हाथ से फिसलता नेपाल
नेपाल के दो भौगोलिक क्षेत्र हैं। उत्तरी हिस्से में पहाड़ हैं और दक्षिणी तराई के हिस्से में मैदान हैं। मैदानी क्षेत्र की लंबी सीमा भारत से लगी हुई है। यहां तार नहीं लगे हैं। लोग आसानी से एक देश से दूसरे देश को आ जा सकते है।
नेपाल के दो भौगोलिक क्षेत्र हैं। उत्तरी हिस्से में पहाड़ हैं और दक्षिणी तराई के हिस्से में मैदान हैं। मैदानी क्षेत्र की लंबी सीमा भारत से लगी हुई है। यहां तार नहीं लगे हैं। लोग आसानी से एक देश से दूसरे देश को आ जा सकते है। इस क्षेत्र में भारत से पलायन किए लाखों लोग बसते है। इनके पारिवारिक संबंध भारत में हैं। इनकी शिक्षा भारत के कालेजों में होती है। इनका व्यापार भारत के साथ चलता है। इनका संबंध भारत से ज्यादा और नेपाल से कम है। तराई के इन लोगों को मध्य देशी अथवा मधेशी कहा जाता है।
नेपाल ने हाल में नए संविधान को स्वीकार किया है। इसमें तराई के लोगों की अनदेखी की गई है। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले आधे से कम लोगों को संसद में 100 सीटें दी गई हैं, जबकि तराई में रहने वाले आधे से अधिक लोगों को मात्र 65 सीटें। मधेशियों को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है। यह भेदभाव लंबे समय से चला आ रहा है। प्रशासनिक सेवाओं में इन्हें कम ही स्थान दिए जाते हैं। कुछ समय पूर्व तराई के जंगलों की जमीन को कृषि के लिए नागरिकों को आवंटित किया गया था। केवल पहाडिय़ों को भूमि दी गई। पहाडिय़ों द्वारा मधेशियों को शक की दृष्टि से देखा जाता है। इनमें तमाम भारत से आकर बसे हैं और नेपाल के नागरिक नहीं हैं। जिस प्रकार गेहूं के साथ घुन पिस जाता है उसी प्रकार नए मधेशियों के बीच पीढिय़ों से नेपाल में बसे सच्चे मधेशी नागरिक भी पिस रहे हैं।
नेपाल में नए संविधान पर हो रही चर्चा के दौरान भारत सरकार ने वहां के नेतृत्व से अंदरखाने वार्ता की थी। भारत ने तीन मांगें रखी थीं। पहली मांग थी कि सभी नागरिकों को बराबर का दर्जा दिया जाए। संसद में सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर हो यानी मधेशियों को बराबरी की हिस्सेदारी दी जाए। इस मांग को नेपाल के नेतृत्व ने अस्वीकार कर दिया है। संसद में तराई के हिस्से को छोटा कर दिया गया है। विषय को समझने की जरूरत है। मधेशियों की नेपाल में स्थिति और असम में आकर बसे बांग्लादेशी आगंतुकों की स्थिति एक समान है। यदि हम बांग्लादेशियों को बराबर का दर्जा देने को तैयार नहीं हैं तो नेपाल में मधेशियों को बराबर का दर्जा देने की मांग कैसे उठा सकते हैं?
भारत की दूसरी मांग थी कि नए संविधान मे 'सेक्युलरिज्मÓ यानी पंथनिरपेक्षता को न लिखा जाए। मूल रूप से नेपाल ने भारत की मांग को स्वीकार किया है। संविधान में सेक्युलरिज़्म का उल्लेख किया गया है परंतु साथ-साथ लिखा है कि सेक्युलरिज्म का अर्थ हिंदू सनातन परंपराओं का संरक्षण है। अत: हिंदू दृष्टिकोण को अपनाया गया है जैसा कि भारत चाहता था।
भारत की तीसरी मांग ट्रुथ एंड रिकांसिलिएशन कमीशन को प्रभावी बनाने की थी। लोकतंत्र बहाली आंदोलन के दौरान कम्युनिस्टों द्वारा अनेक अत्याचार किए गए थे। कमीशन द्वारा इन अत्याचारों की जांच करके दोषियों को दंड दिलाने का कार्य किया जाना है। ये दोषी अधिकतर कम्युनिस्ट हैं। अत: कमीशन के माध्यम से भारत द्वारा कम्युनिस्टों पर निशाना साधा जा रहा है। यह मांग उचित नहीं है। नेपाल एक सार्वभौम देश है। उसके नागरिकों को छूट है कि वे कम्युनिस्ट विचारधारा को अपनाएं अथवा अन्य को। कम्युनिस्टों पर सीधे निशाना साधने के स्थान पर उन व्यवस्थाओं पर निशाना साधना चाहिए जिनके बल पर कम्युनिस्ट पनपते हैं। नेपाल में जाति प्रथा लागू थी। भूमि तथा उद्योग चुनिंदा परिवारों के कब्जे में थे। इन कुरीतियों को दूर कर दिया जाए तो कम्युनिस्ट विचारधारा का आकर्षण स्वत: समाप्त हो जाता।
नेपाल के नेतृत्व ने भारत की तीन में से दो मांगों को अस्वीकार कर दिया है। इससे भारत सरकार के अहंकार पर चोट लगी है। कहा जा रहा है कि प्रतिरोध के रूप में भारत ने मधेशी आंदोलन को बढ़ावा दिया है। नेपाल को तेल की आपूर्ति भारत से होती है। भारत ने मधेशी आंदोलन का कारण बताकर तेल भेजना कम कर दिया है, परंतु मधेशी आंदोलन पूरी सीमा पर प्रभावी नहीं है। महेंद्र नगर में यातायात खुला है। भारत चाहता तो महेंद्र नगर के रास्ते तेल की आपूर्ति कर सकता था। कुछ ही समय पहले हमने म्यांमार की सीमा में घुस कर आतंकवादियों पर कार्रवाई की थी। ऐसा ही मधेशियों के साथ किया जा सकता था। परंतु भारत ने हल्के-फुल्के मधेशी नेताओं को खड़ा करके इनका उपयोग ढाल के रूप में किया है। परिणामस्वरूप पूरे नेपाल में भारत विरोधी वातावरण बनता जा रहा है। जनता परेशान है।
भारत सरकार के ध्यान में संभवत: 1989 की नेपाल की नाकेबंदी है। उस समय नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना का आंदोलन चल रहा था। भारत ने सीमा को सील कर दिया था। यह सिलसिला एक साल से अधिक चला। अंत में नेपाल सरकार को झुकना पड़ा और वहां लोकतंत्र की स्थापना हुई। प्रतीत होता है कि भारत सरकार उसी रणनीति को दोबारा लागू करना चाह रही है, परंतु 1989 और अब में बड़ा अंतर है। 1989 में नेपाल और चीन के बीच यातायात के साधन नगण्य थे। आज चीन ने तिब्बत के क्षेत्र में सड़को तथा रेल का जाल बिछा दिया है। चीन द्वारा नेपाल को तेल की कुछ आपूर्ति भी की जा रही है। आने वाले समय में चीन द्वारा सड़कें बनाकर नेपाल को सभी माल की आपूर्ति की जाएगी। भारत द्वारा अनायास ही नेपाल को चीन के पाले में ढकेला जा रहा है।
हमें बड़ी तस्वीर को देखना चाहिए। हमारे लिए जरूरी है कि चीन के बढ़ते दायरे को सीमित करें। नेपाल ने चीन के रास्ते तेल का आयात शुरू कर दिया तो हमारा नेपाल पर दबाव पूर्णतया समाप्त हो जाएगा। तब हम भारतीय मूल के मधेशियों की तनिक भी सहायता नहीं कर सकेंगे। छोटा भाई अपने बच्चों के साथ कठोर व्यवहार करे तो उसके परिवार को घर से निकाल देने से समस्या का हल नहीं होता है। अलग रहकर वह कठोर व्यवहार करने को और भी स्वतंत्र हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसे परिवार में रखकर समझाना ही श्रेयस्कर होता है। भारत को तत्काल नेपाल की नाकेबंदी को समाप्त करना चाहिए और तेल की आपूर्ति करनी चाहिए। नेपाल के नेतृत्व से छोटे भाई की तरह वार्ता करके मधेशियों को न्याय दिलाने का प्रयास करना चाहिए। तब हम चीन को मात दे सकेंगे और मधेशियों को भी राहत। अपने अहंकार को बढ़ावा देकर नेपाल के नेतृत्व को सबक सिखाने की वर्तमान मुहिम के सफल होने की संभावना कम ही है।
[लेखक डॉ. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं और आइआइएम बेंगलूर में प्राध्यापक रह चुके हैं]



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