डॉ. जयंतीलाल भंडारी। पश्चिम एशिया संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडल समिति की बैठक में आम लोगों की महत्वपूर्ण जरूरतों मसलन पेट्रोल-डीजल, गैस, बिजली, उर्वरक आदि की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सभी तरह के संभावित उपायों पर विचार किया गया। चूंकि पश्चिम एशिया में युद्ध से पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है, ऐसे में सरकार की ओर से देश भर में निर्बाध आपूर्ति, स्थिर लाजिस्टिक्स और कुशल वितरण सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करना स्वाभाविक है। मोदी सरकार को आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी और जमाखोरी रोकने के लिए राज्यों से उपयुक्त समन्वय करना होगा। इसके साथ ही भारतीय वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नए प्रयासों के साथ नए निर्यात गंतव्य विकसित करने होंगे।

पश्चिम एशिया में लंबे खिंचते युद्ध से दुनिया के साथ-साथ भारत की आर्थिक चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं। हाल में गोल्डमैन सैक्स द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की विकास दर के अनुमान को 7 प्रतिशत से घटाकर 6.5 प्रतिशत किया गया है। आइसीआइसीआइ बैंक ने भारत के विकास दर अनुमान को 7.5 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। रेटिंग एजेंसियों के मुताबिक कच्चे तेल के वैश्विक दाम बढ़ने और आपूर्ति बाधित होने के कारण भारत के ऊर्जा आयात बिल में जबरदस्त उछाल की आशंका है। साथ ही निर्यात में कमी और महंगाई में तेजी संबंधी चुनौतियों के कारण भी भारतीय अर्थव्यवस्था की संतुलित स्थिति के सामने खतरा दिखाई दे रहा है।

ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच विस्तारित होते हुए युद्ध से देश के कई हिस्सों में रसोई गैस और कमर्शियल गैस सिलिंडरों की आपूर्ति में बाधा से परेशानियां बढ़ती दिख रही हैं। निर्यातकों की भी मुश्किलें बढ़ी हैं। सेंसेक्स में गिरावट और डालर की तुलना में रुपये के मूल्य में कमी का परिदृश्य भी सामने है। निवेशक भारतीय बाजार से अपना धन निकालते हुए दिखाई दे रहे हैं। युद्ध का प्रभाव भारत के वित्तीय बाजार पर भी पड़ने लगा है। निवेशकों की संपत्ति में गिरावट आई है और भारतीय कंपनियों का बाजार पूंजीकरण (एमकैप) तेजी से घटा है।

इससे पहले ऐसी गिरावट कोविड के दौरान मार्च 2020 में देखी गई थी, पर युद्ध के ऐसे असर के बीच भी भारत की कुछ ऐसी प्रभावी आर्थिक अनुकूलताएं हैं, जो देश की विकास दर को भारी आघात से बचाने वाली हैं। सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू कर दिया है और महंगाई को नियंत्रित रखने तथा आम आदमी पर उसके प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक खाद्य वस्तुओं के लिए बफर स्टाक बढ़ाने, खुले बाजार में खरीदे गए खाद्यान्न की रणनीतिक बिक्री करने और जरूरी आयात की सुविधा जैसे कई रणनीतिक कदम उठाए हैं।

वह निर्यातकों को राहत देने के लिए रेजिलिएंस एंड लाजिस्टिक इंटरवेंशन फार एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन (रिलीफ) योजना लेकर आई है। इसका उद्देश्य ऐसे निर्यातकों को मदद देना है, जो माल ढुलाई लागत और बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी तथा युद्ध से जुड़े निर्यात जोखिमों का सामना कर रहे हैं। इस योजना के तहत एमएसएमई निर्यातक विशेष रूप से लाभान्वित होंगे। सरकार खाड़ी देशों में जाने वाले सामान का बीमा खर्च भी उठाएगी। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत के बाद ईरान ने भारतीय झंडे वाले तेल और गैस टैंकरों को ‘होर्मुज स्ट्रेट’ से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दे दी है।
दुनिया में तेजी से बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के बावजूद देश में सामान्य पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ी हैं।

खुदरा महंगाई रिजर्व बैंक के निर्धारित चार प्रतिशत के लक्ष्य से भी कम है। देश के पास विशाल खाद्यान्न भंडार, पेट्रोल-डीजल आपूर्ति के लिए रणनीतिक भंडार, जरूरत की दवाइयों का पर्याप्त स्टाक भारत की आर्थिक अनुकूलताओं के रूप में दिखाई दे रही हैं। जहां रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन देश के आम आदमी के लिए भोजन की गारंटी है, वहीं कई जरूरतमंद देशों के लिए खाद्यान्न आपूर्ति का आधार भी है। पिछले वर्ष 35.70 करोड़ टन खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन हुआ और इस वर्ष इससे भी अधिक उत्पादन की संभावना है। भारतीय खाद्य निगम के पास केंद्रीय पूल में अप्रैल 2026 तक लगभग 182 लाख टन गेहूं उपलब्ध होने का अनुमान है। इस समय देश के 80 करोड़ से अधिक कमजोर वर्ग के लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न वितरित किया जा रहा है। छह साल पहले कोविड से जंग में हमारे खाद्यान्न भंडार ही बड़ा सहारा बने थे। जब ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध से दुनिया में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं और खाद्यान्न आपूर्ति में व्यवधान दिख रहा है, तब भारत का रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन राहतकारी है।

भारत अमेरिका तथा रूस सहित अन्य देशों से अधिक मात्रा में कच्चे तेल की खरीदारी बढ़ाने हेतु वैकल्पिक रणनीति पर काम कर रहा है। पहले भारत 27 देशों से कच्चा तेल खरीदता था। अब इन देशों की संख्या बढ़कर 40 हो गई है। युद्ध के बीच जरूरी दवाओं संबंधी चिंताएं भी कम हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दवाई उत्पादक देश है और जेनेरिक दवाई उत्पादन में पहले नंबर पर है। भारत के पास 700 अरब डालर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार है, जिससे वह किसी भी आर्थिक जोखिम का सरलतापूर्वक सामना करने में सक्षम है।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)