राहुल वर्मा। भारत का चुनावी परिदृश्य ऐसा है कि प्रमुख राज्यों में कम से कम एक राष्ट्रीय दल तो मुकाबले में होता है, लेकिन तमिलनाडु इस पैमाने पर बड़ा अपवाद है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस से लेकर वर्तमान में स्वयं को देश के सबसे बड़े दल के रूप में स्थापित कर चुकी भाजपा भी इस राज्य में केवल सहयोगी की भूमिका में हैं। सत्तारूढ़ द्रमुक और विपक्षी अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले खेमे ही यहां अपने-अपने सहयोगियों के साथ सत्ता के समीकरणों को साधने की जुगत में लगे हैं। करीब पांच दशकों से प्रदेश की दो ध्रुवीय हो चली राजनीति को अभिनेता से नेता बने विजय की नवगठित पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम यानी टीवीके त्रिकोणीय बनाने में जुटी है।

चूंकि द्रमुक न केवल सत्तारूढ़ दल, बल्कि द्रविड़ राजनीति की मूल प्रवर्तक पार्टी है, इसलिए सबसे पहले उसकी संभावनाओं पर चर्चा उपयोगी होगी। राज्य के राजनीतिक इतिहास पर दृष्टि डालें तो द्रविड़ राजनीति की वटवृक्ष होने के बावजूद द्रमुक कभी लगातार दो बार सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है। जबकि अन्नाद्रमुक ने पहले एमजी रामचंद्रन के नेतृत्व में 1977, 1980 और 1984 के चुनावों में लगातार तीन बार और फिर जे. जयललिता के दौर में 2011 और 2016 के चुनावों में लगातार जीत हासिल की। इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि द्रमुक अपने शासन में सत्ता विरोधी रुझान की काट नहीं कर पाती।

इसके कारणों की पड़ताल की जाए तो यह पार्टी मुख्य रूप से पारिवारिक नेतृत्व पर ही निर्भर रही है और इसमें कार्यकर्ताओं या संगठन की शक्ति पर कभी बहुत अधिक जोर नहीं दिया गया। दबे स्वरों में यह बात भी सामने आती है कि पार्टी की सत्ता के दौरान संगठन खासतौर से जिला स्तर के कार्यकर्ताओं की दबंगई और भ्रष्टाचार पार्टी के लिए घातक सिद्ध होता है। ऐसे में, प्रादेशिक नेतृत्व के प्रति जनता में भले ही उतना असंतोष न हो, लेकिन स्थानीय नेतृत्व की कारगुजारियों की कीमत पार्टी को चुकानी पड़ती रही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि केवल द्रमुक ही ऐसी विसंगतियों से त्रस्त है, लेकिन पार्टी सत्ता विरोधी रुझान का अभी तक तो कोई कारगर तोड़ नहीं निकाल पाई है। तब देखना यही होगा कि क्या इस चुनाव में द्रमुक इस रुझान को धता बता पाती है या नहीं?

द्रमुक अगर कभी दोबारा सत्ता में वापसी नहीं कर पाई तो इसका एक कारण यह भी गिनाया जा सकता है कि द्रविड़ राजनीति में तमाम दल उससे टूटकर ही निकले हैं। यहां तक कि अन्नाद्रमुक भी द्रमुक में विभाजन से बनी है। इस कड़ी में एमडीएमके से लेकर कई अन्य छोटे-बड़े दलों के नाम भी हैं। स्पष्ट है कि इन दलों के अस्तित्व में आने के साथ ही द्रमुक का जनाधार भी घटा, क्योंकि नया आकार लेने वाला दल पुराने जनाधार की कीमत पर ही आगे बढ़ता है। इसमें जातीय एवं वर्गीय गोलबंदी और स्पष्ट रूप से सामने आती है। पार्टी का सामाजिक ढांचा भी कमजोर होता है, क्योंकि कुछ तबके उससे छिटक जाते हैं।

अन्नाद्रमुक की बात करें तो पहले एमजी रामचंद्रन और फिर जयललिता के निधन से नेतृत्व के स्तर पर उपजी रिक्तता से पार्टी लंबे समय तक नहीं उबर पाई। जबकि द्रमुक में पार्टी के पुरोधा एम. करुणानिधि ने अपने जीवनकाल में ही पीढ़ीगत नेतृत्व का निर्णय करते हुए एमके स्टालिन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। यहां तक कि द्रमुक में अगली पीढ़ी के नेतृत्व के लिए स्टालिन के पुत्र उदयनिधि को भी अभी से तैयार किया जा रहा है।

वहीं, जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक में कई खेमों में बंट गई, जिसका राजनीतिक मोर्चे पर उसे नुकसान भी उठाना पड़ा। हालांकि समय के साथ यह स्थिति कुछ सुधरी है। जयललिता के बाद पार्टी और सरकार की कमान संभालने वाले ई. पलानीसामी को संगठन एवं सरकार दोनों के स्तर पर कमजोर आंका गया, लेकिन अब उन्होंने अपनी स्थिति खासी मजबूत की है। वे असंतुष्ट धड़ों को साधने में सफल रहे हैं। दिनाकरण गुट भी अब उनके साथ हो गया है। राज्य में भी भाजपा भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के रूप में इन दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। अब यह तो समय ही बताएगा कि एकजुट होकर यह गठबंधन क्या द्रमुक को अपदस्थ कर राज्य की सत्ता में वापसी करने में सफल हो सकेगा या नहीं।

राज्य की अगली सरकार का तानाबाना बहुत कुछ अभिनेता विजय की टीवीके के प्रदर्शन पर भी निर्भर करेगा। उन्हें लेकर जानकारों की राय बंटी हुई है। फिर भी, राज्य में दोनों दलों से निराश मतदाताओं को विजय में एक उम्मीद की किरण नजर आ रही है। उनकी अपील लगभग सभी वर्गों में है, लेकिन खासतौर से युवा, महिलाएं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों में उनके लिए अच्छा-खासा समर्थन देखा जा रहा है। देखना यह होगा कि यह समर्थन वोटों में कितना बदल पाता है, लेकिन अगर उनकी पार्टी 15 से 20 प्रतिशत तक मत हासिल करने में सफल हो जाती है तो राज्य के स्थापित दलों और उनके गठबंधन के गणित बिगड़ना तय है।

राष्ट्रीय दलों की राज्य में बहुत ज्यादा राजनीतिक पैठ भले न हो, लेकिन राष्ट्रीय विमर्श जरूर कुछ भूमिका निभा सकता है। हाल में परिसीमन का मुद्दा बहुत चर्चित रहा है और इसी के चलते महिला आरक्षण संबंधी संशोधन विधेयक सिरे नहीं चढ़ पाया। परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों में अलग तरह की भावनाएं हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एवं द्रमुक के मुखिया स्टालिन इसके विरोध में काफी मुखर भी रहे हैं और इसके लिए भाजपा को निशाना बनाने का कोई अवसर नहीं चूकते। ऐसे में, अगर वे इस मुद्दे को लेकर और आक्रामक होते हैं तो शायद भाजपा गठबंधन का हिस्सा होने की वजह से अन्नाद्रमुक को इसका नुकसान उठाना पड़े। वहीं, राज्य में महिला मतदाताओं की अच्छी खासी तादाद को देखते हुए भाजपा गठबंधन महिला आरक्षण की नाकामी का ठीकरा द्रमुक के सिर फोड़ने में कितना सफल हो पाता है, इस नैरेटिव की परीक्षा भी इस चुनाव में हो जाएगी।

(लेखक सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो हैं)