संस्कृत की महत्ता समझने का समय, पश्चिम की नकल के चलते हमारी अमूल्य विरासत विलुप्त के कगार पर
भौतिकता पर केंद्रित पश्चिमी सभ्यता मनुष्य के अस्तित्व को ही प्रश्नांकित कर रही है। अब संस्कृत ही सही विकल्प है।
[गिरीश्वर मिश्र]। बीते दिनों नई दिल्ली में विश्व संस्कृत सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसमें कई देशों ने शिरकत की। ऐसे में संस्कृत की प्रासंगिकता पर नए सिरे से विचार की दरकार लगती है। आज वैश्वीकरण के प्रभाव में जिस वेग से पश्चिमी जीवन शैली और सांस्कृतिक मूल्य चारों ओर छाते जा रहे हैं उसकी विसंगतियों को लेकर अनेक देशों के विचारक विकल्पों की तलाश में हैं।
इस दौर में भारतीय सभ्यता का विशेष महत्व आंका जा रहा है जो मनुष्य की जगह समग्र सृष्टि को ध्यान में रखकर उसके विभिन्न तत्वों की परस्पर-निर्भरता पर बल देती है। इस प्रकार के चिंतन में संस्कृत भाषा और साहित्य के विभिन्न पक्षों के अध्ययन की प्रमुख भूमिका है। इस परिप्रेक्ष्य में हमें इस तथ्य को भी याद रखना चाहिए कि आधुनिक पश्चिमी शिक्षा ने भारतीय मानस की मुक्ति की संभावना और रचनात्मकता का दमन किया।
हमारी विरासत विलुप्त के कगार पर
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में इस प्रवृत्ति का दुष्परिणाम यह हुआ कि भारतीय प्रतिभा ने अपनी रंगत और चरित्र ही खो दिया। पश्चिम की नकल के चलते हमारी अमूल्य विरासत आज विलुप्त होने के कगार पर है। इसलिए भारतीय विचारों और ज्ञान-परंपराओं का विनष्ट होना पश्चिमी दुनिया समेत संपूर्ण विश्व की भी अपूरणीय क्षति होगी।
इसलिए उनका संरक्षण आवश्यक है जिसमें संस्कृत एक अहम कड़ी होगी। संस्कृत की परंपराएं मात्र मनुष्य ही नहीं, बल्कि जीवन और प्राणिमात्र के लिए आश्चर्यजनक रूप से प्रासंगिक हैं। भिन्न-भिन्न देश काल में बहुलता के साथ पनपा यह ज्ञान जीवन-शैली, कलाओं, शिलालेखों, अनुष्ठानों, काव्य और आस्थाओं आदि रूपों में अभिव्यक्त होता रहा है।
आध्यात्मिक मूल्य हो रहे हैं नष्ट
इनके बारे में रोचक तथ्य यह है कि इनमें किसी एक के वर्चस्व की जगह अनेकता या बहुलता का महत्व प्रकट होता है। इनका एक प्रमुख संदेश यह भी है कि मनुष्य प्रकृति का ही एक अंश है न कि उसका नियंता। आज जीवों का विलोप, जलवायु-परिवर्तन, सामूहिक विद्वेष, नरसंहार और प्रकृति का दोहन संस्कृत की मैत्री, सहअस्तित्व और सहकार वाली जीवन शैली के विरुद्ध है। वाचिक परंपरा जो समुदायों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही थी, वह अब वस्तुओं के उत्पादन और उपभोग में तिरोहित होती जा रही है। प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा, पुरखों के प्रति ममत्व, अगली पीढ़ी के प्रति दायित्व और आध्यात्मिक मूल्य नष्ट हो रहे हैं। आज जैविक और सांस्कृतिक रूपों की विविधता नष्ट हो रही है। प्रकृति के साथ अटूट रिश्ता और टिकाऊ अर्थव्यवस्था आज भौतिकता और उपयोगितावाद की भेंट चढ़ रही हैं।
मानवता का मानवीकरण
प्रकृति को पवित्र न मानकर उसका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। विकसित देशों में, जहां का मानव विकास सूचकांक ऊंचा है वहां उत्पादन और उपभोग का स्तर भी स्वाभाविक रूप से उतना ही ऊंचा है। वहां छोटी सी जनसंख्या द्वारा अधिकांश संसाधनों का उपयोग किया जाता है। दुनिया पर एकछत्र अधिकार जमाने की अवधारणा के चलते धरती को खंगालना, मानवता का मानकीकरण, हिंसा, युद्ध, सामाजिक अन्याय और आर्थिक असमानता मूलत: निरपेक्ष पश्चिमी विचारों की देन हैं।
जीवों की परस्परनिर्भरता
वैदिक काल से ही यह स्वीकृत है कि इस धरती पर भिन्न-भिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग रहते हैं। एक सत्य का अनेक ढंग से वर्णन किया जाता है। साथ ही इसमें मन, हृदय और कर्म की एकता पर भी बल दिया गया, ताकि सबके बीच सहृदयता बनी रहे। जीवों की परस्परनिर्भरता तथा समस्त ब्रह्मांड की संबद्धता का भाव निरंतर उपस्थित है। इस परंपरा में अंत: सांस्कृतिक संवाद का भी अवसर बना, जिसका आधार मूलत: नैतिक आचरण था। करुणा, मध्यम मार्ग, अनेकांतवाद, अपरिग्रह, भक्ति, धर्म, अहिंसा, दान, परोपकार, आत्मसंयम तथा संस्कार जैसी अवधारणाओं के साथ समाज के संचालन की व्यवस्था की गई थी।
संस्कृति द्वारा प्रकृति के परिष्कार द्वारा मनुष्य की सहभागिता द्वारा संतुलन की स्थापना की व्यवस्था की गई है। इस दृष्टि में बहुसांस्कृतिक समाज के लिए एक आधार-दृष्टि मिलती है जिसमें पारस्परिक भरण-पोषण तथा साझेदारी, आदर की प्रमुखता है। ऐसी समावेशी और मानवीय दृष्टि के साथ संस्कृत की ज्ञान परंपरा लोभ और हिंसा का विकल्प देती है।
विश्व और विश्वात्मा का संबंध किया गया स्थापित
इसके अंतर्गत टिकाऊ विकास के लिए जरूरी व्यापक पारिस्थितिक नजरिये के साथ प्रकृति के संरक्षण पर बल दिया गया है। नदी, नगरी और पर्वतों को पवित्र तीर्थ की महत्ता देकर उनका संरक्षण और परम तत्व की उपस्थिति से अनुप्राणित स्वीकार कर शरीर, विश्व और विश्वात्मा का संबंध स्थापित किया गया।
वेद, पुराण, काव्य, आयुर्वेद, नाट्यशास्त्र, योग, शिल्प, वृक्षायुर्वेद, व्याकरण, गणित, ज्योतिष, नीतिशास्त्र, दर्शन आदि के सुदृढ़ अध्ययन की परिपाटी स्थापित हुई। ये सभी सार्वभौम मानवीय सिद्धांतों की ओर ले जाते हैं। इनमें लोक-कल्याण के लिए मानक कर्तव्य के भाव को प्रमुखता दी गई। इन सबमें शास्त्र और प्रयोग को परस्पर संबद्ध रखते हुए वस्तुवादी और उपयोगितावाद से बचने का यत्न किया। इस परंपरा का विस्तार कभी सुदूर दक्षिण, दक्षिण पूर्व, पूर्व तथा मध्य एशिया तक ब्राह्मण गुरुओं, सम्राट अशोक के दूतों, बौद्ध और जैन भिक्षुओं द्वारा किया गया।
मनुष्य के अस्तित्व को ही किया जा रहा प्रश्नांकित
आज पश्चिमी सभ्यता में गहरी त्रासदी देखी जा सकती है जो मनुष्य के अस्तित्व को ही प्रश्नांकित कर रही है। आधुनिकता और विकास के तर्क की सीमाएं दिख रही हैं। विकासवाद वाली आधुनिकता को विकास का चरम मानना भ्रामक और प्रगति भी एक मिथक लगने लगा है।
सामाजिक विकासवाद को मानें तो भविष्य में विश्व नष्ट हो जाएगा। सुख की उपयोगितावादी विचारधारा नाकाफी है, क्योंकि मनुष्य और प्रकृति के बीच पारस्परिक पूरकता का रिश्ता ही जीवन को संभव बनाता है। अत: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संतुलन होना चाहिए। तभी लोक-संग्रह या जन-कल्याण का लक्ष्य पाया जा सकेगा।
ऐसे में विस्मृत होती संस्कृत ज्ञान की समृद्ध परंपरा को रचनात्मकता और सुधार के साथ पुनर्जीवित और स्थापित करना एक मानवीय आवश्यकता है। इसके लिए खुले मन से संस्कृत ज्ञान परंपरा के संरक्षण, अनुकूलन और अनुप्रयोग को बढ़ावा देना होगा।
(लेखक शिक्षाविद् हैं)







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