कांग्रेस का चुनिंदा विरोधाभास: सीएम माझी
मुख्य चुनाव आयुक्त के त्यागपत्र की मांग पर अड़ी कांग्रेस यदि वास्तव में चुनाव आयोग की स्वायत्तता को मजबूत बनाना चाहती है, तो उसे ठोस सुधारों पर सहमति बनानी चाहिए।
HighLights
कांग्रेस चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठा रही, इस्तीफे की मांग।
मोहन चरण माझी ने कांग्रेस के दोहरे मापदंडों पर प्रकाश डाला।
चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकारी प्रभाव पर बहस।
मोहन चरण माझी, मुख्यमंत्री- ओडिशा। देश की राजधानी नई दिल्ली की सड़कों पर पिछले कुछ समय से मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन एवं नारेबाजी हो रही है। आरोप है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर हमला हो रहा है और यह संवैधानिक संस्था सरकार के प्रभाव में काम कर रही है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का तर्क है कि कल तक चुनाव आयोग निष्पक्षता का प्रतीक था, लेकिन आज उसकी स्वायत्तता खतरे में है। यह दावा सुनने में भले ही प्रभावशाली लग सकता है, लेकिन निष्पक्षता की मांग करने वालों से यह पूछना भी जरूरी है कि क्या उन्होंने सत्ता में रहते हुए इन्हीं सिद्धांतों का पालन किया था?
लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता की असली परीक्षा तब होती है, जब उनके फैसले राजनीतिक दलों की अपेक्षाओं के अनुरूप न हों। लेकिन क्या किसी संस्था की निष्पक्षता का पैमाना चुनावी नतीजों से तय किया जा सकता है? क्या जीत मिलने पर वही प्रक्रिया स्वीकार्य और हार होने पर संदिग्ध हो जाती है? चुनाव आयोग को लेकर कांग्रेस के मौजूदा रुख ने ऐसे ही बुनियादी सवाल खड़े किए हैं।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर बहस आज से शुरू नहीं हुई है। कांग्रेस के लंबे शासनकाल में भी आयोग की नियुक्तियों, उसकी संरचना और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अधिकारों को लेकर विवाद उठे थे। वर्ष 1989 में निर्वाचन आयुक्तों के अतिरिक्त पदों का सृजन, 1993 में टीएन शेषन के कार्यकाल के दौरान आयोग की संरचना में बदलाव और 2009 में नवीन चावला की नियुक्ति ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें वर्तमान बहस से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
इस पूरे विवाद में एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है कि आरोप और प्रमाण एक ही चीज नहीं हैं। चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे मतदाता सूची के एसआइआर की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित मामले में चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। मगर न्यायिक जांच पूरी होने से पहले ही इस्तीफे की मांग को अंतिम निष्कर्ष की तरह पेश करना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
नियुक्तियों में सरकारी प्रभाव : संविधान के अनुच्छेद 324 ने चुनाव आयोग को चुनाव संबंधित फैसले लेने की जिम्मेदारी दी है। लंबे समय तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा केंद्र सरकार की सलाह पर होती रही। इस व्यवस्था में संसद ने सात दशकों से अधिक समय तक नियुक्तियों की प्रक्रिया निर्धारित करने वाला अलग कानून नहीं बनाया। इस अवधि के बड़े हिस्से में कांग्रेस सत्ता में रही।
कांग्रेस नियुक्तियों में सरकारी प्रभाव को लेकर सवाल उठा रही है, तब यह पूछना स्वाभाविक है कि सत्ता में रहते हुए उसने इसे बदलने की पहल क्यों नहीं की। यदि नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार आवश्यक था, तो इसकी जिम्मेदारी उन सभी दलों की थी, जिन्हें लंबे समय तक शासन करने का अवसर मिला।
अक्टूबर 1989 में लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले राजीव गांधी सरकार ने दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों के पद बनाए और एसएस धनोआ एवं वीएस सीगल को नियुक्त किया। नवंबर 1989 में चुनाव के बाद बनी नई सरकार ने कुछ ही सप्ताह में इन दोनों पदों को समाप्त कर दिया। इस घटनाक्रम ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया कि क्या चुनाव आयोग की संरचना में बदलाव संस्थागत जरूरतों के आधार पर किया गया था या सरकार और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बीच टकराव ने इसमें भूमिका निभाई थी?
वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम पारित किया। इसके तहत नियुक्तियों के लिए प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता वाली चयन समिति का प्रविधान किया गया। यह नियुक्ति प्रक्रिया को वैधानिक आधार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। इस प्रक्रिया में पहली बार विपक्ष के नेता को वैधानिक स्थान मिला। कांग्रेस के लंबे शासनकाल में इस प्रक्रिया में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं होती थी। सरकार जिसे चुनती थी, देश को उसी पर भरोसा करना पड़ता था।
मतदाता सूची का पुनरीक्षण करना चुनाव आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है। क्या पात्र नागरिकों को गलती से सूची से बाहर कर दिया गया था और क्या यह प्रक्रिया पारदर्शी थी, ये तथ्य से जुड़े सवाल हैं। केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम में एसआइआर की समान प्रक्रिया अपनाई गई थी। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने जब जीत हासिल की, तब कांग्रेस ने मतदाता सूची को लेकर एक शब्द भी नहीं कहा।
वहीं, पश्चिम बंगाल और असम में कांग्रेस हार गई, तो राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि चुनावों में हेरफेर किया गया है। जो लोग चुनाव में हार गए, वे अब सड़कों पर उतरकर जीत हासिल करना चाहते हैं। यदि किसी प्रक्रिया पर आपत्ति केवल चुनावी हार के बाद अधिक मुखर होती है, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।




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