नई दिल्ली [ संजय गुप्त ]। उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर में हुए उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा को गहन आत्मविश्लेषण के लिए विवश करने का काम किया है। एक तो इसलिए कि गोरखपुर लोकसभा सीट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छोड़ी हुई सीट थी और दूसरे भाजपा बीते 29 साल से यहां से जीतती चली आ रही थी। इसी कारण यहां के चुनाव नतीजे को इस रूप में भी देखा जा रहा है कि भाजपा के लिए आगामी आम चुनाव की राह मुश्किल होने जा रही है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच का तालमेल देश भर में विपक्षी एकता को सुनिश्चित करेगा, लेकिन इतना अवश्य है कि उत्तर प्रदेश में इन दलों के बीच का मेल-मिलाप भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। ध्यान रहे कि पिछले आम चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सीटें जीतीं थीं। इनमें 71 सीटें उसकी अपनी थीं। उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ 40 में से 31 सीटें जीती थीं। गोरखपुर और फूलपुर के चुनाव नतीजों ने यह भी साबित किया कि इस राज्य में राजनीतिक दलों के लिए दलित एवं पिछड़ी जातियों को अपने साथ लिए बगैर चुनावी सफलता हासिल करना कठिन है। यही बात बिहार के संदर्भ में भी लागू होती है।

सपा-बसपा के गठबंधन से भाजपा की रणनीति कामयाब नहीं हो सकी

गोरखपुर और फूलपुर में मायावती ने जिस तरह अखिलेश यादव के प्रत्याशी को यकायक समर्थन देने का फैसला किया वह अप्रत्याशित ही कहा जाएगा, क्योंकि 25 साल पहले इन दोनों दलों के बीच की दोस्ती एक तरह से दुश्मनी में बदल गई थी। दोनों दलों के नेताओं के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के बीच की कटुता समय के साथ कम भले हुई हो, लेकिन वह साफ नजर आती रही। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव नतीजों के बाद दोनों दल समझौता करने के लिए विवश हुए-ठीक वैसे ही जैसे बिहार में लालू और नीतीश हुए थे। गोरखपुर और फूलपुर में बसपा की ओर से सपा उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा के बाद भाजपा के पास इतना अवसर ही नहीं बचा था कि वह अपनी रणनीति बदल सके। अगर बसपा ने उपचुनाव की घोषणा होते ही अपने प्रत्याशी न उतारने और सपा के उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा की होती तो शायद भाजपा ने अपने प्रत्याशियों का चयन इस संभावित परिदृश्य को देखकर किया होता।

भाजपा अति आत्मविश्वास के कारण हारी

उपचुनाव नतीजों के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह जो कहा कि अति आत्मविश्वास के कारण पार्टी को हार का सामना करना पड़ा वह सही है। नतीजों के बाद मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक कमजोरियों को दूर करने के संकेत दिए हैैं, लेकिन इसके साथ ही भाजपा को संगठन के स्तर पर भी बहुत कुछ करना होगा और सामाजिक समीकरणों को दुरुस्त करने के मामले में भी।

उपचुनाव आम चुनाव की झलक नहीं पेश करते

विपक्षी दल चाहे जैसा दावा करें, वे इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि उपचुनाव आम चुनाव की झलक नहीं पेश करते। उपचुनावों के प्रति आम जनता की वैसी दिलचस्पी नहीं होती जैसी आम चुनाव के दौरान नजर आती है। इसी कारण उपचुनाव में मतदान का प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहता है। गोरखपुर और फूलपुर में भी यही देखने को मिला। दोनों जगहों पर मतदाताओं के समक्ष न तो कोई राष्ट्रीय मसला था और न ही यह सवाल कि सरकार किसकी बननी है? उन्हें यह भी पता था कि वे जिसे वोट दे रहे हैं उसका कार्यकाल बस चंद महीनों का ही है और कोई भी जीते, सरकार की सेहत पर असर नहीं पड़ना।

उपचुनाव में राष्ट्रीय लहर के आधार पर मतदान नहीं होता

विपक्षी दल गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों के नतीजों की चाहे जैसी व्याख्या करें, वे इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि जब आम चुनाव के लिए मतदान होता है तो जनता के मन में किसी प्रत्याशी के चयन से ज्यादा प्रधानमंत्री के चयन की बात होती है। स्पष्ट है कि गोरखपुर, फूलपुर अथवा अररिया के नतीजों का विश्लेषण करते समय इस पर गौर किया जाना चाहिए कि उपचुनाव में किसी राष्ट्रीय लहर के आधार पर मतदान नहीं होता। कई बार तो उपचुनाव में स्थानीय मसले ही छाए रहते हैैं। एक अन्य तथ्य यह भी है कि भारत में चुनाव की जो प्रणाली है उसमें सबसे अधिक मत पाने वाला प्रत्याशी विजयी होता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल मतों के विभाजन से लाभ-हानि में रहते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव का ही उदाहरण लें तो भाजपा को करीब 31 प्रतिशत मत मिले थे। इसके बावजूद वह अकेले दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल करने में सफल रही। यह इसलिए हुआ, क्योंकि भाजपा विरोधी मतों का विभाजन हो गया। जब ऐसा नहीं हुआ जैसे कि बिहार विधानसभा चुनाव में तो उसे पराजय का सामना करना पड़ा।

गोरखपुर और फूलपुर के नतीजों से कांग्रेस को आत्मचिंतन करना चाहिए

गोरखपुर और फूलपुर के नतीजों से सपा-बसपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस भी उत्साहित है, लेकिन उसका उत्साह हैरान करने वाला है। ऐसा लगता है कि वह यह नहीं देखना चाहती कि इन दोनों सीटों पर उसकी जमानत तक जब्त हो गई। ऐसे नतीजे तो कांग्रेस के लिए गंभीर आत्मचिंतन का विषय बनने चाहिए। इसलिए और भी कि उत्तर प्रदेश लंबे समय तक उसका गढ़ रहा है। जिस फूलपुर में कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई वह एक समय जवाहर लाल नेहरू की सीट हुआ करती थी। अगर कांग्रेस ने मौजूदा समय खुद को सपा-बसपा गठबंधन की काट के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की तो उसका सफाया होना तय है। अगर वह मजबूती से लड़ती है तो इससे भाजपा को ही फायदा होगा और यदि वह सपा-बसपा का साथ देने का फैसला करती है तो उसकी स्थिति और कमजोर हो सकती है।

उपचुनावों में भाजपा की पराजय के बाद सपा-बसपा में और निकटता आई

बेहतर हो कि कांग्रेस यह सोचे कि वह क्षेत्रीय दलों का सहारा लेकर कितनी दूर चल सकेगी? वह इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने में उसकी हिस्सेदारी लगातार कम होती जा रही है। उपचुनावों में भाजपा की पराजय के बाद न केवल सपा-बसपा में और निकटता आती दिख रही है, बल्कि अन्य दलों के बीच भी विचार-विमर्श तेज हो गया है।

मतभेदों को दरकिनार करके सपा-बसपा ने की योगी और मोदी की राह रोकने के लिए तैयारी

हालांकि यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि सपा-बसपा का साथ कहां तक जाएगा और कितने दिन चल पाएगा, क्योंकि दोनों दलों की राजनीतिक सोच और महत्वाकांक्षाएं अलग-अलग हैं, लेकिन फिलहाल यही दिख रहा है कि दोनों अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए वे योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी की राह मिलकर रोकने की तैयारी कर रहे हैैं। इसी कारण वे अपने मतभेदों की चर्चा नहीं कर रहे हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की एकजुटता भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती पेश कर सकते हैं

इसी तर्ज पर कुछ अन्य राज्यों में क्षेत्रीय दल एका की संभावनाएं तलाश रहे हैं। कांग्रेस भी इसके लिए तत्पर है कि क्षेत्रीय राजनीतिक दल उसके नेतृत्व में एकजुट हो जाएं। वे इस एकजुटता का मकसद 2019 के आम चुनाव में भाजपा को सत्ता में आने से रोकना बता रहे हैैं, लेकिन उनकी एकता भाजपा के लिए तभी कोई गंभीर राजनीतिक चुनौती बन सकती है, जब वे देश के सामने कोई ठोस वैकल्पिक एजेंडा पेश करने और साथ ही उसके माध्यम से जनता का भरोसा हासिल करने में समर्थ होते हैं। केवल मोदी की राह रोकना कोई ठोस एजेंडा नहीं कहा जा सकता।

[ लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं ]

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