[ए. सूर्य प्रकाश]। ऋषि सुनक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनने पर दुनिया भर में वाहवाही हो रही है। वहीं देश में कांग्रेस और उसके जैसे दलों के नेता भारतीयों को अनूठा उपदेश देने में लगे हैं। ऐसे ही दो प्रमुख नेता हैं पी. चिदंबरम और शशि थरूर। चिदंबरम ने दावा किया कि अमेरिका में कमला हैरिस और ब्रिटेन में सुनक के रूप में जिस प्रकार उच्च पदों पर अल्पसंख्यक समुदाय के नागरिक पहुंचे, उससे भारत को भी सबक सीखने की जरूरत है।

वहीं थरूर ने कहा कि हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि अंग्रेजों ने बेहद दुर्लभ मिसाल पेश की है और हम भारतीय जिस प्रकार सुनक के उदय का जश्न मना रहे हैं तो हमें ईमानदारी के साथ स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या भारत में भी ऐसा हो सकता है कि किसी अल्पसंख्यक की सबसे ताकतवर पद पर ताजपोशी हो सके। इन दोनों के अलावा ऐसा ही बेसुरा राग छेड़ रहे अन्य नेताओं के बयान और मंशा की पड़ताल की जाए तो उनकी बातें तार्किक पैमाने पर कहीं नहीं टिकतीं। वास्तविकता यही है कि भारत विविधता के विशिष्ट गुण से ही दुनिया का सबसे विविधतापूर्ण देश है।

ब्रिटिश कंजरवेटिव पार्टी ने वाकई कुछ विरला काम किया है, मगर यह विस्मृत न किया जाए कि विगत 75 वर्षों में हमने पंथनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में अपनी पहचान बनाई है। भारत में जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद और एपीजे अब्दुल कलाम के रूप में तीन मुस्लिम राष्ट्रपति हुए हैं। सिख समुदाय से ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हुए हैं। इंदिरा गांधी के रूप में महिला प्रधानमंत्री रहीं। प्रतिभा पाटिल और द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन में आधी-आबादी का प्रतिनिधित्व किया। दलित और आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ाई है।

विविधता के प्रति सम्मान और लोकतंत्र की शानदार परंपराओं के लिए भारत की प्रतिबद्धता का परिचय बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दस वर्षीय कार्यकाल और जैल सिंह के राष्ट्रपतित्व काल से मिलता है, क्योंकि सिख समुदाय की हिस्सेदारी जनसंख्या में मात्र 1.7 प्रतिशत है। इसे भी न भुलाया जाए कि पारसी समुदाय (जिनकी संख्या मामूली ही है) से आने वाले फिरोज गांधी के पुत्र राजीव गांधी भी प्रधानमंत्री रहे। भारत में मुस्लिम, ईसाई, सिख और बौद्ध समुदाय से तमाम केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री भी रहे। क्या धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता के साथ भारत की सहजता के पक्ष में हमें और साक्ष्य देने की आवश्यकता है?

ऐसे में ब्रिटेन से सबक सीखने को लेकर चिदंबरम और थरूर की बातें बेतुकी हैं। यह भारत की समृद्ध लोकतांत्रिक परंपराओं की खराब समझ या उससे भी बदतर भारत-विरोधी उस तबके की खीझ है, जो राजनीतिक परिदृश्य में हाशिये पर पहुंचकर निरंतर अप्रासंगिक होता जा रहा है। अफसोस की बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति घृणा भाव से पीड़ित तमाम भारतीय नेताओं ने उनके खिलाफ कोई भी मुद्दा बनाने की एक आदत बना ली है। वामपंथी दल, राहुल गांधी और कांग्रेस नेता निरंतर रूप से इसका सहारा लेते हैं, जबकि इससे उनकी चुनावी संभावनाओं को ही नुकसान पहुंचता है।

चिदंबरम और थरूर की टिप्पणियों का परोक्ष संदर्भ 2004 के उस राजनीतिक घटनाक्रम से है, जब कांग्रेसियों ने इतालवी मूल की सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का प्रयास किया था। तथ्य यही है कि उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की ओर से बुलावा ही नहीं मिला था और उन्होंने अपने विश्वासपात्र मनमोहन सिंह को कठपुतली प्रधानमंत्री बना दिया और वास्तविक सत्ता अपने हाथ में रखी। वास्तव में सोनिया गांधी ने बिना किसी जिम्मेदारी या जवाबदेही के ही किसी महारानी की भांति राज किया।

वह सुपर-प्रधानमंत्री रहीं। कठपुतली प्रधानमंत्री पर उनका पूरा नियंत्रण था और कमजोर प्रधानमंत्री के पास सोनिया को उपकृत करने के अतिरिक्त कोई और विकल्प न था। लोकतांत्रिक परंपराओं का मखौल उड़ाने वाली ऐसी सरकार के शासन की समाप्ति की भारतीय बड़ी शिद्दत से प्रतीक्षा कर रहे थे। ऐसे में विदेशी मूल की वजह से सोनिया गांधी को राजनीतिक शक्ति से वंचित रखने का आरोप निराधार है।

वहीं थरूर की टिप्पणी बहुत जल्दबाजी वाली लगती है, क्योंकि कंजरवेटिव पार्टी में जमीनी स्तर पर सुनक के चयन को लेकर असंतोष की बातें आ रही हैं कि इस मामले में उनसे मशविरा नहीं किया गया। ब्रिटिश परंपरा के अनुसार जब प्रधानमंत्री इस्तीफा देता है तो पार्टी की संसदीय इकाई के मुखिया सांसदों के साथ मिलकर अगले प्रधानमंत्री के रूप में उनकी पसंद की थाह लेते हैं। प्रधानमंत्री पद की होड़ में शामिल होने के दावेदार को न्यूनतम सौ सांसदों का समर्थन चाहिए होता है। यदि दो या उससे अधिक दावेदार होते हैं तो पार्टी द्वारा देश भर में फैले अपने सदस्यों से दावेदारों के बीच चयन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है। सितंबर में हुए ऐसे ही चुनाव में लिज ट्रस ने ऋषि सुनक से बाजी मार ली थी।

सांसदों के बीच पलड़ा कुछ भारी होने के बावजूद सुनक पार्टी सदस्यों की पसंद नहीं बन पाए। यानी पार्टी सदस्यों की राय सांसदों से इतर रही, क्योंकि जमीनी स्तर पर नस्लीय पहलू कहीं ज्यादा मायने रखता है और खासतौर से कंजरविटव पार्टी में। ऐसे में एशियाई मूल का या हिंदू होना तो पार्टी सदस्यों के बीच सुनक के खिलाफ ही जाता दिखता है। आखिर में ट्रस ही प्रधानमंत्री बनीं। यह बात अलग है कि वह कुछ ही दिन इस पद पर रहीं। प्रधानमंत्री पद संभालते ही सुनक का पहला बयान ही यह था कि ‘गंभीर आर्थिक चुनौतियों’ से निपटने के लिए वह दिन-रात काम करेंगे। उनका बयान दर्शाता है कि वह चुनौतियों से पार पाने को लेकर दृढ़ हैं। यह दर्शाता है कि उनका चयन विशुद्ध योग्यता के आधार पर हुआ है न कि पहचान या किसी अन्य पहलू के कारण।

सुनक का प्रधानमंत्री बनना भारत और दुनिया भर के लोकतंत्रों के लिए गर्व का पड़ाव है। इतिहास ने एक चक्र पूरा कर लिया है। पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि यदि भारतीयों को स्वतंत्रता मिल जाएगी तो यहां अराजकता का माहौल बनेगा। वहीं ब्रिटिश इतिहासकार एएफ पोलार्ड ने कहा था कि हिंदू संसदीय लोकतंत्र को चलाने में सक्षम नहीं होंगे। आज चर्चिल और पोलार्ड यकीनन बड़े हैरान होते।

(लेखक लोकतांत्रिक मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)