जागरण संपादकीय: आर्थिक संबंधों का नया अध्याय, अमेरिका से कारोबारी रिश्ते भारत को विकसित देश बनाने में भी मददगार
India America Relation उम्मीद है मोदी और ट्रंप की वार्ता भारत-अमेरिका के बीच कारोबार बढ़ाने के साथ-साथ चीन प्लस वन के मद्देनजर भारत के लिए वैश्विक स्तर पर अधिक निर्यात के मौके निर्मित करने वाली साबित होगी। भारत और अमेरिका भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे को इजरायल से इटली तक ले जाएंगे। इससे भारत के आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी।
डॉ. जयंतीलाल भंडारी। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। उसमें भारत और अमेरिका ने व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में कारोबार तथा रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बनाने पर सहमति जताई। दोनों देशों ने अमेरिका के व्यापार घाटे को कम करने, व्यापार पर गतिरोध के बीच टैरिफ को कम करने, अधिक अमेरिकी तेल एवं गैस और लड़ाकू विमानों की खरीद के बारे में बात करने और रियायतों पर भी सहमति व्यक्त की।
साथ ही भारत और अमेरिका के बीच वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया। भारत और अमेरिका भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे के निर्माण के लिए मिलकर काम करने पर सहमत हुए। ट्रंप ने इसे सबसे बड़े व्यापार मार्गों में से एक बताया और कहा कि यह मार्ग इजरायल से इटली और फिर अमेरिका तक जाएगा।
दरअसल ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में वैश्वीकरण की जगह ‘मेरा अमेरिका प्रथम’ की धारणा को उच्च प्राथमिकता देते हुए आत्मनिर्भरता की डगर पर बढ़ना शुरू कर दिया है। इसके लिए वह सभी देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ यानी पारस्परिक शुल्क लगाने की बात कर रहे हैं। ट्रंप का कहना है कि जो देश अमेरिका पर जितना टैरिफ लगाता है, उस पर अमेरिका भी उतना ही टैरिफ लगाएगा।
इसी क्रम में ट्रंप ने कनाडा और मेक्सिको पर 25 प्रतिशत और चीन पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ का एलान किया। इस पर चीन ने पलटवार करते हुए अमेरिका पर 15 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया। इससे अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार का नया दौर शुरू हो गया है। वस्तुतः चीन, मेक्सिको और कनाडा से अमेरिका को सबसे ज्यादा व्यापार घाटा होता है।
ये तीनों देश अमेरिका के लगभग 670 अरब डॉलर व्यापार घाटे के लिए जिम्मेदार हैं। वर्ष 2023 में अमेरिका को चीन से 317 अरब डॉलर, मेक्सिको से 200 अरब डॉलर और कनाडा से 153 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ था। जबकि अमेरिका के व्यापार घाटे में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 36 अरब डॉलर रही है। हालांकि ट्रंप भारत की ओर से अमेरिकी उत्पादों पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगाने की शिकायत करते हुए बदले में भारत के उत्पादों पर भी टैरिफ लगाने की बात लगातार कहते आए हैं।
ऐसे में अब उनके द्वारा भारत के उत्पादों पर भी अधिक टैरिफ लगाए जाने की आशंका है। यही कारण है कि भारत ने अपने यहां कुछ अमेरिकी सामान पर टैरिफ कम करना शुरू कर दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 के आम बजट में भी भारत ने अमेरिका से आने वाली कई वस्तुओं जैसे मोटरसाइकिल, सेटेलाइट के लिए ग्राउंड इंस्टालेशन और सिंथेटिक फ्लेवरिंग एसेंस जैसे कुछ सामानों पर शुल्क घटा दिए हैं। दोनों देशों ने अब एक-दूसरे के लिए उपयुक्त टैरिफ तय करने पर सहमति जताई है।
प्रधानमंत्री मोदी की ट्रंप के साथ वार्ता के बाद भारत के लिए चुनौतियों के बीच अवसर भी दिखाई दे रहे हैं। ट्रंप के पहले शासनकाल में भारत चीन के खिलाफ अमेरिकी सख्ती का फायदा नहीं उठा सका था। ऐसे में अब ट्रंप द्वारा अमेरिकी प्रशासन की बागडोर संभालने के बाद भारत ने द्विपक्षीय वार्ता के साथ-साथ ऐसी बहुआयामी रणनीति पर आगे बढ़ना शुरू कर दिया है, जिससे अमेरिका के साथ वैश्विक स्तर पर भी भारत के निर्यात को बढ़ाने में मदद मिल सके।
वस्तुतः ट्रंप की नीति से भारत को चीन प्लस वन के रूप में वैश्विक व्यापार में तेजी से बढ़ने का मौका भी मिलता हुआ दिख रहा है। चीन में मैन्यूफैक्चरिंग करने वाली कई विदेशी कंपनियां भारत का रुख कर सकती हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि जिन क्षेत्रों में चीन अमेरिका को प्रमुखता से निर्यात करता है, उनमें से कई क्षेत्रों में अमेरिका को भारत अपना निर्यात सरलता से बढ़ा सकता है।
इन क्षेत्रों में इलेक्ट्रानिक्स, इलेक्ट्रिकल उपकरण, मोबाइल फोन, फुटवियर, कपड़ा, फर्नीचर, घर के सजावटी सामान, वाहनों के कलपुर्जे, खिलौने और रसायन आदि शामिल हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय निर्यातकों को अमेरिका बाजार में पहुंच बढ़ाने के लिए आम बजट में घोषित किया गया एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन अहम भूमिका निभाएगा।
इस मिशन और मार्केटिंग प्रोत्साहन से निर्यातकों को अमेरिका के विभिन्न भागों में आयोजित प्रदर्शनियों में शामिल होने और अमेरिका में निर्यात योग्य नए उभरते क्षेत्रों की संभावनाओं का दोहन करने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि जिस तरह ट्रंप अमेरिका प्रथम की रणनीति के साथ अमेरिका को तेजी से आर्थिक मजबूती देने का प्रयास कर रहे हैं, उसी तरह प्रधानमंत्री मोदी भी भारत प्रथम की रणनीति को आगे बढ़ाकर घरेलू उद्योग, कारोबार और अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ाने के मौके को मुट्ठी में ले सकते हैं।
उम्मीद है मोदी और ट्रंप की वार्ता भारत-अमेरिका के बीच कारोबार बढ़ाने के साथ-साथ चीन प्लस वन के मद्देनजर भारत के लिए वैश्विक स्तर पर अधिक निर्यात के मौके निर्मित करने वाली साबित होगी। भारत और अमेरिका भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे को इजरायल से इटली तक ले जाएंगे। इससे भारत के आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी। अमेरिका के साथ मजबूत आर्थिक-कारोबारी रिश्ते भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के लक्ष्य को पूरा करने में भी मददगार साबित होंगे।
(लेखक एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च, इंदौर के निदेशक हैं)
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