विचार: उच्च शिक्षा की समस्याओं का समाधान
अगर हमें 2035 तक सकल नामांकन का अनुपात 50 प्रतिशत तक पहुंचाना है, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना है और केवल डिग्री पर केंद्रित न रह कर सीखने की सामर्थ्य को प्रोत्साहित करना है तो संस्थान निर्माण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। हमारे आज के प्रयास से भारत के शिक्षा संस्थान न केवल युवा पीढ़ी की महत्वाकांक्षाओं को सही दिशा दे सकेंगे, बल्कि यही युवा आगे चलकर विकसित भारत 2047 की नींव भी मजबूत करेंगे।
HighLights
उच्च शिक्षा केवल डिग्री नहीं, जीवन को दिशा देती है।
भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों की कमी एक बड़ी चुनौती।
डिजिटल शिक्षा, नवाचार 'विकसित भारत' के लिए बड़े अवसर।
प्रमथ राज सिन्हा। केवल डिग्री हासिल कर लेने को शिक्षा नहीं कह सकते। शिक्षा वह शक्ति है, जो जीवन को दिशा देती है। सफल शिक्षा एक व्यक्ति के सोचने का तरीका बदल सकती है, उसे जीवन उद्देश्य दे सकती है और अपने भीतर छिपी संभावनाएं पहचानने का अवसर दे सकती है। खासतौर पर उच्च शिक्षा वह पड़ाव है, जहां युवा अपनी रुचियों और क्षमताओं को पहचानते हैं और भविष्य की राह खोजने की शुरुआत करते हैं। जहां एक तरफ स्कूली शिक्षा हमें हमारे आसपास की दुनिया का ज्ञान देती है, वहीं उच्च शिक्षा छात्रों को अपने विकल्प जानने की आजादी देती है। उच्च शिक्षा समय है अलग-अलग विषयों और क्षेत्रों को समझने और यह तय करने का कि उन्हें जीवन में क्या करना है। यह प्रक्रिया सरल नहीं, जटिल होती है। एक छात्र के आजादी से अपनी राह चुन सकने के पीछे एक मजबूत संस्थान, संसाधन और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में संस्थान निर्माण एक बहुत बड़ी चुनौती है। आज देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी की उम्र 35 वर्ष से कम है। हर साल लाखों छात्र स्कूलों से निकलकर उच्च शिक्षा की ओर रुख करते हैं, लेकिन संस्थानों में इतनी सीटें ही नहीं कि सबको दाखिला मिल सके। नतीजतन प्रतिस्पर्धा और तेज होती जा रही है और परीक्षाएं और ज्यादा मानकीकृत हो रही हैं। इस सबके साथ-साथ व्यवस्था अक्सर प्रशासनिक सुविधा की सहूलियत देखती है। इस गहन माहौल में हर छात्र की अलग पहचान और क्षमता पर ध्यान दे पाना असंभव हो जाता है। आज भारत में लगभग 70,018 उच्च शिक्षा संस्थान हैं।
भले ही यह उत्साहजनक लगे, लेकिन देश की जरूरतों के मुकाबले अभी भी पर्याप्त नहीं। युवावर्ग अब भी बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा खोज रहा है। आपूर्ति की कमी का असर छात्र के इस निर्णय पर पड़ता है कि वह कहां पढ़े। सख्त आव्रजन नीतियों के बाद भी भारतीय छात्र बड़ी संख्या में विदेश पढ़ने जा रहे हैं। कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन उनके प्रमुख गंतव्य हैं। हालांकि अब फ्रांस, आयरलैंड और इटली भी तेजी से छात्रों में लोकप्रिय हो रहे हैं। जनवरी 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार 12 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेश में पढ़ रहे थे। इस आंकड़े से घरेलू स्तर पर आवश्यकता और सीमित विकल्प साफ उजागर होते हैं। इन चुनौतियों के बीच से ही बड़े अवसर भी उत्पन्न होते हैं।
तेजी से बदलती दुनिया में पहला अवसर नवाचार में निहित है। भारत में हमें अधिक बहुविषयक कार्यक्रमों की आवश्यकता है। हमें ऐसे कार्यक्रमों के बारे में सोचना होगा, जो तकनीक, पर्यावरण, सूचना और रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़े हों। मैनेजमेंट, कानून और मेडिकल जैसे पारंपरिक कोर्स को भी नए ढंग से देखना होगा। नए पाठ्यक्रम, बेहतर तकनीक और उद्योग से पढ़ाई को जोड़ कर भारतीय संस्थान खुद को वैश्विक स्तर पर मजबूत बना सकते हैं। दूसरा बड़ा अवसर है, डिजिटल शिक्षा। हाइब्रिड माडल प्रभावी हो सकते हैं, जिन्हें आनलाइन और आफलाइन पढ़ाई को मिलाकर बनाया गया हो। अगर सही ढंग से लागू किए जाएं तो ये बड़े पैमाने पर लाभकारी शिक्षा का साधन बन सकते हैं। भारत जैसे विशाल और विविध देश में, जहां छात्र दूरदराज के इलाकों में रहते हैं, डिजिटल शिक्षा एक असरदार समाधान प्रस्तुत करती है।
अपने सशक्त डिजिटल ढांचे की सहायता से भारत विश्व के लिए एक उदाहरण स्थापित कर सकता है, और उसे ऐसा करना भी चाहिए। नीतिगत स्तर पर आज सकारात्मक बदलाव दिख रहे हैं। तीन दशक बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधारों का बीड़ा उठाया है। बहुविषयक पढ़ाई, विषयों में लचीलापन और संस्थानों की स्वायत्तता जैसे विचारों पर अब जोर दिया जा रहा है। दुनिया भर के शिक्षा क्षेत्र के पूर्व अनुभव बताते हैं कि जब-जब सरकारें शोध, नवाचार और तकनीक को शिक्षा का केंद्र बनाती हैं, तब-तब शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होता है। तीसरा अहम पहलू है, प्रतिभा निर्माण। उच्च शिक्षा संस्थान का उद्देश्य केवल रुखा ज्ञान देना नहीं, बल्कि छात्रों के सोच के दायरे को विस्तार देना, कौशल को बढ़ाना और छात्रों को पेशेवर समझ देना भी है। सार्थक शिक्षा देश को ऐसा मानव संसाधन देती है, जो न सिर्फ घरेलू जरूरतों को पूरा करने क्षमता रखता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आत्मविश्वास के साथ अपना योगदान दे सकता है।
अगर हम पीछे मुड़ कर देखेंगे तो पाएंगे कि उच्च शिक्षा की परंपरा हमारी सबसे बड़ी ताकत रही है। अपने-अपने समय में तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्र विश्व भर से विद्वानों को आकर्षित करते रहे। इन सभी ने जिज्ञासा एवं शोध को शिक्षा का मूल सिद्धांत बनाया। आज भले ही समय और परिस्थितियां बदल गई हों, लेकिन हमारा लक्ष्य और भी स्पष्ट है। अगर हमें 2035 तक सकल नामांकन का अनुपात 50 प्रतिशत तक पहुंचाना है, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना है और केवल डिग्री पर केंद्रित न रह कर सीखने की सामर्थ्य को प्रोत्साहित करना है तो संस्थान निर्माण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। हमारे आज के प्रयास से भारत के शिक्षा संस्थान न केवल युवा पीढ़ी की महत्वाकांक्षाओं को सही दिशा दे सकेंगे, बल्कि यही युवा आगे चलकर विकसित भारत 2047 की नींव भी मजबूत करेंगे।
(लेखक अशोका यूनिवर्सिटी के चेयरपर्सन, बोर्ड आफ ट्रस्टी हैं)













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