प्रविण कौशल । भारत में पिछले कुछ दशक से धीरे-धीरे जनसंख्या वृद्धि दर की गति में कमी आ रही है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम सांख्यिकीय रिपोर्ट के विश्लेषण से जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे भविष्य में कुछ मामलों को लेकर अभी से ही चिंता बढ़ गई है। जनसंख्या वृद्धि दर में यदि गिरावट इसी तरह से कायम रही तो कुछ दशक के बाद देश में वयस्क आबादी कम हो जाएगी, जिससे श्रम बल का अभाव हो सकता है। ऐसे में हमें इस रिपोर्ट में छिपे संकेतों को समय रहते समझना होगा, ताकि उसी अनुरूप नीतियां भी बनाई जा सकें

भारत की प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) की कहानी चुपचाप एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय द्वारा प्रकाशित 'सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024' में इसे विस्तार से बताया गया है। वस्तुत: यह दुनिया भर में आयोजित किए जाने वाले सबसे बड़े जनसांख्यिकीय सर्वेक्षणों में से एक है- जो उस बात की पुष्टि करती है जिसे जनसांख्यिकी विशेषज्ञ वर्षों से ट्रैक कर रहे हैं। इसमें यह पाया गया है कि भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) गिरकर 1.88 पर आ गई है। आधिकारिक आंकड़ों में एक दशमलव तक पूर्णांकित (राउंड) करने पर इसे 1.9 दर्ज किया गया है। यह लगातार पांचवां वर्ष है जब भारत 2.15 के प्रतिस्थापन स्तर (रिप्लेसमेंट लेवल) से नीचे बना हुआ है। यह कोई मामूली सांख्यिकीय अपडेट नहीं है। यह एक संरचनात्मक जनसांख्यिकीय मील का पत्थर है, जिसके परिणाम आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था, श्रम बाजार, स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और सामाजिक ताने-बाने को आकार देंगे। संबंधित विशेषज्ञ इसे कई मायनों में चिंताजनक बता रहे हैं।

प्रतिस्थापन क्यों मायने रखता है : कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट- टीएफआर) बच्चों की उस औसत संख्या को मापती है जो एक महिला अपने जीवनकाल में मौजूदा जन्म दरों के आधार पर पैदा करेगी। किसी भी समाज को बिना किसी बाहरी प्रवासन के, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अपनी जनसंख्या को बनाए रखने और स्थिर रखने के लिए अपने टीएफआर को प्रतिस्थापन स्तर (रिप्लेसमेंट लेवल) पर या उससे ऊपर रखना आवश्यक होता है। वैश्विक स्तर पर यह प्रतिस्थापन स्तर पारंपरिक रूप से प्रति महिला 2.1 बच्चे माना जाता है। हालांकि भारत में यह आंकड़ा थोड़ा अधिक यानी 2.15 है। यह समायोजन भारत में जन्म के समय लिंग अनुपात (सेक्स रेशियो एट बर्थ- एसआरबी) में लगातार और चिंताजनक विकृति के कारण आवश्यक है।

कन्या भ्रूण हत्या सहित लिंग-चयनात्मक प्रथाओं ने जन्म के समय लड़कियों और लड़कों के अनुपात को बिगाड़ दिया है। वर्ष 2024 की एसआरएस रिपोर्ट के अनुसार, भारत का एसआरबी प्रति एक हजार पुरुषों पर 918 महिलाएं हैं, जिसमें वर्ष 2018 से 2020 की अवधि में रहे 907 के मुकाबले मामूली सुधार के रूप में दिख रहा है, लेकिन अभी भी लगभग 952 महिलाओं के प्राकृतिक अनुपात से काफी नीचे है। चूंकि हमारे देश में अब लड़कियां कम पैदा हो रही हैं, इसलिए जनसंख्या प्रतिस्थापन को बनाए रखने के लिए प्रति महिला अधिक जन्म की आवश्यकता होती है। 1.88 पर भारत का टीएफआर अब अपने खुद के प्रतिस्थापन (आरंभिक बिंदु) से 0.27 बच्चा नीचे है, और यह अंतर हर साल अधिक होता जा रहा है।

चार दशकों की गिरावट : यह सही है कि इस दर में पिछले चार दशकों में धीरे-धीरे ही सही, परंतु गिरावट दर्ज की है। वैसे यह कोई अपवाद नहीं है। भारत की प्रजनन क्षमता में उल्लेखनीय रूप से निरंतर गति से गिरावट आ रही है। वर्ष 1985 में राष्ट्रीय टीएफआर 4.3 था। तब से यह लगभग 0.06 प्रति वर्ष की दर से गिरा है, जिसमें कोई अचानक तेजी या उलटफेर नहीं देखा गया है। यह प्रवृत्ति उदारीकरण के दौर, मोबाइल क्रांति और इंटरनेट मीडिया के युग से पहले की है। यह निरंतरता अपने आप में महत्वपूर्ण है। जो लोग भारत की प्रजनन क्षमता में गिरावट का मुख्य श्रेय स्मार्टफोन या इंटरनेट को देते हैं, उन्हें एसआरएस डाटा में इसका बहुत कम समर्थन मिलेगा। यह गिरावट पिछले लगभग चार दशक से धीरे-धीरे हो रहा है। यह गिरावट इन तकनीकों की बड़े पैमाने पर पहुंच से बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी और स्थिर थी। हालांकि डिजिटलीकरण ने मौजूदा प्रवृत्तियों को मजबूत किया होगा, ऐसा संभव हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इस कारण जनसंख्या में गिरावट शुरू हुई है।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस गिरावट के पलटने का कोई संकेत नहीं है। यदि इसी गति से गिरावट जारी रही तो भारत का टीएफआर वर्ष 2031 तक लगभग 1.57 तक पहुंचने का अनुमान है, जो वर्तमान में अमेरिका के स्तर के समान है। उस बिंदु तक प्रतिस्थापन के सापेक्ष प्रजनन क्षमता का अंतर काफी बड़ा हो जाएगा और जनसांख्यिकीय गति (डेमोग्राफिक मोमेंटम) जो अभी भी एक बड़ी आबादी और बढ़ती जीवन प्रत्याशा द्वारा प्रदान किया जाने वाला बफर है- अंतर्निहित संकुचन (कमी) को छिपाने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।

एसआरएस 2024 डाटा से लिया जाने वाला शायद सबसे महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक बिंदु सबसे सरल है: भारत कोई अपवाद नहीं है। भारत जिस प्रजनन संक्रमण का अनुभव कर रहा है- आर्थिक विकास, महिला शिक्षा और शहरीकरण के आगे बढ़ने के साथ तीव्र गिरावट- यह वही संक्रमण है जो जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, ब्राजील, ईरान और पश्चिमी यूरोप में देखा गया है। वर्ष 1985 से 2024 तक का भारत का संबंधित आंकड़ा प्रतिस्थापन स्तर से नीचे की प्रजनन क्षमता की ओर एक सीधी रेखा का वर्णन करता है। अब एकमात्र प्रश्न यह नहीं है कि क्या भारत का टीएफआर गिरना जारी रहेगा, बल्कि यह है कि यह कितनी तेजी से गिरेगा, क्षेत्रीय विविधताएं कितनी बड़ी होंगी, और जब जनसांख्यिकीय अंकगणित को और टाला नहीं जा सकेगा, तो भारत के संस्थान इसके लिए कितने तैयार होंगे। भारत के पास इस विमर्श को शुरू करने के लिए समय है, लेकिन सीमित समय में ही यह सब करना होगा। एसआरएस सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024 ने डाटा प्रदान कर दिया है। विश्लेषण, बहस और नीतिगत प्रतिक्रिया इसके बाद आनी ही चाहिए।

आगे की राह : जनसांख्यिकीय गति समय खरीदती है, समाधान नहीं, इस तथ्य को सबसे पहले समझना होगा। भारत की आबादी अभी कुछ वर्षों तक पूर्ण रूप में बढ़ती रहेगी। यह जनसांख्यिकीय गति (पापुलेशन मोमेंटम) का प्रभाव है। कामकाजी उम्र के वयस्कों का एक बड़ा समूह बच्चे पैदा करना जारी रखेगा, जो पिछली पीढ़ियों की तुलना में कम होंगे, लेकिन संख्यात्मक वृद्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त होंगे, जबकि जीवन प्रत्याशा में वृद्धि जारी रहेगी, जिससे मौजूदा आबादी लंबे समय तक जीवित रहेगी। ये दोनों ताकतें मिलकर पूर्ण जनसंख्या गिरावट की शुरुआत को टाल देती हैं। लेकिन मोमेंटम (गति) स्थायित्व नहीं है। आज जो प्रजनन विकल्प चुने जा रहे हैं, वे तो आने वाले समय में भारत की कामकाजी उम्र की आबादी का आकार तय करेंगे। आज गिरते टीएएफआर का मतलब कल एक छोटा श्रम बल, उसके अगले दिन एक अधिक तनावग्रस्त पेंशन प्रणाली, और एक संरचनात्मक रूप से पुराना समाज है जो कामकाजी वयस्कों के सिकुड़ते आधार पर और भी अधिक मांगें डालेगा।

अलग-अलग क्षेत्रों में आबादी के आंकड़ों में विविधता
भारत की कोई एक जनसांख्यिकीय कहानी नहीं है। इसकी कई कहानियां हैं और वे विपरीत दिशाओं में खींच रही हैं। केरल का टीएफआर 1.3 है, जो इसे अमेरिका से नीचे रखता है और इटली तथा स्पेन के स्तर के करीब ले जाता है- वे समाज जो दशकों से जनसंख्या में गिरावट से जूझ रहे हैं। दिल्ली, एक महानगरीय अपवाद के रूप में 1.2 का और भी कम टीएफआर दर्ज करता है। हालांकि इसकी अनूठी इन-माइग्रेशन (आंतरिक प्रवासन) गतिशीलता राज्यों के साथ सीधे तुलना को कठिन बनाती है। स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर बिहार का टीएफआर 2.9 बना हुआ है, जो राष्ट्रीय प्रतिस्थापन सीमा से ऊपर है और सामाजिक, शैक्षिक तथा आर्थिक स्थितियों के एक बहुत ही अलग सेट को दर्शाता है।

केरलम और बिहार के बीच की दूरी केवल भौगोलिक नहीं है। यह शायद एक पूरी पीढ़ी के जनसांख्यिकीय संक्रमण (ट्रांजिशन) का प्रतिनिधित्व करती है। ग्रामीण-शहरी विभाजन भी ऐसी ही कहानी कहता है। भारत का ग्रामीण टीएफआर 2.1 है, जो ठीक राष्ट्रीय प्रतिस्थापन स्तर पर है, जबकि शहरी टीएफआर गिरकर 1.5 हो गया है। जैसे-जैसे शहरीकरण जारी रहेगा और ग्रामीण क्षेत्र तेजी से शहरी आर्थिक पैटर्न और सामाजिक मानदंडों को अपनाएंगे, राष्ट्रीय औसत निश्चित रूप से नीचे की ओर खिंचेगा। शहरी आंकड़ा भारत के जनसांख्यिकीय भविष्य का अधिक संभावित पूर्वावलोकन है।
महत्वपूर्ण सांख्यिकी : वर्ष 2024 की एसआरएस रिपोर्ट प्रजनन डाटा से कहीं आगे तक जाती है, जो भारत के महत्वपूर्ण आंकड़ों (वाइटल स्टैटिस्टिक्स) की एक व्यापक तस्वीर पेश करती है। इसमें कई महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनके बारे में भी हमें जानना चाहिए। शिशु मृत्यु दर (आइएमआर) घटकर 24 मृत्यु प्रति एक हजार जीवित जन्मों पर आ गई है, जिसमें पांच वर्षों में छह अंकों की गिरावट आई है। केरल एक बार फिर सिर्फ आठ के आइएमआर के साथ देश में सबसे आगे है, यह आंकड़ा विकसित अर्थव्यवस्थाओं के तुलनीय है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर प्रति एक हजार जीवित जन्मों पर 28 है।

सकल मृत्यु दर : वर्ष 2024 में सकल मृत्यु दर (सीडीआर) 6.4 है, जो अभी भी महामारी से पहले के स्तरों से अधिक है, यह दर्शाता है कि कोविड अवधि के मृत्यु दर के प्रभाव अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुए हैं।

मृत्यु के कारण : मृत्यु के दो कारणों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। मोटर वाहन दुर्घटनाओं से होने वाली मौतें अब कुल मौतों का 3.2 प्रतिशत हैं, जबकि आत्महत्या से होने वाली मौतें 2.8 प्रतिशत हैं, दोनों ही आंकड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों के गंभीर ध्यान की मांग करते हैं।

यहां स्वीकार करने के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है। भारत का जनसांख्यिकीय डाटा हालांकि व्यापक और पद्धतिगत रूप से मजबूत है, अपने साथ त्रुटि का एक महत्वपूर्ण मार्जिन (मार्जिन आफ एरर) लेकर चलता है। पिछली राष्ट्रीय जनगणना 2011 में आयोजित की गई थी और बाद की गणना में देरी का मतलब यह है कि महत्वपूर्ण सांख्यिकी अनुमान पूर्ण गणना के बजाय सर्वेक्षण विधियों के माध्यम से उत्पन्न किए गए हैं। एक नई जनगणना, जो लंबे समय से लंबित है, जनसांख्यिकीय स्थिति के हमारे वर्तमान अध्ययन को और अधिक परिष्कृत या संशोधित कर सकती है।

(लेखक परिचय- डायरेक्टर, मृकल (एआई/ डाटा सेंटर)