बांग्लादेश में चीन-पाकिस्तान का दखल और कट्टरपंथ बढ़ने की आशंका
स्वाधीनता के समय से ही भारत ने हमेशा बड़े भाई की भूमिका निभाई लेकिन मौजूदा हालात में भारत-बांग्लादेश के संबंध यथावत रहेंगे यह तो आने वाले वक्त बताएगा...और पढ़ें
जागरण न्यू मीडिया में एग्जीक्यूटिव एडिटर के पद पर कार्यरत। दो दशक के करियर में इन्होंने कई प्रतिष्ठित संस्थानों में कार ...और जानिए
नई दिल्ली, अनुराग मिश्र। स्वाधीनता के बाद से ही बांग्लादेश के प्रारंभिक वर्ष राजनीतिक अस्थिरता से भरे थे। देश में 13 शासक आए और 4 सैन्य बगावतें हुई। पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश में भी उथल-पुथल का दौर चलता रहा, लेकिन हाल के वर्षों में उसने वैभव, संपन्नता और विश्व में एक नए उभरते राष्ट्र के तौर पर भी पहचान बनाई। हालांकि अपनी इस समृद्धि को वह लंबे समय तक सहेज कर नहीं रख सका। लगातार हिचकोले खाती सत्ता, नेताओं और जनता के बीच अंतर्द्वंद्व और आर्थिक समृद्धि के बुलबुले ने बांग्लादेश को कभी ‘आमार सोनार बांग्ला’ बनने नहीं दिया। हाल के प्रदर्शनों ने वैश्विक पटल पर बांग्लादेश की अस्थिर राष्ट्र की छवि को उकेर दिया। इसने न केवल इसे आर्थिक तौर पर कमजोर किया बल्कि लोकतांत्रिक तौर पर भी अस्थिर मुल्क का ठप्पा लगाया। बीते कुछ दशकों में भारत और बांग्लादेश की दोस्ती ने नित नए आयाम गढ़े। स्वाधीनता के समय से ही भारत ने हमेशा बड़े भाई की भूमिका निभाई जो हर आड़े वक्त पर हमेशा साथ खड़ा और सलाह देता दिखा, लेकिन मौजूदा हालात में भारत-बांग्लादेश के संबंध यथावत रहेंगे या उनकी गर्मजोशी में कमी आएगी, यह तो आने वाले वक्त बताएगा। बांग्लादेश में अस्थिरता की वजह से भारत की सुरक्षा के लिए किस तरह की चुनौती बनेगी, यह यक्ष प्रश्न है। सवाल यह भी है कि क्या चीन-पाकिस्तान इस मौके का लाभ उठाकर भारत के खिलाफ खेमेबंदी को मजबूत करेंगे? ऐसे हालात में भारत को संतुलन स्थापित करने के लिए किस तरह की रणनीति बनाने की आवश्यकता है, जो वैश्विक स्तर पर उसकी लगातार बढ़ती स्थिति को और मजबूत करे।
बांग्लादेश में दो प्रमुख पार्टियां हैं, एक है आवामी लीग जिसकी प्रमुख शेख मुजीब उर रहमान की बेटी शेख हसीना हैं। दूसरी पार्टी है बीएनपी, जिसकी प्रमुख खालिदा जिया हैं। शेख हसीना ने पहली बार 1996 में चुनाव जीता था। ले. कर्नल सोढ़ी बताते हैं, वहां कानून था कि बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वालों को 30 फीसदी रिजर्वेशन मिलेगा। शेख हसीना ने 1997 में इस कानून में संशोधन किया कि स्वतंत्रता सेनानियों के साथ उनके बच्चों को भी रिजर्वेशन मिलेगा। इससे जनता में नाराजगी बढ़ने लगी। उनकी मांग थी कि जो देश के लिए लड़े उन्हें तो रिजर्वेशन मिले, लेकिन उनके बच्चों को रिजर्वेशन क्यों देना? तब भी इसे लेकर प्रदर्शन हुआ, लेकिन वह छोटे स्तर पर रहा और उसे दबा दिया गया। 2011 में शेख हसीना ने एक और भारी गलती की। एक नया कानून लाया गया, जिसके मुताबिक स्वतंत्रता सेनानियों के नाती-पोतों को भी आरक्षण मिलेगा। इससे बांग्लादेश में बड़े स्तर पर आक्रोश हुआ। इसके खिलाफ कभी कम तो कभी ज्यादा नाराजगी बढ़ती रही।
लगातार 15 साल शासन के दौरान शेख हसीना ने बांग्लादेश के इलेक्शन कमीशन या ब्रॉडकास्टिंग काउंसिल जैसी संस्थाओं में तानाशाही चलाई और अपने लोगों को रखा। इससे भी लोगों में आक्रोश बढ़ रहा था। पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश ने आर्थिक रूप में काफी तरक्की की। उनका निर्यात तेजी से बढ़ रहा था। लोगों के पास पैसे आने लगे तो उन्हें लगने लगा कि उनके लोकतांत्रिक अधिकार कुचले जा रहे हैं। यूनाइटेड इंस्टीट्यूट ऑफ पीस की रिपोर्ट के अनुसार इस आंदोलन के पीछे कई वजह थी। एक तरफ बढ़ती महंगाई के बीच नौकरियों की कमी से छात्रों के बीच पहले से असंतोष का माहौल था तो दूसरी तरफ सरकार सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग के पक्ष में धांधली कर रही है, इस धारणा ने जनता के बीच असंतोष को बढ़ावा दिया। विरोध प्रदर्शनों के प्रति सरकार की कठोर प्रतिक्रिया ने तनाव को बढ़ा दिया और अशांति को बढ़ाने में योगदान दिया।
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