डॉ. सच्चिदानंद जोशी। Ayodhya Ram Mandir News कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर की प्रदक्षिणा में उत्कीर्ण रामकथा के प्रसंगों को देखते हुए शायद ही कोई भारतीय होगा जिसके मन में यह प्रश्न नहीं कौंधा होगा कि जब श्रीराम यहां विराज सकते हैं, तो मेरे देश में उनकी अपनी जन्मभूमि पर क्यों नहीं विराज सकते। वहां राम रावण युद्ध का दृश्य देखते समय किसके मन में यह विचार नहीं कौंधा होगा कि अपने पराक्रम से रावण को तो हराना श्रीराम के लिए सरल था, लेकिन युगों बाद अपनी ही जन्मभूमि पर अपने अस्तित्व को सिद्ध करने का कानूनी उपक्रम कितना कठिन और दुष्कर हो गया।

वैसे राम की व्याप्ति ऐसी है कि उसे किसी भौगोलिक सीमा में बांधना कठिन है। राम का महात्म्य सभी भौगोलिक सीमाओं को लांघ कर कई हजार योजन की यात्रा कर हर काल में परिवेश, संस्कृति, सभ्यता और परिस्थिति के अनुरूप प्रकट होता है। भारत में ही हम राम के आख्यान के कई रूप देखते हैं, जिसमें वाल्मीकि रामायण से लेकर रामचरितमानस और कम्ब रामायण से होती हुई यह यात्रा दो सौ से भी अधिक रूपों जाती है।

भारत के हर प्रांत में, हर भाषा में रामकथा का अपना स्वरूप है और उसके प्रति आस्था प्रकट करने का अपना तरीका है। इसमें अकबर द्वारा फारसी में अनुवाद करवाई रामायण और 1776 में उर्दू में आई पोथी रामायण भी शामिल है। इसके अलावा विभिन्न लोक शैलियों में रामकथा के अपने अपने संस्करण हैं, जिसमें उस स्थान के देशज आख्यानों और संदर्भों का भी समावेश है। भारत के बाहर थाइलैंड में रामाकिन, इंडोनेशिया में काकबिन, मलेशिया में हिकयत सेरी राम, फिलीपींस में मछिंद्र लावन, म्यांमार में राम तायगिन, कंबोडिया में राम केरती जैसे संस्करण हैं जिनमें रामकथा अपनी पूरी सांस्कृतिकता के साथ प्रकट होती है।

रामलीला के माध्यम से रामकथा का प्रकटीकरण भारत का एक लोकप्रिय संप्रेषण व मनोरंजन का माध्यम है जो समाज को शिक्षित और प्रबोधित करने का भी काम करता है। भारत में नवरात्रि के समय रामलीला का आयोजन स्थान स्थान पर होता है। ऐसी ही रामलीलाएं आपको त्रिनिदाद, सूरीनाम, फिजी, घाना, मॉरीशस और इंडोनेशिया आदि में देखने को मिल जाएंगी। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार उनमें परिवर्तन होते रहे हैं, लेकिन सबका मूल तत्व राम ही हैं। राम की व्याप्ति किसी धर्म विशेष, संप्रदाय या पंथ तक सीमित नहीं। राम तो धर्म, संप्रदाय, पंथ, मन के व्यापों से परे पूरी सृष्टि पर अपना आत्मीय आधिपत्य स्थापित करता है।

रा शब्दो विश्ववचनो म: च अपि ईश्वर

वाचक:। विश्व अधीन ईश्वरों यो हि तेन

राम: प्रर्कीितत:।

यानी 'रा' अक्षर तीनों लोकों का प्रतिनिधित्व करता है और 'म' अक्षर ईश्वर का या सर्वशक्तिमान का, इसलिए राम वह जो पूरे विश्व का स्वामी या नियंता।

इसलिए किसी भी रूप में भारत की सांस्कृतिक आस्था का प्रकटन करना हो तो सबसे पहले राम याद आते हैं। 'रा' अक्षर के उच्चारण मात्र से सारे संचित पाप शरीर से निकल जाते हैं और 'म' अक्षर वह द्वार है जो पापों के निकलते ही बंद हो जाता है और पुन: पापों के संचय को रोकता है। राम भारत की सांस्कृतिक चेतना हैं और इसलिए उनके प्रति आस्था, धर्म के विचार के परे जाकर प्रकट होती है। ऐसा उदाहरण संभवत: विश्व की किसी भी अन्य संस्कृति में नहीं है, जहां किसी एक आराध्य की जीवन गाथा को मानवीय धरातल पर इतने गहरे तक एकाकार होकर अंगीकृत किया जाता हो। यह इसलिए भी संभव हो पाता है, क्योंकि राम के जीवन के सभी पहलू कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में सबके जीवन के साथ एकाकार होते हैं। इसलिए गिरमिटिया देशों में अपने पूर्वजों की धरोहर को संजोकर रखने वाले संग्रहालय में रामचरितमानस का गुटका प्रमुख आकर्षण होता है। जिसने राम को नहीं जाना उसने अपने आपको नहीं जाना। जिससे राम का परिचय नहीं हुआ, वह अपने आपसे अपरिचित रह गया। इसलिए देव होते हुए भी राम अपने लगते हैं। जो श्वास के साथ जीवन के प्रमुख तंतु के रूप में जुड़ जाते हैं और व्यक्ति को उसी में तल्लीन कर देते हैं।

श्रीराम जन्मभूमि तो पुण्य फलदायी है, और सबके लिए मंगल की ही कामना करती है। इसके दर्शन करने से मानव के कष्ट दूर हो जाते हैं। स्कंद पुराण में इसका उल्लेख है। रामकथा की महिमा का महत्व हर काल में रहा और सबने इसे स्वीकार किया। इसीलिए तो जब तुलसीदास जी ने रामचरितमानस पूर्ण कर अभिप्राय के लिए अब्दुर रहीम खानखाना को भेजा तो उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया इस तरह से दीरामचरितमानस विमल सत्य सकल सुभ खान, हिन्दुआन को बेद है मुस्लिम को कुरान।

इसलिए अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का भूमिपूजन भारत के एक राज्य में, किसी स्थान पर होने वाला कोई प्रासंगिक या पारंपरिक अनुष्ठान नहीं है। यह विश्व के सम्मुख भारत की सांस्कृतिक सौजन्यता और विराटता का उत्सव है, जिसकी मंगलमय ध्वनि से पूरा विश्व आह्लादित होगा। यह एक ऐसे परिवेश को निर्मित करने वाला प्रसंग है, जिसके माध्यम से भारत की सर्वसमावेशी सनातन संस्कृति का एक बार पुन: विश्व के सामने प्रदर्शन होगा।

यह समूची मानव जाति के लिए उल्लास का उत्सव है, अपने 'स्व' को अनुभूत करने का उत्सव है। सुंदरकांड में हनुमान जी के मन में शंका उत्पन्न होने पर उन्होंने श्रीराम का ही स्मरण किया था। प्रबिसी नगर कीजे सब काजा हृदय राखि कोसलपुर राजा। अयोध्यापुरी के राजा श्रीरघुनाथजी को हृदय में रखते हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। हम सब भी मन में सबके प्रति सद्भाव रखते हुए रामकथा के इस नए पर्व में प्रवेश करें और समूचे विश्व के मंगल की कामना करें तो श्रीराम में हमारी आस्था का सही प्रकटीकरण होगा।

[सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र]

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