विचार: उम्मीदवारों के चयन में हो मतदाताओं की भूमिका
वर्तमान में राजनीतिक दलों द्वारा अलोकतांत्रिक तरीके से टिकट वितरण के कारण उच्च सदनों में योग्य उम्मीदवार नहीं आ पाते हैं। मतदाताओं की भूमिका से उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में सुधार कर लोकतंत्र को मजबूत किया जा सकता है, जैसा कि अमेरिका और यूरोपीय देशों में होता है।
HighLights
राजनीतिक दलों का अलोकतांत्रिक टिकट वितरण योग्य उम्मीदवारों को रोकता है।
अमेरिका, यूरोप की तरह प्राथमिक चुनाव प्रणाली अपनाई जाए।
इससे लोकतंत्र मजबूत होगा, योग्य जनप्रतिनिधि सदन में आएंगे।
त्रिलोचन शास्त्री। देश का उच्च सदन राज्य सभा हो या राज्यों का उच्च सदन विधान परिषद हो, इसमें सामान्य तौर पर राजनीतिक गुणा गणित में सटीक बैठने वाले व्यक्ति ही आ पाते हैं।ऐसे में संविधान की यह मंशा पूरी नहीं होती है कि उच्च सदन में अनुभवी और विषय विशेष की गहरी जानकारी रखने वाले लोग उच्च सदन में आएंगे और कानून बनाने की प्रक्रिया में योगदान देंगे। इसकी प्रमुख वजह राजनीतिक दल हैं। राजनीतिक दल खुद लोकतांत्रिक नहीं हैं।
ऐसे में टिकट देने की प्रक्रिया भी अलोकतांत्रिक है। हर राजनीतिक दल में एक दो लोग मिल कर तय करते हैं कि टिकट किसे दिया जाएगा। बड़ी संख्या में सांसदों और विधायकों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमे हैं, इसके बावजूद राजनीतिक दल उनको बेहिचक टिकट देते हैं। जब तक टिकट देने की मौजूदा प्रक्रिया जारी है, ऐसे ही जनप्रतिनिधि सदन में आएंगे, जिनको लोकतंत्र और जनता से कोई मतलब नहीं है।
वे पांच वर्ष बस तक अपनी आर्थिक तरक्की और राजनीतिक करियर के लिए काम करते हैं और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि अगली बार भी उनको टिकट मिल जाए।
जनता के पास खास विकल्प नहीं है क्योंकि सभी राजनीतिक दलों में टिकट देने की प्रक्रिया लगभग एक जैसी है। जनता एक तरह से लाचार है क्योंकि उनके क्षेत्र से चुनाव में उम्मीदवार कौन होगा, इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं होती है। वहीं अमेरिका और यूरोपीय देशों में उम्मीदवारों के चयन में जनता की भूमिका होती है।
अमेरिका में राजनीतिक दल या शीर्ष नेता यह तय नहीं करते हैं कि चुनाव कौन लड़ेगा, यह फैसला प्राथमिक चुनावों के जरिये जनता करती है। इसी तरह से ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस में उम्मीदवारों के चयन में पार्टी के सदस्यों और पार्टी के कैडर की प्रभावी भूमिका होती है। भारत में इस सिस्टम को अपनाया जाना चाहिए।
इससे देश में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र मजबूत होगा और चुनाव में धनबल का प्रभाव भी कम होगा। देश में राजनीति ज्यादा समावेशी होगी और अपेक्षाकृत ज्यादा योग्य और साफ सुधरी छवि के लोग संसद और विधानसभाओं में आएंगे।
त्रिलोचन शास्त्री
संस्थापक, एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स

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