देश को शर्मिंदा करता संदेशखाली, अधिकांश पीड़िताएं दलित और आदिवासी; ममता सरकार मौन
बंगाल विधानसभा के पिछले चुनाव के बाद मतगणना के समय जैसे ही यह स्पष्ट हुआ था कि ममता फिर से सत्ता में आने जा रही हैं वैसे ही तृणमूल कांग्रेस समर्थक उन लोगों पर टूट पड़े थे जिनके बारे में उन्हें संदेह था कि उन्होंने विरोधी दलों को वोट दिया है। ऐसे लोगों के साथ मारपीट की गई लोगों के घर और दुकानें जला दी गईं। पुलिस मूकदर्शक बनी रही।Sa
राजीव सचान। बंगाल के संदेशखाली इलाके में प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की टीम पर हमला और साथ ही महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने का आरोपित तृणमूल कांग्रेस का नेता शाहजहां शेख बीते 54 दिनों से फरार है। पुलिस उसे खोज नहीं पा रही है। वास्तव में यह कहना अधिक सही होगा कि वह उसे खोजने की जहमत नहीं उठा रही है।
ममता सरकार की मूक सहमति के बिना ऐसा होना असंभव है। शेख की गिरफ्तारी में सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं, इसकी पुष्टि तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के इस बयान से हुई कि शेख की गिरफ्तारी में देरी के लिए न्यायपालिका जिम्मेदार है।
ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक का यह भी कहना था कि शेख को न्यायपालिका की ओर से संरक्षित किया जा रहा है, ताकि संदेशखाली सुर्खियों में बना रहे। यह बयान इतना विचित्र था कि कलकत्ता उच्च न्यायालय को उसका स्वतः संज्ञान लेते हुए यह कहना पड़ा कि शेख की गिरफ्तारी पर कोई रोक नहीं और उसने तो केवल ईडी पर हमले के मामले में एसआइटी की ओर से जांच के उच्च न्यायालय की एकल पीठ के आदेश पर रोक लगाई थी।
संदेशखाली मामले में ममता बनर्जी के इस कथन को भी याद रखना आवश्यक है कि मुंह छिपाकर बात करने वाली महिलाएं बाहर से हैं। अभिषेक के बयान पर उच्च न्यायालय की आपत्ति के बाद तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता का कहना है कि अब शाहजहां शेख को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। हो सकता है कि ऐसा ही हो, लेकिन यह पहली बार नहीं, जब बंगाल सरकार आपराधिक गतिविधियों में शामिल तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं का बचाव करती दिखी हो।
बंगाल विधानसभा के पिछले चुनाव के बाद मतगणना के समय जैसे ही यह स्पष्ट हुआ था कि ममता फिर से सत्ता में आने जा रही हैं, वैसे ही तृणमूल कांग्रेस समर्थक उन लोगों पर टूट पड़े थे, जिनके बारे में उन्हें संदेह था कि उन्होंने विरोधी दलों को वोट दिया है। ऐसे लोगों के साथ मारपीट की गई, कुछ लोगों के घर और दुकानें जला दी गईं। पुलिस मूकदर्शक बनी रही।
इन हमलों में कुछ लोगों की जान भी गई। तृणमूल कांग्रेस नेताओं ने ऐसा आतंक मचाया था कि कई लोग जान बचाने के लिए पड़ोसी राज्य असम भाग गए थे। इनमें से कुछ बड़ी मुश्किल से महीनों बाद अपने घर लौट पाए। कुछ ने भय के कारण कहीं अन्यत्र ठिकाना बना लिया। एक समय बंगाल में ऐसा तब होता था, जब वहां माकपा के नेतृत्व में वामदलों का शासन होता था।
विरोधियों का सफाया करना और उन्हे कुचल देना वामदलों की नीति थी। धीरे-धीरे यही नीति ममता ने अपना ली। जो ममता कभी बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ थीं, अब वह उनकी संरक्षक हैं। वह नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए का विरोध इसीलिए कर रही हैं ताकि अवैध रूप से आए और बंगाल में बस गए बांग्लादेशियों पर कोई आंच न आए। शाहजहां शेख के बारे में कहा जा रहा है कि वह भी बांग्लादेशी है। पता नहीं सच क्या है, लेकिन वह पहले माकपा नेता था।
जब ममता सत्ता में आईं तो अन्य वामपंथी नेताओं की तरह उसने भी तृणमूल कांग्रेस की शरण ली। संदेशखाली में वह दलितों-आदिवासियों के खेतों पर जबरन कब्जा करके उन्हें तालाब में तब्दील कर मछलियां पालता। जिन परिवारों के लोग विरोध करते, उनकी महिलाओं का उत्पीड़न किया जाता। पीड़ित महिलाओं की मानें तो उन्हें किसी न किसी काम के बहाने बुलाकर रात भर शेख के ठिकानों पर रोका जाता। जो महिलाएं मना करतीं, शेख के गुर्गे उनके घर आ धमकते।
शेख के हाथों प्रताड़ित महिलाओं ने उसके खिलाफ तमाम शिकायतें कीं, लेकिन राजनीतिक संरक्षण हासिल होने के नाते पुलिस निष्क्रिय बनी रही। उसके खिलाफ रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाती थी। शाहजहां शेख ममता सरकार के मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक का खास है, जो हजारों करोड़ रुपये के राशन घोटाले में आरोपित हैं। इसी घोटाले के सिलसिले में पिछले महीने ईडी की टीम शेख को गिरफ्तार करने गई थी, जहां उसके साथियों ने ईडी अधिकारियों पर हमला बोल दिया।
इस हमले में कई ईडी अधिकारी घायल हो गए। इस घटना के बाद जब शेख फरार हो गया, तब संदेशखाली की पीड़ित महिलाओं ने उसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत जुटाई। जब कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने उसके ठिकानों पर धावा बोल दिया। कोई भी समझ सकता है कि यदि महिलाएं उसके अत्याचार का शिकार नहीं हुई होतीं तो इस कदर आक्रोशित नहीं हुई होतीं, लेकिन यह साधारण सी बात बंगाल सरकार को समझ नहीं आई, बल्कि यह कहें कि उसने समझने से इन्कार किया।
इस पर हैरानी नहीं कि अधिकतर विपक्षी दलों के नेता संदेशखाली के घटनाक्रम पर चुप्पी साधे हुए हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति तथाकथित सेक्युलर-लिबरल तत्वों की है। इनमें से कुछ का तर्क है कि प्रधानमंत्री मोदी भी तो मणिपुर की घटनाओं पर लंबे समय तक चुप रहे थे। क्या उन्होंने मोदी को अपना आदर्श मान लिया है? भाजपा विरोधी दल उस पर राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं। क्या हाथरस और लखीमपुर खीरी में वे खुद यही नहीं कर रहे थे?
अफसोस की बात केवल यह नही कि संदेशखाली की महिलाओं को न्याय मिलने की अधिक आस नहीं, बल्कि यह भी है कि कानून के शासन की ऐसी-तैसी करने वाले इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। संदेशखाली में अधिकांश पीड़ित महिलाएं दलित और आदिवासी हैं, लेकिन इन वर्गों की चिंता में दुबले होते रहने वाले भी शांत हैं। संदेशखाली की महिलाओं के खौफनाक आरोप सभ्य समाज को शर्मसार करने के साथ कबीलाई युग वाली बर्बरता की याद दिलाने वाले भी हैं।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)














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