विचार: मुनाफाखोरी की गिरफ्त में मरीज
महंगी और साथ ही नकली दवाओं का बढ़ता कारोबार केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि नैतिक संकट भी है।
HighLights
एनपीपीए ने 137 कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित किया।
दवाओं की कीमतों में 70% तक कमी आने की उम्मीद है।
नकली दवाओं पर लगाम और जन औषधि केंद्रों का विस्तार।
प्रो. रसाल सिंह। भारत ने पिछले तीन दशकों में चिकित्सा क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है। दुनिया की हर पांच में से एक जेनेरिक दवा भारत में बनती है। इसलिए भारत को ‘विश्व फार्मेसी’ कहा जाता है। भारत ग्लोबल साउथ सहित कई देशों के लिए चिकित्सा पर्यटन का विश्वसनीय केंद्र भी है, लेकिन इस उपलब्धि के पीछे एक चिंताजनक तस्वीर भी है, जो हमारे मेडिकल स्टोर पर रोज दिखाई देती है। यह तस्वीर दवाओं की ऊंची कीमतों और उससे भी गंभीर नकली तथा घटिया दवाओं के बढ़ते कारोबार की है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि नैतिक संकट भी है, जहां मुनाफे की लालसा जीवन के मूल्य पर भारी पड़ रही है। ध्यान देने योग्य है कि दवाओं की कीमत और गुणवत्ता केवल उनके निर्माण की लागत और वैज्ञानिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि निर्माता से मरीज तक पहुंचने वाली आपूर्ति व्यवस्था से भी प्रभावित होती है।
इसी क्रम में नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथारिटी (एनपीपीए) ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उसने कैंसर की 137 गैर-अनुसूचित दवाओं पर ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन लागू किया है। ये दवाएं अब तक मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं थीं। एनपीपीए की जांच में सामने आया कि इन दवाओं पर 700 प्रतिशत तक ट्रेड मार्जिन वसूला जा रहा था। उदाहरण के लिए, कंपनी जिस दवा को 10 हजार रुपये में स्टाकिस्ट को बेचती थी, उसका अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) 50 हजार रुपये तय किया जाता था। यानी बिचौलियों, वितरकों, अस्पतालों की फार्मेसी और करों के नाम पर कीमत में 40 हजार रुपये का अंतर था।
सरकार ने ट्रेड मार्जिन को एमआरपी के अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है। इससे एमआरपी में 70 प्रतिशत तक की कमी आने की उम्मीद है। इसी व्यवस्था के तहत एनपीपीए ने 2019 में 42 कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित किया था। तब उनकी कीमतों में 90 प्रतिशत तक की कमी आई थी। मार्जिन सीमित करने का अर्थ कंपनियों की कमाई घटाना नहीं है। निर्माता को उसका निर्धारित मूल्य मिलता रहेगा, जबकि बिचौलियों का असामान्य मुनाफा घटेगा। यह इस धारणा को चुनौती देता है कि मूल्य नियंत्रण से नवाचार प्रभावित होगा।
यहां एक सवाल यह है कि क्या केवल ट्रेड मार्जिन सीमित करने से कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज सस्ता हो जाएगा? ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करना और निर्माता द्वारा तय की गई कीमत को नियंत्रित करना दो अलग-अलग पहलू हैं। यदि निर्माता शुरुआती कीमत ही बहुत अधिक तय करता है, तो 30 प्रतिशत मार्जिन की सीमा के बाद भी दवा महंगी रहेगी। इसके अलावा कंपनियां 'आर्टिफिशियल डिस्काउंट' का तरीका भी अपनाती हैं। वे चुनिंदा बड़े कारपोरेट अस्पतालों को कुछ यूनिट पर भारी छूट देकर कम बाजार मूल्य का आभास देती हैं, जबकि बाकी दवाएं ऊंची कीमत पर ही बिकती हैं। इससे नियामक के लिए दवा का वास्तविक बाजार मूल्य तय करना कठिन हो जाता है। इसलिए ट्रेड मार्जिन नियंत्रण के साथ कीमतों की सख्त निगरानी और बिक्री तथा छूट की पारदर्शी रिपोर्टिंग भी जरूरी है। यह व्यवस्था सभी दवाओं पर लागू होनी चाहिए।
नकली और घटिया दवाओं की समस्या महंगी दवाओं से भी जुड़ी है। जब दवाएं बहुत महंगी हो जाती हैं तो नकली दवाओं के लिए बाजार तैयार हो जाता है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन के अनुसार, बाजार में तीन से पांच प्रतिशत दवाएं मानक गुणवत्ता से कम या नकली हैं। सरकार को कानून और तकनीक के जरिये नियमन एवं निगरानी सुनिश्चित करनी होगी। एनपीपीए को स्वास्थ्य संस्थानों और अन्य संबंधित पक्षों के सहयोग से ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जो चार पहलुओं पर नजर रखे-मरीज का कुल बिल, दवाओं की उपलब्धता, अस्पतालों की बिलिंग और इलाज तक पहुंच।
यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कीमतें घटने के बाद संबंधित दवाएं दूरदराज के क्षेत्रों में उपलब्ध रहें, क्योंकि कंपनियां अक्सर कम मुनाफे वाली पुरानी दवाओं का उत्पादन बंद कर देती हैं। अब 300 से अधिक दवाओं पर क्यूआर कोड अनिवार्य है, जिसे स्कैन करके असली और नकली दवा की पहचान की जा सकती है। इसका दायरा धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम में संशोधन कर नकली दवा बनाने को गैर-जमानती अपराध घोषित किया गया है, जिसमें आजीवन कारावास तक का प्रविधान है। पिछले दो वर्षों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों का पालन नहीं करने वालीं 150 से अधिक कंपनियों के लाइसेंस रद किए गए हैं। ऐसी कंपनियों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई भी होनी चाहिए। प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों का विस्तार हो। आज 14 हजार से अधिक केंद्रों पर दो हजार से अधिक दवाएं 50 से 90 प्रतिशत तक कम कीमत पर उपलब्ध हैं।
डाक्टरों के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वे पर्चे पर किसी खास कंपनी की दवाएं अस्पष्ट लिखने के बजाय स्पष्ट रूप से जेनेरिक दवाओं के नाम लिखें। आज चिकित्सा तंत्र मुनाफाखोरी की गिरफ्त में है। इसका एक कारण चिकित्सा शिक्षा का महंगा और सीमित होना भी है। सरकार को गुणवत्तापूर्ण, सस्ती और सर्वसुलभ सार्वजनिक चिकित्सा शिक्षा का विस्तार करना चाहिए। साथ ही निजी चिकित्सा शिक्षा की फीस को नियंत्रित करने के कदम भी उठाने चाहिए।
(लेखक किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली में प्रोफेसर हैं)




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