सीबीपी श्रीवास्तव। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एक महिला के 25वें सप्ताह की गर्भावस्था के बावजूद गर्भपात कराने की अनुमति दी है। न्यायालय ने इस निर्णय के लिए महिला के गर्भ में पल रहे जुड़वां भ्रूण में से एक की चिकित्सकीय अनियमितताओं को आधार बनाया है। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि गर्भपात का विषय चिकित्सकीय विधिक तथा नैतिक रूप से विवादास्पद रहा है। गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम 1971 (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रिग्नेंसी एक्ट 1971) के पारित होने के पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 312 के तहत अपराध की श्रेणी में रहा है।

प्रजनक विकल्प का प्रयोग करने के अधिकार में यह भी शामिल है कि कब गर्भ धारण किया जाए तथा गर्भावस्था को अपने पूर्ण कार्यकाल तक ले जाना है या इसे समाप्त करना है। महिलाओं के इस अधिकार को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में प्राण या दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अर्थ में शामिल उनकी निजता, गरिमा, वैयक्तिक स्वायत्तता, आत्म निर्णयन तथा स्वास्थ्य के अधिकार के केंद्र में रखा गया है।

भारत में गर्भपात के मौजूदा कानूनों को उदार बनाने के लिए 1964 में एक आंदोलन शुरू किया गया। कारण यह था कि कानूनी बाधाओं के कारण असुरक्षित गर्भपात बड़े पैमाने पर हो रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में शांति लाल साह की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। गर्भपात के औषधीय, विधिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा नैतिक आयामों की व्यापक समीक्षा के बाद इस समिति ने 1966 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। समिति ने न केवल गर्भपात को वैधानिक दर्जा देने की सिफारिश की, बल्कि यह भी कहा कि सुरक्षित गर्भपात का चिकित्सकीय समापन अधिनियम बनाया जाए।

स्वास्थ्य विज्ञान की प्रसिद्ध पत्रिका ‘द लांसेट’ के अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2015 में भारत में 1.56 करोड़ गर्भपात हुए जिनमें से 78 प्रतिशत उन स्थानों पर हुए जहां स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि तेजी से होने वाले घरेलू एवं वैश्विक सामाजिक व आर्थिक परिवर्तनों के दौर में महिलाओं के प्रजनक अधिकारों के समक्ष कई बाधाएं सामने आई हैं। कदाचित इसी कारण से सरकार को एमटीपी कानून 1971 में संशोधन करने की प्रेरणा मिली है। कालांतर में इस विषय पर उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों ने भी प्रस्तावित संशोधन को प्रेरित किया है।

न्यायालय ने सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन (2009) के एक मामले में यह कहा कि महिलाओं की प्रजनक स्वायत्तता उनकी निजता का मूल अधिकार है तथा गर्भ धारण करने या नहीं करने का निर्णय केवल उनका ही निर्णय होगा और ऐसे निर्णय में राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। यह एक स्थापित तथ्य है कि प्रजनक और यौन स्वास्थ्य के अधिकार के अर्थ में जीवन स्वतंत्रता, दैहिक सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल तथा स्वास्थ्य सेवाओं के आवंटन, उपलब्धता एवं पहुंच सुनिश्चित करने का अधिकार भी शामिल है।

प्रजनक विकल्प का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का ही एक आयाम है। इसमें आनुवांशिक रूप से गर्भपात के विषय पर निर्णय लेने का अधिकार भी शामिल है। कई मामलों में न्यायालय ने 20 सप्ताह की अवधि के बाद गर्भपात कराने की अनुमति दी है। इसका मुख्य कारण चिकित्सकीय अनियमितताएं हैं जो भ्रूण और माता दोनों के लिए गंभीर जोखिम पैदा करती हैं। न्यायालय ने मुरुगन नायकर बनाम भारत संघ के एक मामले में एक दुष्कर्म पीड़िता के 32 सप्ताह के भ्रूण के गर्भपात की अनुमति प्रदान की थी। न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों को महिलाओं के प्रजनक अधिकारों पर वरीयता दी है। इसे निश्चित रूप से प्रजनक उत्तरदायित्व का एक उदाहरण कहा जा सकता है।

सरकार द्वारा दो मार्च 2020 को संसद में प्रस्तावित गर्भ के चिकित्सकीय समापन (संशोधन) विधेयक के प्रावधानों में गर्भ निरोधक की विफलता के कारण गर्भपात कराने के संदर्भ में अविवाहित महिला तथा उसके साथी को भी उसी रूप में शामिल किया गया है जिस रूप में कोई विवाहित महिला तथा उसका पति शामिल होता है। प्रस्तावित विधेयक में गर्भपात के लिए गर्भधारण की ऊपरी सीमा को 20 से 24 सप्ताह तक बढ़ाया गया है।

दरअसल यौन हमलों के कारण होने वाले गर्भधारण या किसी असामान्यता या गर्भधारण की देरी का पता लगने पर 20-24 सप्ताह के बाद भी गर्भपात की अनुमति के लिए न्यायालयों में महिलाओं की मांगों में वृद्धि हुई है। चिकित्सा प्रौद्योगिकी में प्रगति के कारण भ्रूण की कुछ असामान्यताएं 20 से 24 सप्ताह के गर्भ के बाद ही स्पष्ट होती हैं। ऐसी स्थिति में चिकित्सकों द्वारा 24 सप्ताह के बाद भी सुरक्षित रूप से गर्भपात कराया जा सकता है। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि गर्भपात के लिए ऊपरी सीमा में वृद्धि की परिकल्पना केवल कमजोर महिलाओं के लिए की गई है, जिनमें दुष्कर्म की शिकार महिलाएं, अनाचार पीड़ित महिलाएं तथा नाबालिग बालिकाएं शामिल हैं।

विधिक दृष्टिकोण के अलावा, गर्भपात और प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार को अधिकांशतः नैतिक दृष्टिकोण से भी देखा गया है। नैतिकता के चार स्तंभ- स्वायत्तता, लाभकारिता, विद्वेषहीनता तथा न्याय हैं। इनमें से स्वायत्तता सबसे महत्वपूर्ण है। इस संकल्पना में व्यक्तिगत अधिकार, स्वायत्तता, आत्म निर्णयन तथा निजता के विधिशास्त्रीय आयाम भी शामिल हैं। लाभकारिता तथा विद्वेषहीनता के सिद्धांत चिकित्सा विज्ञान को इस रूप में निर्देशित करते हैं ताकि वह सभी व्यक्तियों को लाभान्वित कर सके। इस संदर्भ में प्रजनक स्वायत्तता तथा प्रजनक उत्तरदायित्व में संतुलन होना ही चाहिए।

[अध्यक्ष, सेंटर फॉर अप्लायड रिसर्च इन गवर्नेंस]

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