हर्ष वी पंत। श्रीलंका इन दिनों भारी मुश्किलों में फंसा हुआ है। अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। विदेश मुद्रा भंडार खाली है। महंगाई चरम पर है। आवश्यक वस्तुओं की किल्लत है। जनता त्राहिमाम कर रही है। चीनी कर्ज का मर्ज लगातार बढऩे पर है। ड्रैगन उस पर अपना शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। कोलंबो को इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। श्रीलंका जिस हालात से दो-चार है, उसका सबसे बड़ा जिम्मेदार वह स्वयं है।

एक तो चीन पर हद से ज्यादा निर्भरता बढ़ाकर उसने अपने लिए आफत मोल ले ली। दूसरे हाल के दौर में कुछ ऐसी घरेलू नीतियां अपनाईं जो उसके लिए आत्मघाती साबित हुईं। रही-सही कसर कोविड महामारी से उपजी आपदा ने पूरी कर दी। यही कारण है कि एक समय दक्षिण एशिया में मानव विकास सहित तमाम मानकों पर अग्र्रिम स्थिति पर दिखने वाला देश आज दिवालिया होने के कगार पर है। ऐसी स्थितियों में वह भारत जैसे पड़ोसी देश से मदद की आस लगाए हुए है। भारत के लिए भी यह श्रीलंका में गंवाई अपनी जमीन को वापस पाने का अवसर प्रतीत हो रहा है। इस मामले में दोनों पक्षों की सक्रियता अच्छे संकेत देने वाली है।

हावी होता गया चीन

बीते कुछ वर्षों के दौरान चीन श्रीलंका में एक अहम किरदार रहा है। भारत को घेरने वाली अपनी 'मोतियों की माला' रणनीति में वह श्रीलंका को एक महत्वपूर्ण मनका मानता आया है। साथ ही चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना में भी श्रीलंका एक अहम कड़ी है। इन पहलुओं को देखते हुए चीन आर्थिक निवेश की आड़ में श्रीलंका को अपने कर्ज के जाल में फांसता गया। श्रीलंका पर करीब सात अरब डालर के कर्ज का अनुमान है, जिसमें से पांच अरब डालर तो अकेले चीन के हैं। स्थिति यहां तक उत्पन्न हो गई हंबनटोटा जैसा श्रीलंकाई बंदरगाह लीज के रूप में चीन के नियंत्रण में आ गया। बीते दिनों ही श्रीलंका को चीन के दबाव में आकर उस चीनी फर्टिलाइजर कंपनी के लिए आपात भुगतान की व्यवस्था करनी पड़ी, जिसके घटिया गुणवत्ता वाले उर्वरक को श्रीलंकाई सरकार ने खारिज कर दिया था। चीन ने श्रीलंका के पीपुल्स बैंक को भी काली सूची में डाल दिया। भौगोलिक रूप से चीन के साथ कोई जुड़ाव न रखने वाले श्रीलंकाई नागरिकों को लगातार बढ़ता चीनी दखल खलने लगा था। यही कारण था कि पूर्व राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना ने चुनाव में चीन के खिलाफ उबाल लेती भावनाओं को मुद्दा बनाकर मङ्क्षहदा राजपक्षे की सत्ता से विदाई कराई।

जो बोया वही काट रहा श्रीलंका

विपक्ष में बिखराव, सिंहली राष्ट्रवाद और बेहतर भविष्य के सब्जबाग दिखाकर राजपक्षे परिवार दो साल पहले फिर से श्रीलंकाई सत्ता पर काबिज हो गया। इस बार उसने चीन से किनारा करने की कोशिश की, लेकिन अतीत की गलतियों से पीछा छुड़ाना इतना आसान नहीं होता। राजपक्षे परिवार आज वही काट रहा है, जो उसने बोया। श्रीलंका की इस त्रासदी के तार अतीत से नहीं, बल्कि मौजूदा सरकार के कई तुगलकी फरमानों से भी जुड़े हैं। जैसे एकाएक जैविक खेती को बढ़ावा देने का निर्णय। इसने श्रीलंका में खाद्य पदार्थों के उत्पादन को यकायक घटाकर एक अभूतपूर्व किस्म के संकट को जन्म दिया। अर्थव्यवस्था की बदहाली से आयात भी संभव नहीं हो सका। ऐसे में श्रीलंका खाद्य, ऊर्जा और मुद्रा सभी प्रकार के संकटों से एक साथ जूझ रहा है। इससे लोगों में असंतोष बढ़ा है। वैसे तो कोविड महामारी पूरी दुनिया के लिए भारी साबित हुई है, लेकिन इसने श्रीलंका की तो कमर ही तोड़कर रख दी। उसकी अर्थव्यवस्था एक बड़ी हद तक पर्यटन पर आश्रित है। कोविड के कारण पर्यटकों की आवाजाही बहुत बाधित हुई। इससे अर्थव्यवस्था में करीब 11 प्रतिशत का योगदान करने वाला पर्यटन उद्योग बेदम हो गया। उससे जुड़े दो-ढाई लाख लोगों के रोजगार मंदी की भेंट चढ़ गए। इसका प्रभाव अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। यही कारण है कि श्रीलंकाई दुकानों में सामानों की भारी किल्लत हो गई है।

भारत से बंधी आस

स्वाभाविक है कि चीन से नाउम्मीद हुए श्रीलंका की नजरें मदद के लिए भारत की ओर लगी हैं। चीन के विदेश मंत्री वांग ई के हालिया कोलंबो दौरे पर श्रीलंका ने चीन से अनुरोध किया था कि वह उसके ऋण पुनर्गठन प्रस्ताव पर विचार करे, परंतु चीनी पक्ष की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके उलट कुछ दिन पहले भारत आए श्रीलंकाई वित्त मंत्री की मदद संबंधी मांग पर नई दिल्ली ने अनुकूल संकेत दिए। यही कारण रहा कि भारत ने श्रीलंका की आपात मदद के लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी की है। इसके बदले श्रीलंका ने भी अपनी महत्वपूर्ण वेस्टर्न कंटेनर टर्मिनल परियोजना भारत के अदाणी समूह को दी है। इससे पहले उसने अपना ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल भारत के दावे को दरकिनार करते हुए चीन को आवंटित किया था। ईस्टर्न की तुलना में वेस्टर्न कंटेनर टर्मिनल न केवल कई गुना बड़ा है, बल्कि यह भारत के लिए अत्यंत उपयोगी भी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत को गहरे समुद्र बंदरगाह की बहुत आवश्यकता है, जो इसकी पूर्ति करने में सक्षम है। भारत के 60 प्रतिशत कंटेनर इसी मार्ग से गुजरते हैं। इससे भारत को ङ्क्षहद महासागर में पैठ बढ़ाने के साथ ही सामुद्रिक व्यापारिक मोर्चे पर बड़ी बढ़त मिलेगी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के लिए यह समय श्रीलंका की मदद करने का है। इसके साथ ही यह भारत के लिए एक अवसर भी है कि वह बीते कुछ वर्षों के दौरान श्रीलंका में बढ़ते चीन के दबदबे को तोड़कर अपनी खोई हुई जमीन हासिल करे। इसमें एक संतुलन भी साधना होगा। दरअसल बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों में कई देश चीन-भारत अघोषित प्रतिद्वंद्विता से अपने हित साधने लगे हैं। श्रीलंका भी इसमें अपवाद नहीं। ऐसे देशों के भारत से मदद मांगने में कोई समस्या नहीं, परंतु यह भी ध्यान रखा जाए कि ऐसे देश केवल उसकी मदद के आसरे ही पूरी तरह निर्भर न रहें। यह अंतिम और अपिरहार्य विकल्प के रूप में ही अमल में लाया जाए। ऐसे में भारत को सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर अपनी श्रीलंका नीति को आकार देना होगा और इस पर ध्यान देना होगा कि पड़ोस में कोई मानवीय संकट आकार न लेने पाए और उससे निपटने में स्वयं उस पर भी बहुत बोझ न पड़े।

(लेखक नई दिल्ली स्थित आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं)

Edited By: Pranav Sirohi