सीबीपी श्रीवास्तव। संविधान में व्यवस्था की गई थी कि देश के उच्च सदन यानी राज्य सभा औ राज्यों के उच्च सदन यानी विधानसभा में अनुभवी और जानकारी लोग आएं। राज्यसभा में विशेषज्ञता के लिए 12 सदस्यों के मनोययन का प्रविधान किया गया।

वहीं, राज्यों में राज्य स्तरीय समस्या को समझने के लिए कुछ वर्ग चुने गए जैसे शिक्षक या स्नातक। यहां शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र बनाने का उद्देश्य यह था कि राज्य के अलग अलग हिस्सों से चुने गए जन प्रतिनिधि बताएं कि क्षेत्र विशेष की समस्या क्या है।

यह माना गया कि शिक्षक और स्नातक कोटे से चुने गए जनप्रतिनिधि समाज के प्रबुद्ध वर्ग से होंगे तो वह समस्याओं को बेहतर तरीके से समझ कर उसे सदन में रख पाएंगे। यह मूल तत्व है। संविधान इनसे ऐसी अपेक्षा करता है। लेकिन वर्तमान स्थिति वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए। इस सेगमेंट का भी राजनीतिकरण हो चुका है। चुनाव में सारी चीजें पीछे छूटज जाती हैं और उम्मीदवारों व राजनीतिक दलों का हित हावी हो जाता है।

ऐसे में ऐसे लोग विधानपरिषद में पहुंच ही नहीं पाते हैं, जो जन समस्याओं और क्षेत्र विशेष के मुद्दों को समझ कर उसके समाधान के लिए काम करें। वह अपने राजनीतिक करियर को मजबूत बनाने के लिए काम करते हैं।

इसका चुनाव भी पूरी तरह से चुनाव प्रबंधन पर निर्भर करता है। जो चुनाव का प्रबंधन अच्छी तरह से करता है। संसाधन खर्च करता है वह चुनाव जीत जाता है। ऐसे में संविधान को मकसद था, वह पूरा नहीं हो पा रहा है। जागरूकता की कमी की वजह से इन चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी भी बहुत कम है।

संविधान में जब यह व्यवस्था की गई थी, उस समय शिक्षक और स्नातक को समाज का प्रबुद्ध वर्ग माना जाता था। साक्षरता दर बहुत कम थी और गांव में एक या दो लोग स्नातक होते थे। उस समय शिक्षकों की प्रतिष्ठा भी काफी ज्यादा थी। लेकिन आज देश में साक्षरता का स्तर बहुत बढ़ गया है और स्नातक का बहुत महत्व नहीं रह गया है। इसी तरह से अगर शिक्षक को प्रबुद्ध वर्ग माना जाए तो वकील, डाक्टर, इंजीनियर भी प्रबुद्ध वर्ग में आते हैं।

उनके पास भी अपने विषय की गहन जानकारी होती है। ऐसे में मेरा मानना है कि वर्तमान में इस व्यवस्था का कोई मतलब नहीं है। इस व्यवस्था को खत्म करके राज्यसभा की तरह विशेषज्ञता के लिए मनोययन करना चाहिए। आप शिक्षक, वकील, डॉक्टर, विज्ञानी, उद्ममी किसी का भी मनोययन कर सकते हैं।

यह लोग भी क्षेत्र विशेष की समस्या को समझ कर बेहतर तरीके से सदन में रख सकते हैं और इसके समाधान के लिए सुझाव भी दे सकते हैं। हालांकि मनोययन करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि योग्य व्यक्ति का सदन में लाया जाए।

सीबीपी श्रीवास्तव, अध्यक्ष सेंटर फार अप्लॉयड रिसर्च इन गवर्नेंस