अभिषेक। केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हरदीप सिंह पुरी ने इसी माह ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स (ईओएलआइ) 2020 और नगर पालिका कार्य निष्पादन सूचकांक (एमपीआइ) वर्ष 2020 की अंतिम रैंकिंग को जारी किया है। वर्ष 2020 में आयोजित मूल्यांकन प्रक्रिया में 111 शहरों ने भाग लिया था। ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स 2020 में सूची के लिए शहरों का वर्गीकरण जनसंख्या के आधार पर करते हुए दो सूचियां बनाई गईं। पहली उन शहरों की जिनकी आबादी 10 लाख से अधिक है और दूसरी उनकी जिनकी दस लाख से कम है।

मालूम हो कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में बेंगलुरु सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले शहर के रूप में उभरा, इसके बाद पुणो, अहमदाबाद, चेन्नई, सूरत, नवी मुंबई, कोयंबटूर, वडोदरा, इंदौर और ग्रेटर मुंबई का स्थान रहा। कुल 49 शहर इसमें शामिल थे जिनमें से 42 ने 50 से ऊपर का स्कोर किया। दूसरे वर्ग यानी 10 लाख से कम आबादी वाली श्रेणी में शिमला सर्वोच्च स्थान पर रहा, इसके बाद भुवनेश्वर, सिलवासा, काकीनाडा, सलेम, वेल्लोर, गांधीनगर, गुरुग्राम, दावणगेरे और तिरुचिरापल्ली रहे। इस वर्ग में कुल 62 शहरों को शामिल किया गया था जिनमें से 48 ने 50 से अधिक का स्कोर किया।

ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स और नगर निगम का प्रदर्शन सूचकांक : इस पूरी प्रक्रिया में जिन मानकों को आधार बनाया जाता है, उनका सीधा संबंध संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2015 में अपनाए गए सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल के लक्ष्य और उन आयामों से जुड़ता है जो शहरी विकास से जुड़े हुए हैं और जिनके लिए केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रलय जिम्मेदार है। दुनिया के स्तर पर देखें तो इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट हर वर्ष इसी प्रकार की एक ग्लोबल लिवेबिलिटी रैंकिंग प्रकाशित करती है, जिसमें यह आकलन किया जाता है कि दुनिया के कौन से शहर सवरेत्तम रहने की स्थिति प्रदान करते हैं। इस वैश्विक सर्वे में दुनिया के 140 शहरों में व्यक्तिगत जीवनशैली का आकलन किया जाता है। इसके लिए प्रत्येक शहर में स्थिरता, स्वास्थ्य और पर्यावरण समेत शिक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े लगभग 30 कारकों की माप की जाती है।

केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रलय की इस पूरी प्रक्रिया में शहरी विकास के 13 विभिन्न पक्षों या सेवाओं का आकलन तीन पहलुओं को ध्यान में रख कर किया जाता है। पहला, उस शहर में जीवन की गुणवत्ता क्या है यानी उसमें सामान्य जीवन से जुड़ी सुविधाओं की स्थिति और उन सुविधाओं का वहां के नागरिकों पर प्रभाव कितना और कैसा है। इसके लिए इस इंडेक्स में कई मानक रखे गए हैं, मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, आश्रय, जलापूíत और इससे जुड़ी साफ-सफाई और स्वास्थ्य सुविधा, आवागमन की सुविधा तथा सड़कों एवं फुटपाथ की स्थिति, नागरिकों की सुरक्षा व मनोरंजन आदि।

इस बार के इंडेक्स में इसका भारांक (यानी कुल गणना में इसकी हिस्सेदारी) 35 प्रतिशत की थी। दूसरा, शहरों की आíथक क्षमता, जिसके आकलन के लिए दो मानक रखे गए हैं। एक शहर का आíथक विकास और दूसरा शहर में उपलब्ध रोजगार के अवसर। इंडेक्स में इसका भारांक 15 प्रतिशत था। तीसरा पहलू था संवहनीयता (सस्टेनेबिलिटी) यानी पर्यावरण, ऊर्जा की खपत और लचीलापन। इसका भारांक 20 प्रतिशत था। शेष 30 प्रतिशत मूल्यांकन, सिटीजन पर्सेप्शन सर्वे के माध्यम से नगर प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई गई सेवाओं के बारे में नागरिकों के दृष्टिकोण पर आधारित था। सीपीएस यानी सिटीजन पर्सेप्शन सर्वे को सेवा की आपूíत के संदर्भ में अपने शहर के नागरिकों के अनुभव को मान्यता देने में मदद के लिए शुरू किया गया था। यह मूल्यांकन 16 जनवरी से 20 मार्च 2020 तक किया गया था। इस सर्वेक्षण में 111 शहरों के 32.2 लाख नागरिकों ने भाग लिया। भुवनेश्वर का सीपीएस स्कोर सबसे अधिक था, उसके बाद सिलवासा, दावणगेरे, काकीनाडा, बिलासपुर और भागलपुर का स्थान रहा।

ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स सूचकांक के एक परिणाम को मापता है, जबकि नगर पालिका कार्य प्रदर्शन सूचकांक उन घटकों पर ध्यान केंद्रित करता है जो उन परिणामों को पैदा करते हैं। नगर पालिका कार्य प्रदर्शन उन तत्वों की पहचान करने का काम करता है जो सेवा वितरण तंत्र, योजना, वित्तीय प्रणालियों और शासन प्रक्रिया में कुशल स्थानीय शासन को रोकते हैं। नगर पालिका कार्य प्रदर्शन सूचकांक भारतीय नगर पालिकाओं की उनके निर्धारित कार्यो में कार्य प्रदर्शन का आकलन और विश्लेषण करने का एक प्रयास है। एक नगर पालिका की जिम्मेदारियां वर्टकिल सीरीज में फैली होती हैं, जिनमें शहरी योजना जैसे जटिल मूलभूत जनसेवाओं का प्रविधान भी शामिल है। नगर पालिका कार्य प्रदर्शन सूचकांक नगर पालिकाओं की कार्यक्षमता और उनकी विकास क्षमताओं की सीमा के बारे में सक्षम जानकारी प्रदान करता है। सूचकांक के माध्यम से, नागरिक अपने स्थानीय सरकार के प्रशासन को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं, जो पारदर्शिता का निर्माण करता है और प्रमुख हितधारकों में विश्वास पैदा करता है। इस ढांचे में शामिल 20 विभिन्न क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य, जल और अपशिष्ट जल और स्वच्छता, पंजीकरण और परमिट, बुनियादी ढांचा, राजस्व प्रबंधन, व्यय प्रबंधन, राजकोषीय विकेंद्रीकरण, डिजिटल प्रशासन, डिजिटल पहुंच, डिजिटल साक्षरता, योजना तैयार करना, योजना लागू करना, योजना प्रवर्तन, पारदर्शिता और जवाबदेही, मानव संसाधन, भागीदारी और प्रभावशीलता हैं।

इंडेक्स के मायने : शहरों में बुनियादी सुविधाओं के आकलन के अतिरिक्त इस पूरी प्रक्रिया के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य है स्वस्थ प्रतिस्पर्धा। पहला तो शहरों के बीच एक दूसरे से बेहतर करने के लिए और दूसरा शहरों का खुद के पिछले साल के स्कोर में बढ़ोतरी करने को प्रोत्साहित करना जिससे नागरिकों और जिम्मेदार संस्थाओं दोनों का ध्यानाकर्षण हो और बेहतरी की एक मिली-जुली कोशिश होती रहे। इस दृष्टि से क्षेत्रीय स्तर पर देखा जाए तो दक्षिण भारत के शहरों का प्रदर्शन अन्य क्षेत्रों के शहरों की तुलना में अधिक सही रहा। दोनों ही वर्गो के 10 लाख से ऊपर या कम आबादी में डिंडीगुल को छोड़ दिया जाए तो दक्षिण भारत के किसी भी शहर का स्कोर 50 से कम नहीं रहा। सबसे बुरी स्थिति पूर्वी भारत की रही जहां सिर्फ तीन शहरों ने ही 50 से ऊपर का स्कोर किया।

शहरों के स्तर पर बात करें तो इस बार के इंडेक्स में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि दिल्ली इस इंडेक्स में 13वें स्थान पर है। हालांकि दिल्लीवासियों के लिए यह एक सांत्वना वाली बात रही कि नगर पालिका कार्य प्रदर्शन सूचकांक में 10 लाख से कम जनसंख्या वाली नगर पालिकाओं में नई दिल्ली नगर पालिका परिषद ने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। इन परिणामों के पीछे क्या सही, क्या गलत हुआ, यह समझने की दृष्टि से अलग-अलग श्रेणियों और आयामों को देखें तो आíथक क्षमता में दिल्ली दूसरे स्थान पर रही और इसकी उप-श्रेणी आíथक मौकों की उपलब्धता के मामलों में पूरे 100 में 100 नंबर प्राप्त करने के अलावा हर श्रेणी में दिल्ली का प्रदर्शन बुरा रहा। जीवन की गुणवत्ता के नजरिये से दिल्ली 35वें स्थान पर रही। इसके घटकों में आवास और आश्रय शामिल है जिसमें दिल्ली का स्कोर 89.04, सुरक्षा में स्कोर 79.56 तथा शिक्षा में स्कोर 77.29 को छोड़ दिया जाए तो शेष मानकों में दिल्ली का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। सस्टेनेबिलिटी में पर्यावरण और लचीलेपन से जुड़े मानकों को देखा जाता है, उनमें लचीलेपन की उपश्रेणी में पूरे 100 नंबर लाने के बावजूद इस श्रेणी में दिल्ली का स्थान 28वां रहा। वहीं सिटीजन पर्सेप्शन सर्वे में सबसे बुरा 44वां स्थान रहा।

सार्वजनिक परिवहन से जुड़ी दिल्ली की परेशानी: इस साल के सूचकांक से दिल्ली के संदर्भ में एक चिंताजनक तथ्य यह उभरकर सामने आया कि राजधानी में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था पिछले कुछ वर्षो में लचर हुई है। यही कारण रहा कि आवागमन के मामले में सड़कों की अच्छी व्यवस्था और मेट्रो की सुविधा होने के बावजूद दिल्ली ने 100 में से 27 स्कोर ही किया। विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली में आवागमन की सुविधा के खराब होने के पीछे सबसे बड़ा कारण है डीटीसी की बसों की संख्या में निरंतर कमी और मेट्रो प्रणाली से बसों को जोड़ कर आखिरी पड़ाव तक परिवहन की समग्र सुविधा पहुंचा सकने में विफलता। दरअसल दिल्ली परिवहन निगम के पास बसों की न सिर्फ भारी कमी है, बल्कि परिचालित बसों की संख्या लगातार घट रही है। लगभग एक दशक पूर्व राष्ट्रमंडल खेलों के समय वर्ष 2010 में दिल्ली परिवहन निगम के पास लगभग छह हजार बसें परिचालन में थी, जो घट कर वर्ष 2017-18 में करीब चार हजार रह गई। वर्ष 2018-19 में इनकी संख्या 4,176 करने का लक्ष्य रखा गया, मगर यह संख्या बढ़नी तो दूर, घट कर 3,897 रह गई।

वर्तमान में हर साल करीब 318 बसें परिचालन से बाहर हो रही हैं और अगर तुरंत नई बसों की खरीदारी नहीं हुई तो वर्ष 2025 में डीटीसी के पास सिर्फ 200 बसें ही बचेंगी। सार्वजनिक परिवहन की स्थिति यह है कि दिल्ली में महिलाओं के लिए बसों में यात्र तो मुफ्त कर दी गई है, किंतु उस कारण से बसों में बढ़ने वाली भीड़ के अनुसार तैयारी करना तो दूर की बात, वास्तविकता यह है कि पिछले एक साल में जिन कुछ सौ बसों की खरीद हुई है, उनको छोड़ दें तो दिल्ली सरकार ने पिछले छह वर्षो में बसों की खरीद में विशेष रूचि नहीं दिखाई। वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार दिल्ली की सड़कों पर कम से कम 11 हजार बसें होनी चाहिए, लेकिन पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के बावजूद यह संख्या इससे बहुत कम है। इतना ही नहीं, अधिकांश बसें लगभग 10 साल पुरानी हो चुकी हैं और ज्यादा यात्रियों के बोझ के कारण इंजन पर दबाव भी ज्यादा होता है तो ये बसें बीच रास्ते में खराब भी काफी होती हैं। इन कारणों से राजधानी में वायु प्रदूषण का स्तर भी साल के अधिकांश दिनों में बेहद खराब स्तर पर ही रहता है।

ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स के आंकड़े न सिर्फ दिल्ली, बल्कि सभी शहरों की मजबूती और चुनौतियां दोनों को सामने रखते हैं। मगर एक बात जो दिल्ली को शेष शहरों से अलग करती है, वह यह है कि देश की राजधानी होने के कारण कई मामलों में स्वाभाविक रूप से प्रधानता मिलने तथा आíथक रूप से संपन्न होने के कारण दिल्ली के लिए उन पहलुओं में स्थिति अच्छी नहीं है, जिनमें सुधार करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। लिहाजा इन तथ्यों की नए सिरे से समीक्षा की जानी चाहिए कि तमाम लोकलुभावन नीतियों की जगह जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान दिया जाए।

[शोधार्थी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय]

Edited By: Sanjay Pokhriyal