क्योंकि वे अब अनुचित व्यापार नीतियों को आधार बनाकर धारा 232 और 301 का प्रयोग कर रहे हैं, जिन्हें केवल अदालतों में ही चुनौती दी जा सकती है। एच1बी वीजा की शर्तों में ढील या नौकरी आधारित ग्रीन कार्ड सुविधा बहाल होने के आसार भी कम हैं, क्योंकि ट्रंप ने वोटों के लिए भारतीय प्रतिभाओं को लेकर संदेह का ऐसा बीज बो दिया है, जिसके खिलाफ जाने का राजनीतिक जोखिम शायद ही कोई लेना चाहे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)







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