डॉ. जयंतीलाल भंडारी। पिछले कुछ सालों में भारत मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) से कई देशों से मुक्त व्यापार की राह पर आगे बढ़ा है। इससे भारतीय वस्तुओं के लिए दुनिया के बाजारों में निर्यात पहुंच बढ़ी है। गत दिवस पीएम मोदी ने कहा कि इजरायल के साथ भी भारत का एफटीए जल्दी ही आकार लेते हुए दिखाई देगा और भारत जल्द तीसरी बड़ी अर्थव्यस्था वाला देश होगा। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ को अवैध ठहराए जाने के बाद 24 फरवरी से 150 दिनों के लिए भारत समेत सभी देशों पर 15 प्रतिशत अस्थाई ग्लोबल टैरिफ लागू हो गया है।

इस अवधि के बाद अमेरिकी संसद तय करेगी कि इसे आगे बनाए रखना है या नहीं? अभी अमेरिकी प्रशासन के पास टैरिफ लगाने की कई शक्तियां बची हुई हैं। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिकी संसद से टैरिफ पर प्रस्ताव मंजूर होने के बाद भारत के साथ किया गया व्यापार समझौता अपने पूर्व निर्धारित रूप में ही लागू होगा। ऐसे में जहां आगामी 150 दिन टैरिफ की अस्थाई कमी निर्यात बढ़ाने के लिए हितकर है, वहीं इसके बाद दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौता अमेरिका को निर्यात बढ़ाने के लिए लाभप्रद होगा।

भारत के लिए अमेरिका एक सबसे बड़ा बाजार है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और अमेरिका के बीच 131.84 अरब डालर मूल्य का व्यापार हुआ। इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में अप्रैल से दिसंबर के बीच भारत ने अमेरिका को 65.88 अरब डालर मूल्य का निर्यात किया है। ऐसे में अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौता भारतीय निर्यात बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण होगा। अमेरिका द्वारा शुरू किए गए टैरिफ और व्यापार व्यवधानों ने भारत को वैकल्पिक बाजार खोजने और नए व्यापार गठबंधन बनाने की राह पर आगे बढ़ाया है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत ने पिछले वर्ष कई व्यापार समझौते किए हैं और इस वर्ष भी कई नए व्यापार समझौतों के कार्यान्वयन की तैयारी है।

इनमें अत्यधिक महत्वपूर्ण यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ मुक्त व्यापार समझौता भी शामिल है। हाल में एआइ समिट के दौरान ईयू के कई राष्ट्राध्यक्षों ने 27 जनवरी को भारत-ईयू के दौरान किए गए एफटीए को शीघ्र कार्यान्वित किए जाने के लिए समर्थन दिया। यह एफटीए दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तालमेल का बेजोड़ उदाहरण है। इस समझौते को सभी व्यापार समझौतों की जननी कहा गया है। इस एफटीए से दो अरब लोगों का एक साझा बाजार तैयार होगा, जिसका संयुक्त बाजार वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग एक चौथाई हिस्से के बराबर होगा। अनुमान है कि यह एफटीए आगामी छह महीने में कार्यान्वित होते हुए दिखाई देगा।

पिछले वर्ष भारत द्वारा ब्रिटेन, ओमान के साथ किए गए एफटीए इसी अप्रैल से और न्यूजीलैंड के साथ किया गया एफटीए सितंबर से कार्यान्वित होते हुए दिखाई देगा। इन सबके साथ-साथ मारीशस, संयुक्त अरब अमीरात, आस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (एफ्टा) के साथ हुए एफटीए से भी इस वर्ष निर्यात बढ़ते हुए दिखाई देंगे। इस वर्ष पेरू,चिली, आसियान, मैक्सिको, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इजराइल, भारत गल्फ कंट्रीज काउंसिल सहित अन्य प्रमुख देशों के साथ भी नए एफटीए हो सकते हैं। इस तरह निर्यात बढ़ने की संभावनाओं का यह एक अनुकूल परिदृश्य है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के लगातार बदलते रवैये को देखते हुए भारत के लिए उचित यही होगा कि वह अन्य देशों से व्यापार समझौते संबंधी वार्ताओं को गति दे।

वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत से निर्यात बढ़ाना कोई सरल काम नहीं है। भारत को निर्यात की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। एक फरवरी को वित्त मंत्री की ओर से प्रस्तुत केंद्रीय बजट में विनिर्माण, वस्त्र, चमड़ा और समुद्री भोजन जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए निर्यात बढ़ाने के लिए जो कई रणनीतिक उपाय किए गए हैं, उन पर नए वित्तीय वर्ष में शुरुआत से ही ध्यान देना होगा। निर्यात बढ़ाने के लिए हमें उत्पादों की गुणवत्ता और नए सुधारों पर भी ध्यान देना होगा। व्यापार समझौते अभी ऐतिहासिक कागजी दस्तावेज हैं। इनका पूरा लाभ तभी मिलेगा, जब भारत नई पीढ़ी के सुधारों और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन को आगे बढ़ाएगा।

नए व्यापार समझौतों से भारत दुनिया की बड़ी-बड़ी मंडियों में प्रवेश पाने में सफल तो होगा, लेकिन देश को व्यापारिक महाशक्ति बनाने के लिए आकर्षक दरों पर अच्छी गुणवत्ता वाला माल तैयार करना होगा। सिस्टमैटिक्स ग्रुप की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत द्वारा व्यापार समझौतों का अधिकतम लाभ लेने के लिए सबसे पहले किफायती लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, लाजिस्टिक्स और कस्टम प्रक्रियाओं को सरल बनाने जैसे सुधारों पर तेजी से आगे बढ़ना होगा। निर्यातकों की दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं हैं।

वे एंटी-डंपिंग शुल्क से भी संबंधित हैं। घरेलू कच्चे माल की ऊंची लागत और ईंधन की उच्च कीमतों के कारण भी भारत की ओर से निर्यात किए जाने वाले उत्पाद वैश्विक स्तर से करीब 20 फीसदी की अधिक लागत पर दिखाई देते हैं। व्यापार समझौतों से देश को आर्थिक शक्ति बनाने के लिए अधिकारियों को नए दौर की जरूरत के मुताबिक शिक्षित-प्रशिक्षित करने के साथ सरकारी और निजी क्षेत्रों में शोध, विकास एवं नवाचार बढ़ाना होगा।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)