श्रीराम चौलिया। वेनेजुएला में अमेरिकी हमला यही दर्शाता है कि हम महाशक्तियों की घातक प्रतिस्पर्धा और उनके मनमाने हस्तक्षेपों के दौर में जी रहे हैं। ऐसे दौर में जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों और जंगल के कानूनों में कोई अंतर ही नहीं रह गया है। वेनेजुएला में तख्तापलट के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शेखी बघारते हुए कहा, ‘हमें इसे फिर से करना होगा, हम फिर से ऐसा कर सकते हैं और कोई हमें रोक नहीं सकता।’ यानी जिसकी लाठी उसी की भैंस। ट्रंप का यह औपनिवेशिक दावा कि ‘हम वेनेजुएला को चलाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि इसे ठीक से चलाया जाए’, स्पष्ट संकेत है कि शक्तिशाली ही शक्तिहीन पर राज करेंगे। ट्रंप ने वेनेजुएला में अवैध रूप से सत्ता परिवर्तन करके वहां के खनिजों को अमेरिकी कंपनियों के एकाधिकार में लाने की खुलेआम घोषणा से सिद्ध कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के जो भी बचे-कुचे बंधन थे, वे भी ध्वस्त होते जा रहे हैं।

इससे पहले रूस ने अपने मुकाबले कमजोर पड़ोसी यूक्रेन पर आक्रमण कर उस पर विशेषाधिकारों का दावा किया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अनुसार बड़ी शक्तियों को अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्र रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और यूक्रेन की सच्ची संप्रभुता तभी संभव है जब वह रूस के प्रति मित्रवत और पराधीन रहे। इनके उलट चीन ने अभी तक ताइवान पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण करने या भारत, वियतनाम, फिलीपींस अथवा जापान पर सीधे हमले का प्रयास नहीं किया है, परंतु कमजोर पड़ोसियों के प्रति उसका भी औपनिवेशिक और दबंग रवैया है जो दिन-प्रतिदिन और बिगड़ता जा रहा है। जब सभी बलशाली देश आक्रामक और लुटेरे तेवरों पर उतर आएं तो बड़ी मछली का छोटी मछली को निगलना सामान्यीकृत होने लगता है।

वैश्विक राजनीति के बारे में कहा जाता है कि वह सिद्धांतों एवं मानदंडों के आधार पर संचालित होती है, लेकिन हालिया उदाहरण कुछ और ही संकेत करते हैं। वेनेजुएला में अमेरिकी हमले के बाद ताइवान को लेकर समय-समय आक्रामकता दिखाने वाले चीन पर भी अंतरराष्ट्रीय कानून वाले तर्क बेमानी हो जाते हैं। लैटिन भाषा में ‘टू कुआकवे’ जैसी एक संकल्पना है, जिसके अनुसार प्रतिद्वंद्वी के व्यक्तिगत व्यवहार और कार्यों को उनके तर्क के साथ असंगत बताकर उनके तर्क को अमान्य कर दिया जाता है। वेनेजुएला में सशस्त्र हमला कर और उसकी आंतरिक राजनीति को जबरदस्ती बदलकर ट्रंप ने हर संभावित हमलावर को सुविधाजनक बहाना दे दिया है। ट्रंप प्रशासन की नवीनतम राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अमेरिका लैटिन अमेरिका पर प्रभुत्व स्थापित करने और एक ऐसे पश्चिमी गोलार्ध का निर्माण करने के लिए उन्नीसवीं सदी के ‘मोनरो सिद्धांत’ को समकालीन संदर्भ में लागू करेगा, जिससे पूरे क्षेत्र की सरकारों को अमेरिका के आर्थिक और सामरिक हितों के अनुसार चलना होगा। अगर लैटिन अमेरिका में अमेरिका की धौंस जायज है, तो एशिया में चीन अपने आप को बेताज बादशाह क्यों न मान ले?

देखा जाए तो ताइवान का परिप्रेक्ष्य वेनेजुएला से भिन्न है, मगर जब संप्रभुता और शांतिपूर्वक बर्ताव के सिद्धांत ही लुप्त हो रहे हों तो राष्ट्रपति शी चिनफिंग जैसे आक्रामक नेता अराजकता का फायदा क्यों नहीं उठाएंगे? चीन निश्चित रूप से इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और अब वेनेजुएला में पश्चिमी दखलंदाजी का हवाला देकर ताइवान और अन्य एशियाई पड़ोसियों पर दबाव और हमले की योजनाओं को तेज करेगा। रूस की तरह चीन भी कहता आ रहा है कि पश्चिमी शक्तियों के पाखंड और दोहरे रवैये के कारण ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों के चिथड़े उड़ गए हैं और वे दोनों अपनी ‘आत्मरक्षा’ के नाम पर सख्त से सख्त कार्रवाई करने के लिए स्वयं को विवश बताते हैं। ताइवान को धमकाने के लिए चीन द्वारा किए जा रहे प्रत्येक युद्ध अभ्यास में अनिश्चितता अंतर्निहित है और इनमें से कोई भी वास्तविक युद्ध में तब्दील हो सकता है।

अब तक अगर ताइवान पर चीन ने धावा नहीं बोला है तो यह अंतरराष्ट्रीय नियम या विधि के प्रति शी चिनफिंग की श्रद्धा के कारण नहीं है, बल्कि उस उपयुक्त समय की प्रतीक्षा की वजह से है जब हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन और भूराजनीतिक परिस्थितियां चीन के पक्ष में कहीं अधिक झुक जाएं। चीन भली-भांति जानता है की अमेरिका अब भी ‘खुले एवं स्वतंत्र’ हिंद-प्रशांत को अपना मूल राष्ट्रीय हित मानता है और अमेरिकी सैन्य सामग्री लगातार ताइवान तथा अन्य एशियाई मित्र देशों को बेची भी जा रही है। चिनफिंग यह चाहेंगे कि वेनेजुएला में हस्तक्षेप के बाद अगर अमेरिका उसी पड़ोसी क्षेत्र में उपनिवेशवादी मंशा से ज्यादा उलझ जाए और चीन के साथ व्यापार समझौते के चलते एशिया की तकदीर चीन के हाथों छोड़ दें तो ताइवान पर आधिपत्य का उसके पास सुनहरा मौका होगा।

आक्रामक महाशक्तियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर किए जा रहे व्यापक आघातों के मद्देनजर छोटे देशों के लिए अपना अस्तित्व बचाए रखने की क्या रणनीति हो सकती है? मौलिक स्तर पर उन्हें समूचे ‘वैश्विक दक्षिण’ में एकजुट होकर हस्तक्षेप की नितांत अस्वीकृति के सिद्धांत पर जोर देना होगा, ताकि महाशक्तियों का जंगल-राज एक सामान्य दस्तूर न बन जाए। व्यावहारिक स्तर पर उन्हें क्षेत्रीय एकीकरण और एकता को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि कोई भी महाशक्ति आसानी से उनमें भेद पैदा करके उन्हें बांट न सके। वेनेजुएला में मादुरो ने सबसे बड़ी भूल यह की कि पड़ोसी लैटिन अमेरिकी देशों के साथ उन्होंने वर्षों से दुश्मनियां मोल लीं और अंत में अमेरिकी आक्रमण को टालने के लिए कोई प्रांतीय गठबंधन या संस्थान शेष नहीं रहा। स्मरण रहे कि एक सभ्य विश्व व्यवस्था का निर्माण तभी संभव है, जब कमजोर देश एकजुट होकर वर्चस्व का विरोध करें। इतिहास से हम थोड़ी बहुत सीख-समझ भी ले सकते हैं कि यदि साम्राज्यवाद सदियों पुराना है तो समानता और मर्यादा की चाह भी उतनी ही पुरानी है।

(लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर और डीन हैं)